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महामारी के बाद भारत का राजकोषीय भविष्य

राजेश कुमार /  November 03, 2021

अनुमान लगाया जा रहा है कि चालू वित्त वर्ष में कर संग्रह बजट में जताए गए अनुमान से काफी अधिक रहेगा। इससे न केवल सरकार को वृद्धि को बढ़ावा देने वाले पूंजीगत व्यय में इजाफा करने का मौका मिलेगा, बल्कि साथ ही उसे राजकोषीय घाटे में कुछ हद तक कमी करने का अवसर भी मिलेगा। केंद्र सरकार राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 6.8 फीसदी के स्तर पर रखना चाहती है जबकि गत वर्ष यह 9.5 फीसदी था। हालांकि चालू वर्ष में अनुमान से बेहतर राजस्व होने के कारण मध्यम अवधि में राजकोषीय चुनौतियों से निपटना उतना मुश्किल नहीं होगा। सरकार का सामान्य कर्ज बढ़कर जीडीपी के 90 फीसदी तक हो गया है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुमानों के अनुसार यह वर्ष 2026-27 तक जीडीपी का 85 फीसदी रहेगा। यह कोविड के पहले की तुलना में 10 फीसदी तक अधिक है।

साफ कहें तो भारत इकलौता ऐसा देश नहीं है जहां सरकारी कर्ज में तेजी से इजाफा हुआ है। विश्व स्तर पर सरकारी कर्ज जीडीपी के 100 फीसदी तक बढ़ गया है। सन 2020 में विकसित देशों का इसमें सबसे अधिक योगदान है। विकसित देशों ने बड़े पैमाने पर राजकोषीय मदद पहुंचाई जिसके चलते महामारी के कारण उत्पन्न हुई आर्थिक उथलपुथल से निपटने में मदद मिली। हालांकि वैश्विक कर्ज के भंडार के मध्यम अवधि में ऊंचा बने रहने का अनुमान है लेकिन भारत को सरकारी वित्त को नियंत्रण में लाने और व्यय को वृद्धि के वास्ते खर्च करने की दिशा में ले जाने के लिए कई स्तरों पर काम करना होगा। वह निकट अवधि में कर्ज और घाटे को नियंत्रित रखने के लिए व्यय में तेजी से कमी नहीं कर सकती है। ऐसा करने से आर्थिक सुधार की प्रक्रिया बाधित होगी। ऐसे में सरकार को संतुलन कायम करना होगा। जैसा कि आईएमएफ ने भारत से संबंधित अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि मध्यम अवधि की विश्वसनीय सुदृढ़ीकरण नीति के साथ राजकोषीय गुंजाइश तैयार की जा सकती है। केंद्र सरकार ने कहा है कि राजकोषीय घाटे को 2025-26 तक घटाकर जीडीपी के 4.5 फीसदी तक लाया जाएगा।

इस संदर्भ में देखा जाए तो सरकार अगर संशोधित राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) नियमों के साथ एक स्पष्ट खाका पेश करे तो बेहतर होगा। आईएमएफ के अनुमानों के अनुसार भारत का सामान्य सरकारी बजट घाटा 2026-27 तक घटकर जीडीपी के 7.8 फीसदी तक रह जाएगा जबकि गत वर्ष यह 12.8 फीसदी था। परंतु इसके बावजूद यह महामारी के पहले के स्तर से अधिक होगा। बढ़ा हुआ घाटा और कर्ज आने वाले वर्षों में सरकारी व्यय को प्रभावित करेगा और यह वृद्धि पर भी असर डालेगा। ऐसे में सरकार को राजस्व और व्यय दोनों मोर्चों पर काम करना होगा ताकि बगैर वृद्धि संभावनाओं को प्रभावित किए तेजी से सुदृढ़ीकरण किया जा सके। यथाशीघ्र कुछ नीतिगत गुंजाइश बनाने की भी जरूरत है। महामारी के दौरान भारत की प्रतिक्रिया विकसित देशों की तुलना में अपेक्षाकृत शांत इसलिए भी रही क्योंकि नीतिगत गुंजाइश की कमी थी।

राजस्व के मोर्चे पर सरकार को कम और स्थिर कर-जीडीपी अनुपात पर ध्यान देना होगा। जानकारी के अनुसार देश का कर अंतराल जीडीपी के 5 फीसदी के बराबर है। वस्तु एवं सेवा कर ने वांछित परिणाम नहीं दिए हैं। जीएसटी प्रणाली में व्याप्त प्रक्रियाओं को सहज बनाने और दरों को समायोजित कर राजस्व निरपेक्ष स्तर तक लाने जैसे मसलों को जल्दी हल करना होगा। यह इसलिए भी जल्द करने की जरूरत है क्योंकि जीएसटी संग्रह में कमी के कारण राज्यों को दी जाने वाली क्षतिपूर्ति अगले वर्ष समाप्त हो जाएगी। इससे कई राज्यों की वित्तीय स्थिति प्रभावित हो सकती है और नीतिगत जोखिम उत्पन्न हो सकता है। सरकारी व्यय की पूर्ति के लिए ईंधन करों पर निर्भरता कम करने के लिए मजबूत अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था की आवश्यकता है क्योंकि शायद यह मध्यम अवधि में व्यावहारिक साबित न हो। प्रत्यक्ष कर व्यवस्था की समीक्षा और कर आधार बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त सरकार को विनिवेश कार्यक्रम को गति देकर संसाधन बढ़ाने की दिशा में बढऩा होगा।

महामारी के बाद राजकोषीय भविष्य इस बात पर भी निर्भर करता है कि सरकारी व्यय की दिशा क्या है। व्यय की गुणवत्ता एक मसला है क्योंकि सरकार मौजूदा व्यय भरपाई के लिए ऋण लेती रही है। भारतीय रिजर्व बैंक के अर्थशास्त्रियों के एक हालिया आलेख के मुताबिक केंद्र सरकार के लिए सकल घरेलू उत्पाद में राजस्व घाटे की हिस्सेदारी 70 फीसदी के करीब रही है जो एफआरबीएम समीक्षा समिति द्वारा जताए गए स्तर से करीब दोगुना है। यही कारण है कि सरकार का पूंजीगत आवंटन प्रभावित हुआ है। उदाहरण के लिए केंद्र सरकार के लिए जीडीपी के प्रतिशत के रूप में यह दशकों से स्थिर है। हाल के दशकों में राज्यों के मामले में जरूर इसमें सुधार हुआ लेकिन बीते कुछ वर्षों से यह एक बार फिर खराब हुआ। स्वस्थ तरीके से सुदृढ़ीकरण के लिए व्यय की समीक्षा और उसकी दिशा नए सिरे से तय करना आवश्यक है।

सुदृढ़ीकरण और ऋण के स्थायित्व के लिए सबसे बड़ा जोखिम धीमी आर्थिक वृद्धि होगी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि मध्यम अवधि में भारत 6 फीसदी की वृद्धि हासिल कर सकता है। नीतिगत प्रतिष्ठान को सुधारों को आक्रामक ढंग से अंजाम देना होगा ताकि स्थायी रूप से उच्च वृद्धि दर हासिल की जा सके। सरकारी क्षेत्र अगर विस्तारित अवधि तक ज्यादा संसाधनों का इस्तेमाल करता है तो लंबी अवधि की व्यय संभावनाओं पर असर पड़ेगा। व्यापक स्तर पर निजी और सरकारी व्यय के कुछ समय तक सीमित रहने की संभावना है। ऐसे में भारत को उच्च वृद्धि के लिए निर्यात पर ध्यान देना चाहिए। यह भी जरूरी है कि तेज वृद्धि लंबे समय तक जारी रहे। बहरहाल, जीडीपी के प्रतिशत के रूप में निर्यात 2008 के 24 फीसदी से घटकर 2020 में 18 फीसदी रह गया। सरकार को इस रुझान को पलटने पर ध्यान देना चाहिए। विभिन्न स्तरों पर वांछित से कम नीतिगत हस्तक्षेप से सरकारी वित्त मध्यम अवधि में वृद्धि के लिए बाधा बन सकता है और वित्तीय स्थिरता को लेकर जोखिम बढ़ सकता है।

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