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हरित ऊर्जा पर ध्यान दिए बगैर जलवायु परिवर्तन पर वार्ता अधूरी

ज्योति मुकुल और श्रेया जय /  November 02, 2021

बीएस बातचीत

जलवायु परिवर्तन पर भारत की बातचीत अक्षय ऊर्जा को प्रोत्साहित करने और ऊर्जा में बदलाव के माध्यम से उत्सर्जन नियंत्रण पर केंद्रित है। ज्योति मुकुल और श्रेया जय के साथ बातचीत में इंटरनैशनल सोलर अलायंस (आईएसए) के महानिदेशक (डीजी) अजय माथुर ने कहा कि भारत और ब्रिटेन ने अपनी ग्रीन ग्रिड पहल को जोड़ा है। संपादित अंश...

जलवायु परिवर्तन की चर्चा में अक्षय ऊर्जा कितना अहम है?

हमें जलवायु परिवर्तन पर पहले की तुलना में कहीं ज्यादा लगाम लगाने की जरूरत है क्योंकि इससे विकसित व विकासशील सभी देशों नकारात्मक असर पड़ रहा है। यह हकीकत है कि ज्यादातर ग्लोबल ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला और पेट्रोलियम से होता है। ऐसे में व्यापक पैमाने पर हमें जल्द से जल्द अक्षय ऊर्जा की ओर जाने की जरूरत है। अक्षय ऊर्जा पर बातचीत के बगैर जलवायु परिवर्तन पर चर्चा अधूरी है। आईईए के मुताबिक वैश्विक रूप से बिजली उत्पादन में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी 2020 के 29 प्रतिशत से बढ़ाकर 2030 तक 60 प्रतिशत और 2050 तक करीब 90 प्रतिशत किए जाने की जरूरत है। इस पर निवेश 2 लाख करोड़ डॉलर से बढ़ाकर 2030 तक करीब 5 लाख करोड़ डॉलर और उसके बाद 4.5 लाख करोड़ डॉलर करने की जरूरत है।

अक्षय ऊर्जा के हिसाब से ग्रिड कनेक्टिविटी कितनी महत्त्वपूर्ण है?

अक्षय ऊर्जा क्षमता के लिए बुनियादी ढांचा अलग से और छोटे पैमाने पर तैयार करना बड़े पैमाने के इंस्टालेशन की तुलना में सरल है। अगर इसे विस्तार देना है तो ग्रिड कनेक्टिविटी अहम है। ट्रांंसनैशनल ट्रेड का मकसद कूटनीतिक संबंध मजबूत करने और उसे बरकरार रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे अतिरिक्त राजस्व आता है और यह ट्रांसनैशनल इलेक्ट्रिसिटी कारोबार पर भी लागू होता है। सतत बिजली की मजबूत व्यवस्था बनाने के लिए सीमापार कनेक्टिविटी के लिए बुनियादी ढांचा बनाने की जरूरत है।


हरित ग्रिड की पहल वन सन, वन वल्र्ड, वन ग्रिड (जीजीआई-ओएसओडब्ल्यूओजी) परंपरागत ग्रिड के माध्मय से होगा या इसकी अलग ग्रिड व्यवस्था होगी?

ओएसओडब्ल्यूओजी का मूल यह है कि कभी सूर्यास्त नहीं होता और सौर ऊर्जा सबके लिए 24 घंटे मुहैया कराई जाए।  परंपरागत ग्रिड का इस्तेमाल ग्लोबल कनेक्टिविटी सिस्टम के लिए नहीं हो सकता है क्योंकि इसकी सीमित क्षमता है। सीमा पार ग्रिड व्यवस्था के नेटवर्क की जरूरत है। इस परियोजना के तकनीकी पहलुओं पर काम किया जाना बाकी है, इसमें इंटरकनेक्टेड ग्रीन ग्रिड की व्यवस्था जरूरी होगी, जिससे 140 देशों की जरूरतें पूरी की जा सकें।


ओएसओडब्ल्यूओजी परियोजना के लिए कौन से देश सहमत हुए हैं और कौन सी एजेंसियां इसके लिए वितत्तपोषण कर रही हैं?

आईएसए की चौथी बैठक में ओएसओडब्ल्यूओजी पहल का प्रस्तुतीकरण हुआ था। ब्रिटेन और भारत ने हाथ मिलाने व जीजीआई और ओएसओडब्ल्यूओजी का विलय जीजीआई-ओएसओडब्ल्यओजी में करने का फैसला किया था।

यह इस साल की शुरुआत में ब्रिटेन व भारत के बीच वर्चुअल सम्मेलन के बाद द्विपक्षीय सहयोग का हिस्सा है। सीओपी 26 में ब्रिटेन और भारत संयुक्त रूप से जीजीआई-ओएसओडब्ल्यूओजी शुरू करने पर भी सहमत हुए हैं।  


क्या आपको लगता है कि छोटे देशों को अक्षय ऊर्जा के एजेंडे को स्वीकार करना सरल है, जबकि भारत और चीन अभी भी बड़े पैमाने पर कोयला से उत्पन्न बिजली पर निर्भर हैं?

देश का आकार दोनों तरीके से काम करता है। बड़े देशों में समस्याएं ज्यादा हैं, और छोटे देशों में बड़े निवेश का विकल्प नहीं है। तमाम छोटे देश बिजली की अधिकता से जूझ रहे हैं।

अफ्रीका और एशिया के छोटे देशों में आईएसए का अनुभव कितना अलग है?

हमें अपने सदस्य देशों, खासकर कम विकसित देशों (एलडीसी) से बेहतर प्रतिक्रिया मिली है, जो अफ्रीका, प्रशांत, कैरेबियाई व अन्य द्वीपीय देश हैं। वे इसमें पहले शामिल हुए और आईएसए से परियोजना की मांग रखी। 4.5 जीडब्ल्यू सौर क्षमता की मांग में से ज्यादातर एलडीसी से आई है।

Keyword: अक्षय ऊर्जा, इंटरनैशनल सोलर अलायंस, आईएसए, अजय माथुर, जलवायु परिवर्तन,
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