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जलवायु समझौते पर अमल की राह बने

नितिन देसाई /  November 02, 2021

जलवायु परिवर्तन पर गठित अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की हाल में आई एक रिपोर्ट ने सीमित मात्रा में उपलब्ध कार्बन अंतराल को लेकर खतरे की घंटी बजाई है। वर्ष 2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते में औसत वैश्विक तापमान वृद्धि को काबू में रखने के लिए यह कार्बन अंतराल तय किया गया था। उम्मीद जताई जा रही है कि ग्लासगो में हो रहे संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में शामिल देश ग्रीनहाउस गैसों और कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन कम करने संबंधी अपनी प्रतिबद्धताओं में तेजी लाएंगे। यह कह पाना अभी जल्दबाजी होगी कि यह उम्मीद पूरी हो पाएगी या नहीं। लेकिन पिछले जलवायु सम्मेलनों के परिणामों पर नजर डालने से एक मार्गदर्शन जरूर मिलेगा।

संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के आयोजन को लेकर जब चर्चा शुरू हुई थी तो कई लोगों ने आशंका जताई। समझौते में किसी सुदृढ़ प्रतिबद्धता का जिक्र नहीं था लेकिन आकांक्षापूर्ण लक्ष्य यही था कि औद्योगिक देश वर्ष 2000 में अपने उत्सर्जन को 1990 के स्तर तक सीमित रखेंगे। यूरोपीय संघ के देशों ने कमोबेश इस लक्ष्य को हासिल भी किया लेकिन अमेरिका इस पर खरा नहीं उतरा और नब्बे के दशक में उसका ग्रीनहाउस उत्सर्जन 15 फीसदी बढ़ गया। हालांकि रूस में अर्थव्यवस्था चौपट हो जाने से उसका उत्सर्जन स्तर लगभग आधा रह गया था।

इस लक्ष्य के पूरा न हो पाने के बीच 1997 में क्योटो समझौता हुआ जिसने औद्योगिक देशों से 2008-12 के दौरान ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम कर 1990 के स्तर से भी 5.2 फीसदी नीचे ले जाने को कहा। लेकिन उस समय के सबसे बड़े प्रदूषक अमेरिका ने क्योटो समझौते को स्वीकार नहीं किया और उसका पड़ोसी कनाडा भी बाद में इससे अलग हो गया था। हालांकि क्योटो समझौते का नतीजा काफी हद तक सम्मानजनक लगता है क्योंकि पूर्व साम्यवादी देशों में आर्थिक गतिविधियां कम हो जाने से उत्सर्जन स्तर में बड़ी गिरावट आई थी।

नई सहस्राब्दी के पहले दशक में जलवायु कूटनीति की सियासत में दो अहम बदलाव देखे गए। पहला, प्रतिबद्धता जताने के मामले में विकसित एवं विकासशील देशों के बीच का फासला खत्म हो गया और दूसरा, वैश्विक स्तर पर सहमत प्रतिबद्धताओं की जगह राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित संकल्पों ने ले ली। पहला बदलाव काफी हद तक 1990-2010 के दौरान चीन के उत्सर्जन स्तर पर हुई तिगुनी वृद्धि की देन था। अब चीन सबसे बड़े प्रदूषक का दर्जा हासिल कर चुका था। वहीं दूसरा बदलाव अमेरिका की वजह से आया जो सीनेट की मंजूरी लेने की जरूरत वाली समझौता शर्तों का मानने के लिए तैयार नहीं हुआ। इस राजनीतिक विचलन की ही परिणति 2015 के पेरिस समझौते के तौर पर हुई।

जलवायु परिवर्तन की रफ्तार धीमी करने के लिए पिछले तीन दशकों से जारी इस कवायद का प्रभाव क्या रहा है? ग्रीनहाउस गैसों में प्रमुख कार्बन डाई ऑक्साइड (सीओ2) को सीमित करने पर जोर देने की शुरुआत इन तीन दशकों में ही हुई। इसके बावजूद इस अवधि में हमने 870 अरब टन सीओ2 का उत्सर्जन कर दिया जो 1750 से लेकर 1990 के दौरान हुए कार्बन उत्सर्जन से भी ज्यादा है। कार्बन उत्सर्जन में एक फीसदी या अधिक की हिस्सेदारी रखने वाले 16 देशों की 1990-2010 के दौरान हुए कुल उत्सर्जन में करीब 84 फीसदी हिस्सेदारी रही। छह विकसित देशों का ही सम्मिलित अंशदान करीब 50 फीसदी रहा और पांच विकासशील देशों ने इसमें 36 फीसदी योगदान दिया (जिसका 70 फीसदी अकेले चीन का है)। तेल का निर्यात करने वाले पांच देशों ने इसमें 14 फीसदी भूमिका निभाई। अगर हम उत्पादन के बजाय खपत के नजरिये से इसे देखें तो इन तीनों समूहों की हिस्सेदारी क्रमश: 56 फीसदी, 32 फीसदी और 12 फीसदी रही।

हमें ताप वृद्धि को साझा लक्ष्य के नीचे बनाए रखने के लिए  उपलब्ध कार्बन अंतराल के मोर्चे पर उठाए गए कदमों पर भी गौर करना चाहिए। आईपीसीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, ताप वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के नीचे रखने की 50-67 फीसदी संभावना के लिए अब से हमें अपने समेकित कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि को 400-500 अरब टन सीओ2 तक सीमित रखना होगा, जब तक हम शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का स्तर न हासिल कर लें। इसने शुद्ध-शून्य स्तर की निर्धारित तारीख के बारे में कई देशों की प्रतिबद्धता सशक्त की है। हालांकि मंजिल की घोषणा ही काफी नहीं है, वहां तक पहुंचने का रास्ता कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।

वैसे हम जलवायु परिवर्तन को थामने की दिशा में अपेक्षित रूप से नहीं बढ़ पाए हैं। लेकिन 1990 में शुरू हुए इस सफर में अब तक का तय रास्ता भी कम अहम नहीं रहा है। उस समय जलवायु परिवर्तन को लेकर एक तरह का संशयवाद एवं अज्ञानता हावी थी और इसके लिए मानव जाति की जिम्मेदारी काफी व्यापक थी जिसमें अमेरिका जैसे उच्च उत्सर्जक देश भी शामिल थे। जीवाश्म ईंधन, खासकर तेल उत्पादन में खासी रुचि रखने वाले पक्ष भी इसे हवा दे रहे थे। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं और जलवायु परिवर्तन को लेकर संदेह होना अपवाद बनकर रह गया है, चाहे ऐसा करने वाले पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ही क्यों न हों? इस जागरूकता का बड़ा श्रेय संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन सम्मेलनों को दिया जाना चाहिए जिसने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को आईपीसीसी के बैनर तले एकजुट होने और पूर्वानुमान लगाने के अवसर दिए।

जलवायु परिवर्तन के बारे में बढ़ती जागरूकता का कॉर्पोरेट क्षेत्र पर गहरा असर रहा है और तमाम बड़ी कंपनियों ने शुद्ध-शून्य स्तर के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी जताई है। इसने नवीकरणीय ऊर्जा संबंधी शोध को गति भी दी है जिससे ऐसी नाटकीय लागत कटौतियां मुमकिन हो पाई हैं। इससे जीवाश्म ईंधन के बजाय ऊर्जा निवेश पर अधिक बल मिला है। असल में, जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए तकनीकी नवाचार और नीतिगत विकास अहम हैं ताकि बाजार की पसंद ईंधन से दूर हो। बढ़ती जागरूकता ने वैश्विक गैर-सरकारी संगठनों का तीव्र प्रसार भी किया है जो समझ बढ़ाने, सूचना इकट्ठा करने के साथ असरदार ढंग से बात रखते हैं।

सार्वजनिक एवं बाजार अर्थव्यवस्था जलवायु संबंधी बदलावों को तेजी से काबू में करने के लिए तैयार है। ग्लासगो सम्मेलन में शामिल हो रहे पक्षों से हमें इन चीजों की दरकार है ---

  • ताप वृद्धि को 1.5 डिग्री नहीं तो अधिकतम 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए उपलब्ध कार्बन स्थल के आकार के अनुरूप समेकित प्रतिबद्धता की एक कालावधि बने।
  • देशों की निजी प्रतिबद्धताएं उनकी क्षमता से मेल खाने के साथ ही 1990 के बाद से कार्बन इस्तेमाल की उनकी भूमिका के अनुरूप हों
  • जहां और जब भी ऊर्जा अंतरण और अनुकूलन की जरूरत हो, उसके लिए वित्त मुहैया कराने की विश्वसनीय प्रतिबद्धता
  • पेरिस सम्मेलन में भारत एवं फ्रांस की पहल पर शुरू हुए अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की तर्ज पर कई देश मिलकर हरित हाइड्रोजन जैसी नई तकनीक के विकास और कार्बन ग्रहण एवं भंडारण पर काम करें। शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के लिए यह बदलाव करना अहम है
  • कार्बन कीमत-निर्धारण जैसे नीतिगत बदलावों पर चर्चा के लिए उत्सुकता दिखाएं
  • सभी देश अपने वादों को पूरा करने के लिए जरूरी कानूनी, संस्थागत एवं नीतिगत विकास करने की प्रतिबद्धता जताएं।
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