बिजनेस स्टैंडर्ड - सीओपी26 सम्मेलन में ठोस चर्चा समय की मांग
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सीओपी26 सम्मेलन में ठोस चर्चा समय की मांग

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  11 01, 2021

यह दुनिया के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण समय है। दुनिया भर के नेता स्कॉटलैंड के ग्लासगो में एकत्रित हैं। वे जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसी) की 26वीं कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (सीओपी26) के तहत इस स्वीकारोक्ति के साथ मिल रहे हैं कि समय हाथ से निकल गया है। विज्ञान हमें बता चुका है कि हमारे सामने आपात स्थिति आ चुकी है। संयुक्त राष्ट्र प्रमुख भी जलवायु वैज्ञानिकों के निष्कर्षों के आधार पर यह कह चुके हैं कि मानवता के लिए खतरा उत्पन्न हो चुका है। लेकिन हमें यह जानने के लिए वैज्ञानिकों की आवश्यकता नहीं है। बरबादी तो हमारी आंखों के सामने है। हर रोज किसी न किसी हिस्से में मौसम की बरबादी की खबरें आती रहती हैं। सीओपी26 की बैठक कोविड-19 के कारण एक वर्ष की देरी से हो रही है। उसके सामने अपने एजेंडे को नए सिरे से तैयार करने की चुनौती है। बीते कुछ दशकों में जलवायु वार्ताएं काफी हद तक अपना उद्देेश्य गंवा चुकी हैं। ढेर सारी समितियां, संस्थान और फंड स्थापित किए गए ताकि जलवायु परिवर्तन का प्रबंधन किया जा सके लेकिन इस दिशा में वास्तविक प्रगति कम और कागज पर ज्यादा हुई।

सीओपी26 का शीर्ष एजेंडा यही होना चाहिए कि वह अपना नेतृत्व दोबारा हासिल करे और अमीर और गरीब हर वर्ग के लोगों का विश्वास नए सिरे से कायम करे। यानी उसे अपनी कार्य योजना को स्पष्ट करना होगा और भविष्य में नहीं बल्कि तत्काल जो कुछ किया जाना है उस पर ध्यान केंद्रित करना होगा। पहली बात, इस बात की अत्यधिक आवश्यकता है कि उत्सर्जन में कमी को लेकर 2030 के लिए ठोस योजना बने और यह सुनिश्चित किया जाए कि चीन पर ध्यान दिया जाए जो पहले ही 2020 से 2030 के बीच के पहले ही कम हो चुके कार्बन बजट के 30 फीसदी पर काबिज है। चीन बीते कल के अमेरिका के समान है और उसके सामने सचबयानी करना आवश्यक है। इसके बाद आवश्यकता यह है कि शेष कार्बन बजट पर चर्चा की जाए ताकि ताप वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जा सके। यह भी देखना होगा कि इस बजट को किस प्रकार आवंटित किया जाएगा।

जब तक समता की स्थिति न बने हम बहुत महत्त्वाकांक्षी समझौतों पर नहीं पहुंच सकते। इसलिए सीओपी26 में उन गलतियों को नहीं दोहराया जाना चाहिए जो अतीत में की गईं। दुनिया के करीब 70 फीसदी हिस्से को अभी विकास करने का अधिकार है। इस प्रक्रिया में उपलब्ध बजट को पार कर जाना लाजिमी नजर आता है। यानी एक दूसरे पर निर्भर इस दुनिया में सभी खतरे में होंगे।

हमें पता है कि भारत जैसे देशों को वह गलती नहीं करनी है जो विकसित देश पहले ही कर चुके हैं। दुनिया को कम कार्बन वाली वृद्धि वाली राह सुनिश्चित करने के लिए दुनिया को कम कार्बन उत्सर्जन वाला वृद्धि का मार्ग तलाशना है। विकासशील देशों द्वारा इस बदलाव को अपनाने के लिए कीमत भी चुकानी होगी। उभरते विश्व पर अंगुली उठाने और भविष्य के उत्सर्जन को लेकर उसे शर्मिंदा करने से रिश्तों में सुधार नहीं होने वाला। सीओपी26 में हमें इस असमानता की हकीकत को स्वीकार करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि इसे दूर किया जाए। तीसरी बात, एजेंडे में इस बात को शामिल करना होगा कि यह सब कैसे होगा। वित्तीय उपलब्धता को पारदर्शी और मापने लायक बनाना होगा। ऐसा करने से भरोसे की कमी दूर होगी। यहां चर्चा केवल वित्तीय सहायता के आकार की न हो बल्कि ऐसे नियम भी बनाए जाएं ताकि इस फंड स्थानांतरण का आकलन और पुष्टि हो सके।

मौजूदा प्रयास इस बात पर केंद्रित हैं कि एक बाजार  उपाय तैयार करने का सस्ता और बेहतर तरीका निकाला जा सके जिसकी बदौलत विकासशील देशों से कार्बन खरीद की लागत को कम से कम किया जा सके। ऐसे में जटिल और सस्ती स्वच्छ विकास प्रणाली को दोहराने नहीं दिया जाना चाहिए। इसके बजाय बाजार का इस्तेमाल परिवर्तनकारी कदमों के लिए किया जाना चाहिए ताकि कार्बन उत्सर्जन में ज्यादा कमी लाने वाली परियोजनाओं को इनके माध्यम से भुगतान किया जा सके। बाजार का संचालन सार्वजनिक नीति और इरादे की मदद से होना चाहिए और कार्बन ऑफसेट (किसी एक जगह कार्बन उत्सर्जन की भरपाई के लिए दूसरी जगह उत्सर्जन में कमी) के नाम पर नए घोटाले नहीं सामने आने देने चाहिए।

प्रकृति आधारित उपायों के बारे में भी अवश्य चर्चा की जानी चाहिए। इस बात का अवसर भी मौजूद है कि गरीब देशों की पर्यावरण रूपी संपत्ति और समुदायों की मदद से कार्बन उत्सर्जन कम करने को लेकर चर्चा हो क्योंकि वृक्ष तथा प्राकृतिक वातावरण कार्बन डाईऑक्साइड का अवशोषण करता है। इसे हम गरीबों की आर्थिक बेहतरी और उनकी आजीविका से जुड़े अवसर के रूप में भी देख सकते हैं। ऐसे में इस तरह के व्यवस्थित नियम बनाए जाने चाहिए ताकि वनों के बदले कार्बन ऑफसेट किया जा सके।

यदि ये तमाम कदम उठाए जाते हैं तो दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन को लेकर वह चर्चा और ऐसे कदम उठाने सुनिश्चित किए जा सकते हैं जो विविध संस्थानों, समितियों, फंड आदि की भीड़ में खो गए हैं और  इसलिए वास्तविक दुनिया में कोई अंतर नहीं पैदा हो पा रहा है। हम हालात की अनदेखी नहीं कर सकते और इसलिए हमें तत्काल कदम उठाने होंगे। विभिन्न देशों और समुदायों को जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में हो रहे बदलाव के कारण जो नुकसान उठाना पड़ रहा है उसका आकलन करने के लिए रॉकेट विज्ञान की जरूरत नहीं है। यही वजह है कि सीओपी26 में यह अवसर गंवाया नहीं जाना चाहिए। आशा की जानी चाहिए कि सीओपी की यह बैठक पिछले मौकों से अलग होगी।

Keyword: जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, ग्लासगो, सीओपी26 सम्मेलन, यूएनएफसीसी, कार्बन,
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