बिजनेस स्टैंडर्ड - यदि नाकाम हुई सीओपी 26 तो भारत की भी जवाबदेही
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Monday, December 06, 2021 02:37 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

यदि नाकाम हुई सीओपी 26 तो भारत की भी जवाबदेही

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  October 27, 2021

शायद हमें इस वर्ष ग्लासगो में आयोजित होने वाले जलवायु परिवर्तन सम्मेलन यानी 26वें कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (सीओपी26) से बहुत अधिक आशा नहीं पालनी चाहिए। कुछ माह पहले उचित ही यह आशा की जा सकती थी कि इस आयोजन के चलते जलवायु परिवर्तन से निपटने और कार्बन उत्सर्जन में कमी करने को लेकर वैश्विक महत्त्वाकांक्षा में इजाफा होगा। लेकिन खेद की बात है कि कुछ ऐसे कारक सामने आए जिनकी वजह से लगता है कि यह आशावाद गलत है।

इसके लिए कई देश जवाबदेह हैं। अमेरिका और यूरोपीय संघ की ही बात करें तो अमेरिका जलवायु संकट को नकारने वाले डॉनल्ड ट्रंप के युग से बाहर आ रहा है और वह पेरिस समझौते में दोबारा शामिल हुआ है। राष्ट्रपति जो बाइडन ने अप्रैल में कहा था कि दशक के अंत तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था कार्बन उत्सर्जन में 2005 की तुलना में 50-52 फीसदी कमी करेगी। इसके बावजूद इस विषय में उठाए गए कदम निराश करने वाले हैं। नए अमेरिकी प्रशासन के कदम 2030 तक की जाने वाली कटौती में बमुश्किल एक तिहाई का ही योगदान करते हैं। इस पर भी अमेरिकी सीनेट गंभीर आपत्ति कर रही है जहां एक निर्णायक सीनेटर कोयला संपन्न राज्य वेस्ट वर्जीनिया से आते हैं।

इस बीच यूरोपीय संघ ने अधिक विश्वसनीय लक्ष्य तय किए और कदम भी उठाए। परंतु उसकी महत्त्वाकांक्षाएं आंतरिक हैं: यूरोपियन ग्रीन डील यह सुनिश्चित करेगी कि पूंजी का बड़ा हिस्सा यूरोपीय संघ के भीतर ही जलवायु संवेदनशील परियोजनाओं में जाए। उसने सन 2026 से अपनी सीमा में प्रवेश करने वाली बात वस्तुओं पर कार्बन शुल्क लगाने का प्रस्ताव भी रखा है। दूसरे शब्दों में भारतीय संयंत्रों से जाने वाले स्टील को यदि अधिक उत्सर्जन वाली प्रक्रिया से बनाया गया तो उसे यूरोप में बिक्री के लिए प्रति टन अधिक कीमत पर बेचना होगा। इससे भारत समेत जलवायु परिवर्तन पर संभावित साझेदारों के साथ अविश्वास बढ़ा है।

सबसे अधिक ध्यान और सबसे कम वास्तविक निगरानी चीन के वादों की हुई है। उसने कहा था कि वह सन 2060 तक विशुद्ध शून्य उत्सर्जन यानी कार्बन निरपेक्ष हो जाएगा। उसने लक्ष्य इतना आगे का रखा है कि प्रभावी तौर पर उसके नए कोयला आधारित ताप बिजली घरों की शुरुआत पर कोई प्रतिबंध नहीं है और सन 2021 में भी नए बिजली घर शुरू करने की घोषणा कर रहा है। साल के पहले छह माह की घोषणाओं के अनुसार ही उसका उत्सर्जन 1.5 फीसदी बढ़ जाएगा।

समस्या का एक हिस्सा उसकी विशुद्ध शून्य उत्सर्जन की घोषणा की प्रकृति भी है। उसने निकट भविष्य में उत्सर्जन कम करने के लिए बड़े कदम उठाने के बजाय दूर के लक्ष्य तय किए हैं। ऐसे में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की बात से सहमत होना होगा कि ऐतिहासिक जवाबदेही वाले बड़े उत्सर्जकों को एक कड़ी समयसीमा में विधिक रूप से निर्धारित उत्सर्जन लक्ष्य के लिए आगे आना चाहिए। लेकिन भारत को भी अपने हिस्से की जवाबदेही निभानी होगी।

वार्ताकारों और अधिकारियों द्वारा विशुद्ध शून्य के निरर्थक लक्ष्य का प्रतिरोध सही है। हालिया इतिहास देखें तो भारत नीतिगत लक्ष्य चूकता रहा है लेकिन कुछ बातों के लिए उचित वजह नहीं है। ऐसा ही एक बिंदु है जलवायु वित्त। सन 2015 में पेरिस समझौते में विकसित देशों ने वादा किया था कि वे उभरते देशों को हरित तकनीक की ओर बदलाव में मदद के लिए 100 अरब डॉलर की राशि जलवायु वित्त के रूप में देंगे। उस पैसे का बहुत कम हिस्सा आया वह भी इसलिए क्योंकि यूरोपीय संघ ने अपनी जवाबदेही निभाई। भारत का जोर यह है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर कोई भी कदम शेष राशि की उपलब्धता से तय होना चाहिए। बात यह नहीं है कि यह मांग उचित है या नहीं। बात यह है कि यह रचनात्मक नहीं है और भारत की दृष्टि से भी यह लाभप्रद नहीं है। ज्यादा से ज्यादा भारत को इस वर्ष 100 अरब डॉलर के वृद्धिकारी अनुदान का छोटा सा हिस्सा मिलेगा। जबकि अगले एक दशक में उभरते विश्व को नवीकरणीय ऊर्जा से लेकर सतत जल स्रोतों तथा शून्य उत्सर्जन की दिशा में बढऩे के लिए हरित बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिए लाखों करोड़ डॉलर की आवश्यकता होगी।

देश के अफसरशाह और अधिकारी महज कुछ अरब रुपये से प्रसन्न हैं क्योंकि यह राशि उनका बजट सुधारने में जाएगी। बहरहाल यदि देश को समुचित तरीके से जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में आगे ले जाना है तो बड़ी धनराशि के होते हुए इस कमतर राशि पर प्रसन्न होना अपने कर्तव्य से पीछे हटने जैसा है। सच तो यह है कि भारत और अन्य उभरते देशों को जिन लाखों करोड़ रुपयों की आवश्यकता है, यदि वह सरकारी बजट में अनुदान राशि के रूप में नहीं बल्कि हरित तथा अन्य क्षेत्रों में निजी निवेश के रूप में आएगी। भारत सरकार ने औद्योगिक नीति संबंधी हालिया कदमों की बदौलत कुछ क्षेत्रों को अलग-थलग कर दिया है। बैटरी क्षेत्र भी ऐसा ही एक उदाहरण है। परंतु यह समझने की आवश्यकता है कि अहम पूंजी प्रवाह के संबंध में वैश्विक समझौता और साझा नियमन आवश्यक हैं तभी इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाया जा सकता है। जलवायु वित्त को लेकर इस समझौते में जोखिम कम करने, लक्षित निवेश और परियोजना की तैयारी में सहायता जैसे क्षेत्रों को भी शामिल किया जाना चाहिए। सीओपी26 ऐसी वैश्विक सहमति बनाने के मामले में सही जगह है।

भारत को दक्षिण अफ्रीका का अनुसरण करना चाहिए। कोयला समृद्ध इस देश को अपनी कर्ज ग्रस्त सरकारी बिजली कंपनी एस्कॉम को कोयला संयंत्रों से नवीकरणीय में बदलने के लिए करीब 28 अरब डॉलर की जरूरत होगी। यही वजह है कि दक्षिण अफ्रीका ने ग्रीन फाइनैंसिंग के लिए ऋण की अदलाबदली का प्रस्ताव रखा है। यानी अगर एस्कॉम नवीकरणीय ऊर्जा में बड़ा निवेश करना शुरू कर दे तो उसके कर्ज समाप्त कर दिए जाएंगे। भारत के जलवायु दूतों को भी इसी तर्ज पर कुछ बड़ा सोचने की आवश्यकता है। हमें इस दिशा में प्रयास करना चाहिए।

Keyword: सीओपी 26, ग्लासगो, 26वें कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज, जलवायु परिवर्तन, कार्बन उत्सर्जन,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या देश में कोविड टीके की बूस्टर खुराक लगाई जाएं?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.