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नदियों का पुनर्जीवन और जल नीति का पुनरुद्धार

मिहिर शाह /  October 25, 2021

अनादि काल से भारत के लोगों का नदियों के साथ बेहद आत्मीय रिश्ता रहा है और यह हमारे सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का एक अविभाज्य अंग है। तमाम लोग नदियों के जल को पवित्र और उपचारात्मक शक्ति से लैस मानते हैं। हालांकि आजादी के बाद से अपनाई गई जल नीति ने नदियों को बुनियादी तौर पर आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति करने वाले एक संसाधन के तौर पर ही देखा है। नदियों के संबंध में इस मशीनी नजरिये ने उनकी हालत को काफी खराब किया है और आज स्थिति यह हो गई है कि कई नदियों का प्रवाह बेहद कम हो गया है और वे प्रदूषण से भरे नाबदान बन चुकी हैं।

नई राष्ट्रीय जल नीति में हमारी नदी प्रणालियों को पुनर्जीवित करने को सबसे ज्यादा अहमियत दी गई है। नदियों की अनमोल आर्थिक भूमिकाओं को स्वीकार करने के साथ ही नदियों के संरक्षण एवं पुनरुद्धार को प्राथमिकता एवं बुनियादी अहमियत दी गई है। इसके लिए अब यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि नीति में फौरन बदलाव के बगैर आर्थिक या कोई अन्य उपयोगी उद्देश्य पूरा करना तो दूर, हमारी नदियों का गौरव भी जल्द ही अतीत की बात हो जाएगा।

नदियों को विशुद्ध रूप में नदी-भूदृश्य कहा जाता है क्योंकि वे असल में अंतर्संबद्ध जलविज्ञान एवं पारिस्थितिकी प्रणालियां हैं। एक नदी सिर्फ जल धारा तक ही सीमित नहीं होती है बल्कि उसमें सभी तरह की जलधाराएं एवं उनके जलग्रहण-क्षेत्र का भी समावेश होता है। नई जल नीति में कहा गया है कि नदी घाटियों को पानी-ऊर्जा-जैवविविधता-तलछट के एक गतिशील साम्यावस्था के रूप में देखा जाना चाहिए। इस तरह जैव विविधता, भू-संरचना, जलनिकासी, आर्द्र भूमि एवं जलवाही स्तर जैसे विभिन्न घाटी अवयवों की अखंडता बनाए रखना बेहद अहम है।

नई जल नीति में यह अनुशंसा की गई है कि जलदायी क्षेत्र समेत नदी घाटी को ही किसी भी जल संरक्षण एवं पुनरुद्धार योजना की इकाई बनाया जाना चाहिए। निचले स्तर से ऊपरी स्तर तक नदी घाटी संगठनों का ढांचा खड़ा किया जाए ताकि वे लोकतांत्रिक, समावेशी, बहुल-हितधारक मंचों के तौर पर काम कर सकें। नदियों में फिर से प्रवाह लाने के लिए तत्काल ये कदम उठाने की जरूरत है- जलग्रहण क्षेत्रों में फिर से वनस्पतियां उगाना, भूजल निकासी का सख्त नियमन और नदी ताल से पानी निकालना, बालू एवं कंकर के बेहिसाब खनन पर लगाम लगाना और मुख्य जलधारा एवं उसकी सहायक नदियों पर बने सभी ढांचों का पर्यावरणीय प्रवाह बनाए रखना। पर्यावरणीय प्रवाह का आकलन एक समयबद्ध तरीके से सभी नदी घाटियों के लिए किया जाना चाहिए ताकि साल के सभी मौसम में नदियों में समुचित जल प्रवाह को सुनिश्चित किया जा सके। इससे नदियां अपने सारे पारिस्थितिकीय प्रकार्यों को अंजाम दे सकती हैं जिनमें भूजल रिचार्ज और स्थानीय स्तर के खास बायोटा (किसी विशेष क्षेत्र में मौजूद सभी पेड़-पौधों एवं पशु-पक्षियों) को दिया जाने वाला प्रोत्साहन भी शामिल है। नई जल नीति में कहा गया है कि नदियों में अविरल धारा सुनिश्चित किए बगैर निर्मल धारा का होना असंभव है। इसमें नदियों का अधिकार अधिनियम का मसौदा तैयार करने के लिए सभी हितधारकों के बीच गहन विचार-विमर्श की बात भी की गई है ताकि नदियों को समग्र कानूनी संरक्षण मिल सके। इस तरह नदियों को प्रवाह बनाए रखने, इधर-उधर घुमावदार मार्ग से होते हुए बहने और समुद्र से मिलन का अधिकार दिया जा सकेगा।

आजादी के बाद की बाढ़ नीति मुख्य रूप से बड़े बांधों एवं तटबंधों पर ही केंद्रित रही है। लेकिन समय के साथ समस्या बढ़ती ही गई है। तटबंधों में दरार आने, खराब ढंग से बनीं एवं खराब रखरखाव वाली नहरें और बाढ़ से प्रभावित होने वाले मैदानों एवं जल-निकासी रेखाओं पर बस्तियां बसाने से भी स्थिति बिगड़ी है। तटबंधों ने पहले से ही गाद से भरी नदियों में नाटकीय रूप से तलछट बढ़ा दी है। ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अपरदन होने से नदियों में गाद बढ़ती गई है। इस तरह नदियों का तल उठने से नदियों के स्वभाव में अस्थिरता आई है और अक्सर तटबंध तोड़कर रिहायशी इलाकों तक बाढ़ का पानी पहुंचने लगा है। नदी या समुद्र की तरफ जाने वाले प्राकृतिक मार्गों के नष्ट होने से बाढ़ की समस्या और भी बढ़ गई है। प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध होने से बाढ़ का पानी शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में हमारे घरों एवं कार्यस्थलों तक पहुंचने लगा है।

इस लिहाज से बाढ़ प्रबंधन के बारे में हमारा समग्र दृष्टिकोण बाढ़ नियंत्रण की जगह 'बाढ़-सूचित विकास' या 'बाढ़ के संदर्भ में लचकदार जीवन एवं आजीविका का निर्माण' होना चाहिए। बाढ़ की आशंका वाली नदी प्रणालियों में 'नदी को जगह देने' वाली परियोजनाएं नदी-केंद्रित ढंग से चलाई जानी चाहिए। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 में उल्लिखित नदी नियमन क्षेत्रों का निर्धारण कर अधिसूचित कर देना चाहिए ताकि नदी-तटों एवं बाढ़ के मैदानों में विकास-जन्य हस्तक्षेपों को रोका जा सके।

पानी के संरक्षण और 'सेवा की भावना और देखभाल की नैतिकता' के वाहक के तौर पर महिलाओं की अहम भूमिका को स्वीकार करते हुए नई जल नीति के हरेक खंड में लिंग का खास तौर पर जिक्र किया गया है। जल नीति के सभी खंडों को लैंगिक रूप से संवेदनशील बनाने के साथ ही इसके लिए विशिष्ट प्रावधान भी किए गए हैं। जल नीति में काफी हद तक उपेक्षित इन आयामों पर बल देने के लिए लिंग, समानता एवं सामाजिक समावेशन पर एक पृथक खंड भी है। जल संसाधनों पर जलवायु परिवर्तन के विविध संभावित प्रभावों के कारण मौसमी घटनाओं में आए त्वरित बदलावों को स्वीकार करते हुए इस नीति में इन चुनौतियों से निपटने के लिए एक समग्र कार्रवाई का एजेंडा भी रखा गया है। नई जल नीति का संस्थापक सिद्धांत ही यह है कि इसमें भारत की अतिशय विविधता की झलक मिलनी चाहिए।

इस बात के मद्देनजर देश के तीन भौगोलिक इलाकों- हिमालयी, वर्षा वाले क्षेत्र और तटीय क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया गया है। अतीत में उपेक्षा के शिकार रहे इन इलाकों की खास जरुरतों को ध्यान में रखते हुए जल नीति में विशेष प्रावधान रखे गए हैं। अंतर्देशीय जलीय मार्गों पर आवागमन और परिवहन के लिए नीति में बेहतर नियमन, सुधरी हुई व्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था एवं अधिक सक्षम परिचालन  के लिए निवेश की जरूरत पर जोर दिया गया है। जल नीति में कहा गया है कि स्थानीय समुदायों के यात्री एवं माल परिवहन के साथ ही छोटे कारोबारों एवं विनिर्माताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ऐसा करने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिलेगा और रोजगार अवसर भी पैदा होंगे।

विश्वसनीय आंकड़ों का साथ मिलने पर जल प्रबंधन अधिक असरदार हो जाता है। हाल में भारत जल संसाधन सूचना प्रणाली जैसे बढिय़ा सुधार होने के बावजूद आंकड़ों के दायरे एवं गुणवत्ता में अब भी बड़ी खाई मौजूद है। नई जल नीति में वास्तविक समय में डेटा उपलब्धता की तरफ अग्रसर समग्र डेटा संकलन जैसी कई अनुशंसाएं की गई हैं। केंद्र एवं राज्यों की सरकारों, शोध संस्थानों और नागरिक समाज रूपी विभिन्न हितधारक इस तरह से साझा राष्ट्रीय प्रयास करें जो सही मायनों में डेटा संकलन, विश्लेषण एवं अनुप्रयोग को लोकतांत्रिक बनाए। नई जल नीति जल अनुसंधान का व्यापक एवं केंद्रित एजेंडा पेश करने के साथ यह भी बताती है कि पानी से संबंधित शिक्षा को प्राथमिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक पाठ्यचर्चा का अविभाज्य हिस्सा बनाने की जरूरत है।

(लेखक शिव नाडर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। वह नई राष्ट्रीय जल नीति का मसौदा बनाने वाली समिति के चेयरमैन रहे हैं)

Keyword: नदियों का पुनर्जीवन, जल नीति, प्रदूषण, भूजल, बांध, जल संसाधन, जलवायु परिवर्तन,
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