बिजनेस स्टैंडर्ड - भारत में ई-कॉमर्स से जुड़ी बड़ी बहस
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भारत में ई-कॉमर्स से जुड़ी बड़ी बहस

अजित बालकृष्णन /  October 22, 2021

उपभोक्ता ई-कॉमर्स के बारे में आने वाली खबरें लगातार बढ़ती जा रही हैं। कुछ दिन पहले एमेजॉन की तुलना ईस्ट इंडिया कंपनी से की गई तो भारत सरकार ने आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर डिजिटल कॉमर्स को लोकतांत्रिक बनाने का वादा किया। इसी तरह चीन से आने वाली रिपोर्ट बताती हैं कि चीन की सरकार ने दिग्गज ऑनलाइन कंपनी अलीबाबा पर एकाधिकार तोडऩे वाले नियमों के उल्लंघन के आरोप में 2.75 अरब डॉलर का जुर्माना लगाया है। फिर ऐसी रिपोर्ट भी आईं कि भारत सरकार बाजार नियामक सेबी की तर्ज पर ई-कॉमर्स गतिविधियों के नियमन के लिए एक स्वतंत्र अधिकरण के गठन के बारे में विचार कर रही है।

लेकिन मुझे इस बात को कोई आश्चर्य नहीं है कि ई-कॉमर्स के संदर्भ में ऐसा प्रतिकूल रुख कहां से पैदा हो रहा है? मसलन, क्या इसकी वजह से ही किताब पढऩे के शौकीन लोगों के लिए महज एक क्लिक पर किताब घर पर मंगाना आसान नहीं हो गया। या फिर घूमने-फिरने के शौकीन लोगों को हवाई टिकट खरीदने के लिए लंबी कतारों में नहीं लगना पड़ता है या एक युवा के लिए किसी जॉब साइट पर अपना ब्योरा अपलोड करने के साथ ही अनगिनत रोजगार अवसर मिलने लगते हैं।

जब आप थोड़ा और गहराई से देखेंगे तो आप तेजी से घबराने लगते हैं। हमारे देश में ग्रॉसरी की लाखों छोटी दुकानें हैं और हजारों ट्रैवल एजेंट एवं अन्य गतिविधियों से जुड़े लोग हैं। इस तरह भारत को समकालीन दौर में 'दुकानदारों का देश' कहा जा सकता है। वैसे मौलिक रूप से 'दुकानदारों के देश' शब्दावली का इस्तेमाल नेपोलियन ने ब्रिटिश सत्ता की व्याख्या करते हुए किया था। अगर आज कोई भी देश सही मायने में दुकानदारों का देश कहा जा सकता है तो वह भारत ही है। फिलहाल भारत में करीब 1.3 करोड़ छोटी किराना दुकानें हैं जो देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 10 फीसदी का योगदान देती हैं और भारत के रोजगार में 8 फीसदी हिस्सेदारी रखती हैं। तथाकथित आधुनिक खुदरा के सिर्फ 8,000 आउटलेट हैं जो कुल कारोबार का सिर्फ 0.05 फीसदी है। इसी तरह ऑनलाइन कॉमर्स भी खुदरा बिक्री के 2 फीसदी से भी कम है।

फिर इंटरनेट 'मध्यवर्ती' कंपनियों को नियंत्रित करने वाले नए कानूनों के बारे में तीखी बहसें सुर्खियां क्यों बन रही हैं? पहले हमें उस धारणा से जूझना होगा कि 'मध्यवर्ती' कंपनियां वजूद में क्यों हैं, आखिर वे क्या हैं और क्या नहीं हैं? सबसे खास बात यह है कि 'मध्यवर्ती' कंपनियां इंटरनेट के दौर में उतनी ही अहम क्यों हैं जितने औद्योगिक काल में कारखाने हुआ करते थे?

इंटरनेट और वल्र्ड वाइड वेब के सही ढंग से काम करने और उत्पादकता बढ़ाने के अपने सभी वादों पर खरा उतरने के लिए उसे एक ऐसी इकाई की जरूरत होती है जो ऐसी सेवा या उत्पाद पेश करे जो उसके इस्तेमाल या खरीदने की चाहत रखने वालों के साथ मेल खाता हो। इसकी वजह यह है कि औद्योगिक काल में कारखानों ने जिस तरह से बड़े पैमाने पर उत्पादन कर उसकी लागत कम करने में योगदान दिया था, उसी तरह मध्यवर्ती कंपनियां नेटवर्क प्रभाव लेकर आती हैं जो तालमेल बिठाने की प्रक्रिया में बढ़ी हुई सक्षमता हासिल के लिए अहम होता है। तालमेल की इस प्रक्रिया के सामाजिक लाभ हासिल करने के लिए हमें यह सुनिश्चित करना होता है कि मेल बिठाने की प्रक्रिया में किसी भी पक्ष का कोई खिलाड़ी व्यवस्था के साथ खेल न कर दे। मध्यवर्ती नियमों और मध्यवर्ती दिशानिर्देशों का ताल्लुक व्यवस्था में खेल की कोशिश को दूर करने की कोशिश ही है।

ऑनलाइन दुनिया के खिलाड़ी किन तरीकों से इंटरनेट मध्यवर्ती व्यवस्था के साथ खेल कर रहे हैं? इसका सटीक उदाहरण मध्यवर्ती के दोतरफा काम के एक पक्ष को सब्सिडी देना है। इस तरह की सब्सिडी देने से इंटरनेट कंपनियां भारी परिचालन घाटे में आ जाती हैं और इसी के साथ उन्हें निजी इक्विटी या वेंचर कैपिटल निवेशकों और बाजारों दोनों से तगड़ा मूल्यांकन भी मिलता है।

एक दूसरा खेल वॉलमार्ट के मॉडल पर चलता है। वॉलमार्ट ने भारत में खुद को स्थापित करने के लिए कई वर्षों तक संघर्ष किया लेकिन राजनीतिक रूप से सशक्त खुदरा विक्रेताओं के तगड़े प्रतिरोध से पार नहीं पा सका था। ऐसी स्थिति में उसने ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट को खरीदने का तरीका अपनाया। भारत के युवा स्टार्टअप संस्थापकों की एक सफल कहानी के तौर पर फ्लिपकार्ट की तारीफ होती थी लेकिन असल में यह वॉलमार्ट के भारत में पिछले दरवाजे से प्रवेश का जरिया बना। अब तो हर रोज छपने वाले सफल स्टार्टअप से जुड़ी पर्दे के पीछे की कहानियों पर गौर करना होगा। बर्कली स्थित कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के बार्थोलोम्यू वॉटसन जैसे विद्वानों का मानना है कि हर देश में सामने आने वाले अंतिम परिणाम आर्थिक या तकनीकी घटकों के बजाय काफी हद तक राजनीतिक कारकों पर निर्भर करते हैं। प्रोफेसर वॉटसन कहते हैं, 'खुदरा विक्रेता राजनीतिक अर्थव्यवस्था में सर्वाधिक संबद्ध होते हैं और उनका उपभोक्ताओं, आपूर्तिकर्ताओं, कार्यकर्ताओं और स्थानीय एवं राष्ट्रीय सरकारों जैसे तमाम आर्थिक-राजनीतिक अभिकर्ताओं से ताल्लुक होता है।'

हम ऐसी कुछ ताकतों को भारत में छोटे दुकानदारों को सशक्त करते हुए पहले से ही देख सकते हैं। जियोमार्ट व्हाट्सऐप जैसे ऐप की मदद से लाखों छोटी दुकानों तक पहुंचने की योजना बनाने में लगा हुआ है। भारत में किराना दुकानों को नई प्रौद्योगिकी से जोडऩे के लिए बड़े स्तर पर चलाया जा रहा आंदोलन इसकी एक मिसाल है।

इसके अलावा चीन की सरकार के उस ऐलान पर भी गौर करना  चाहिए जिसके मुताबिक अलीबाबा, बायडू और टेनसेंट जैसी दिग्गज चीनी टेक कंपनियों को नियंत्रित करने के लिए जल्द ही नए नियम जारी किए जाएंगे। इसके जरिये उन कंपनियों को बाजार में व्यवस्था बाधित करने, उपभोक्ता अधिकारों को चोट पहुंचाने या डेटा सुरक्षा पर खतरे की किसी भी कोशिश को रोका जाएगा। अलीबाबा पर जुर्माना लगाने के अलावा एक नई मसौदा नीति में एडुटेक कंपनियों को गैर-लाभकारी रहने के लिए भी बाध्य किया जाएगा ताकि गरीब छात्रों एवं उनके माता-पिता पर से दबाव को कम किया जा सके।

क्या हमें यह पाठ करते रहना होगा कि 'यह बेहतरीन वक्त था, यह बदतर समय था, यह बुद्धिमानी का काल था, बेवकूफी का समय था, विश्वास का काल था, अविश्वास का दौर था, रोशनी का मौसम था, अंधेरे का काल था, उम्मीद का सबेरा था और नाउम्मीदी का अंत था।' या फिर हम अपनी पूरी ऊर्जा जुटाकर भारत के प्रतिस्पद्र्धा अधिनियम एवं सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम जैसे औद्योगिक-काल के कानूनों का पुनर्परीक्षण करें और दुकानदारों के इस देश को सूचना युग की तरफ ले जाने की पहल करें?

(लेखक इंटरनेट उद्यमी हैं)

 
Keyword: ई-कॉमर्स, छोटे दुकानदार, एमेजॉन, ईस्ट इंडिया कंपनी, अलीबाबा, जुर्माना,
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