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भारत की 'आधुनिक' महिलाओं के समक्ष मौजूद समस्याएं

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  October 23, 2021

कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री के सुधाकर का कहना है कि 'आधुनिक' महिलाएं विवाह की इच्छुक नहीं होतीं और अगर वे शादी करना भी चाहती हैं तो बच्चे पैदा नहीं करना चाहतीं और इसके लिए सरोगेसी का विकल्प चुनती हैं। वह नाराजगी के साथ कहते हैं कि यह समाज पर 'पश्चिमी प्रभाव' के कारण हुआ है और महिलाओं के सोच में आमूलचूल बदलाव आया है जो ठीक नहीं है।

चूंकि मंत्री ये टिप्पणियां विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर दिए जाने वाले भाषण के संदर्भ में कर रहे थे इसलिए यह सोशल मीडिया पर शर्मनाक ढंग से फैल गया। उनकी पार्टी इस विचार का समर्थन नहीं करना चाहेगी। क्यों? क्योंकि उत्तर प्रदेश में उनकी ही पार्टी की सरकार ने परिवार नियोजन के नियम पारित किए हैं जिनका लक्ष्य शायद महिलाओं को कम संतानों के साथ ज्यादा 'आधुनिक' बनाने का है। प्रधानमंत्री ने बार-बार बालिकाओं को शिक्षित करने और महिलाओं को करियर में आगे बढ़ाने की बात की है।

इसलिए उसी दिन अनुमानित स्पष्टीकरण सामने आ गया:  उन्होंने कहा कि उनकी बात को संदर्भ से काटकर पेश किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणियां यूगव-मिंट-सीपीआर मिलेनियल सर्वे पर आधारित थीं जिसमें दिखाया गया था कि सन 2000 में पैदा होने वालों में से 19 फीसदी युवा शादी या बच्चों में रुचि नहीं रखते जबकि सन 2000 के बाद पैदा होने वालों में इनकी तादाद 23 फीसदी है। उन्होंने कहा कि यह निष्कर्ष लड़कों और लड़कियों दोनों पर लागू होता है।

ठीक है लेकिन इन बातों को मानसिक स्वास्थ्य के मसले से कैसे जोड़ा जा सकता है, जबकि उनका भाषण तो इसी विषय पर आधारित था। मंत्री ने यह भी कहा कि वह एक व्यापक बिंदु पर बात कर रहे थे कि भारत के संयुक्त परिवारों की सामूहिकता से तनाव, दबाव और अवसाद आदि से जूझ रहे लोगों को व्यक्तिवादी पश्चिमी समाज की तुलना में अधिक सहारा मिलता है। हालांकि उन्होंने अपनी बात के समर्थन में कोई आंकड़ा नहीं दिया। यह भी स्पष्ट नहीं है कि पुरुषों और महिलाओं का संतान पैदा करने या न करने का चयन मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं से कैसे जुड़ा है।

यदि हम यह मान लें कि वह परिवारों, बच्चों और मानसिक स्वास्थ्य के बीच कुछ संबंध स्थापित करना चाह रहे हैं तो निम्रलिखित बातों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वल्र्ड हैप्पीनेस इंडेक्स पिछले कुछ वर्षों से काफी चर्चा में है। संभव है कि यह इस गहन व्यक्तिपरक गुण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मापने का आदर्श तरीका नहीं हो लेकिन यह समग्रता बनाम परंपरा की बहस की जांच की दृष्टि से किसी भी अन्य पैमाने की तरह ही बेहतर है। इस सर्वे के मुताबिक दुनिया का सबसे खुशहाल मुल्क फिनलैंड है। दिलचस्प बात यह है कि इस नतीजे ने खुद फिनलैंड के लोगों को भी चकित कर दिया।

फिनलैंड शीर्ष पर कैसे आया? सर्वे में (149 देशों के) लोगों से कहा जाता है कि वे अपने जीवन का आकलन शून्य से 10 के पैमाने पर करें। सबसे बुरे जीवन के लिए शून्य और सर्वश्रेष्ठ जीवन के लिए 10 अंक निर्धारित किया जाता है। चूंकि जीवन की आम संतुष्टि में जीवन गुणवत्ता, सामाजिक बुनियादी ढांचे तक पहुंच, व्यक्तिगत सुरक्षा, दमन से आजादी आदि शामिल हैं ऐसे मेंं आश्चर्य नहीं कि फिनलैंड और स्कैंडिनैविया के अन्य देश शीर्ष पर नजर आते हैं और अफगानिस्तान जैसा मुल्क एकदम निचले स्तर पर। यह भी दिलचस्प है कि उत्तरी यूरोप के देशों ने इन निष्कर्षों को तवज्जो नहीं दी। उन्होंने कहा कि रैंकिंग असंवेदनशील है और उन नागरिकों की अनदेखी करता है जो अपने जीवन का मूल्यांकन करने में संघर्ष करते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य और संयुक्त परिवार की इस दलील के पीछे दिलचस्प बात यह है कि सन 1990 और 2020 के बीच इस खुशहाल देश का समाज 'बच्चों के साथ विवाहित' से 'बिना बच्चों के विवाहित' परिवारोंं तक की दूरी तय कर चुका है। भारत तथा उसके आसपास के देशों में जहां संयुक्त परिवार की व्यवस्था सबसे अधिक प्रचलित है वहां भारत 149वें, पाकिस्तान 105वें और बांग्लादेश 101वें स्थान पर है।

सुधाकर के बयान में उल्लेखनीय बात यह है कि उन्होंने 'आधुनिक' महिलाओं को अलग से रेखांकित किया। मान लेते हैं कि 'आधुनिक' का अर्थ है ऐसी महिलाएं जो नौकरी करती हैं और जिनका करियर है। उन्होंने बच्चों की चाह में कमी (उनके मुताबिक) को संयुक्त परिवार के कमजोर होते समर्थन से नहीं जोड़ा। परंतु एकल परिवार एक ऐसी हकीकत हैं जिसे बदला नहीं जा सकता। आज देश में आधे परिवार एकल परिवार हैं और इस बात का पश्चिमीकरण से भी कोई लेनादेना नहीं है। सच तो यह है कि सामाजिक इकाइयों का यह पुनर्गठन भी दंपतियों द्वारा बच्चे नहीं पैदा करने के निर्णय में अहम भूमिका निभाता है। युवा दंपतियों की अपनी संतान के पालन पोषण के लिए मां, सास या दादा-दादी पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति तेजी से कम हो रही है।

लेकिन सबसे बढ़कर यदि बच्चों की पैदाइश को लेकर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी कोई बात है भी तो वह भारतीय पुरुषों से जुड़ी हुई है। ऐसा प्रमुख रूप से इसलिए क्योंकि भारतीय पुरुष बच्चों की ही नहीं बल्कि बुजुर्ग मातापिता की देखरेख का दायित्व संभालने के अनिच्छुक नजर आते हैं।

कामकाजी महिलाएं लंबे समय से ऐसी असमान घरेलू व्यवस्था का कष्ट सहती रही हैं। महामारी से इस असमानता में और अधिक इजाफा हुआ। यह सही है कि महिलाओं को घर से काम करने की सुविधा मिली लेकिन उन्हें घर के कामकाज और बच्चों के देखभाल की अतिरिक्त जवाबदेही भी निभानी पड़ी। औसत भारतीय पुरुष यह दायित्व नहीं निभाते।

ऐसे में अगर बच्चा पैदा करने और परिवार पालन को लेकर कोई बात करनी है तो वह औसत भारतीय पुरुषों के बारे में होनी चाहिए। आधुनिक महिलाएं भी राजनेताओं से इस बारे में कुछ सुनना चाहेंगी।

Keyword: आधुनिक महिला, विवाह, सरोगेसी, सोशल मीडिया, मानसिक स्वास्थ्य, हैप्पीनेस इंडेक्स,
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