बिजनेस स्टैंडर्ड - दो 'ए' और...
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Monday, December 06, 2021 02:55 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

दो 'ए' और...

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  October 23, 2021

अमेरिका के ब्राउन विश्वविद्यालय में भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी एक बेहतरीन प्रस्तुति में देश के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने दो 'ए' की 'असाधारण पहुंच' का उल्लेख किया। उनका तात्पर्य अंबानी और अदाणी से था। उन्होंने इन कारोबारी समूहों के बढ़ते दबदबे को 'वैश्विक पूंजीवादी इतिहास में विशिष्ट' करार दिया। देश में यह विषय आम बातचीत का हिस्सा बन चुका है, खासतौर पर इन समूहों का सरकार से रिश्ता। यह कितना विशिष्ट है यह बहस का विषय है।

दोनों समूहों को इनकी अद्भुत कारोबारी समझ के लिए जाना जाता है लेकिन वह तो अन्य लोगों के पास भी है। यदि वे औरों से अलग हैं तो ऐसा इसलिए कि उनमें अपना दबदबा कायम करने की भूख है और आम धारणा है कि इस काम में उनकी सहायता की जाती है। अंबानी ने पेट्रोकेमिकल्स और पेट्रोलियम, दूरसंचार, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, संगठित खुदरा और मनोरंजन क्षेत्र में दबदबा बनाना चाहा। जबकि तेजी से बढ़ता अदाणी समूह लंबे समय से देश का सबसे बड़ा कोयला आयातक और सौर ऊर्जा समेत निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा बिजली कारोबारी तो है ही, अब वह देश में सबसे अधिक बंदरगाहों और हवाई अड्डों का भी मालिक है। दोनों समूहों ने अब तक एक दूसरे का रास्ता नहीं काटा है लेकिन हरित ऊर्जा को लेकर की गई घोषणाओं के बाद उनका टकराना तय है। दोनों की प्रतिष्ठा सरकार पर प्रभाव रखने की है। वे एक से अधिक प्रतिस्पर्धियों को पछाड़ चुके हैं।

बहरहाल, इन बातों से इतर विशिष्टता के मुद्दे पर वापस लौटते हैं, खासतौर पर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि डॉ. सुब्रमण्यन ने इनकी तुलना दक्षिण कोरिया के परिवार नियंत्रित चैबल समूह और जापान के पारिवारिक स्वामित्व वाले समूह जाइबत्सु (दूसरे विश्वयुद्ध के बाद संस्थागत ढांचे वाले केरेत्सु नेटवक्र्स द्वारा प्रतिस्थापित) की। चैबल और जाइबत्सु/केरेत्सु दोनों के आंकड़े दोनों 'ए' पर भारी हैं। अपने-अपने देशों की औद्योगिक पूंजी और परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी के मामले में वे दोनों 'ए' से कहीं आगे हैं और उनका कारोबारी विस्तार तुलनात्मक कहा जा सकता है। राजनीतिक संपर्कों की बात की जाए तो भारतीय समूहों का अपने राजनेताओं और सरकारों के साथ वैसा सहजीविता का संबंध नहीं होता है जैसा कि जापानी या कोरियाई समूहों का रहा है। चैबल शुरुआत में सरकार समर्थित राष्ट्रीय समूह था। वह और केरेत्सु भारी-भरकम राजनीतिक फंडिंग में शामिल रहे हैं। यदि कोई इसमें टाटा समूह को शामिल करना चाहे (जो परस्पर संबद्ध अंशधारिता और अधिनायकवादी रुख के कारण एक समय कुछ हद तक केरेत्सु जैसा रहा) तो वह एक होल्डिंग कंपनी और दीर्घावधि तक एकल परिवार के रूप में पहचानी जाने के कारण लंबवत ढांचे वाले जाइबत्सु की तरह बन चुकी है और इससे कहानी में कोई परिवर्तन नहीं आता। देश के तीनों बड़े समूह राष्ट्रीय स्तर के दबदबे के मामले में चैबल और केरेत्सु समूह के आसपास भी नहीं ठहरते। आखिरकार देश के स्टार्टअप यूनिकॉन्र्स का समेकित मूल्यांकन ही अंबानी के कुल साम्राज्य से अधिक है। इसके अलावा इन दो 'ए' के उलट टाटा समूह को दबदबा कायम करने या राजनीति के बंद गलियारों की राह लेने के लिए नहीं जाना जाता।

यहां दो सवाल हैं। पहला, चैबल समूह और केरेत्सु ने अपने-अपने देश में चमत्कारी वृद्धि और निर्यात की सफलता को गति दी है। उनके भारतीय समकक्षों के बारे में यह बात किस हद तक कही जा सकती है? इसके विपरीत सामूहिक दबदबे ने राष्ट्रीय स्तर पर किस हद तक क्षति पहुंचाई है? इन सवालों का जवाब बहुत विस्तारित दायरे में होगा। उदाहरण के लिए केरेत्सु की इस बात के लिए आलोचना की जाती रही है कि वह अपने परस्पर संबंधित रिश्तों की वजह से छोटी कंपनियों और प्रतिद्वंद्वियों को दूर रखती है। दूसरा सवाल यह है व्यवस्थित दबदबा कब तक चल सकता है? शायद दशकों तक। फिर भी केरेत्सु कारोबारी समूह मॉडल की विरासती कमजोरी की वजह से तेजी से कमजोर पड़ा। वह कमजोरी है एक होल्डिंग बैंक द्वारा समूह की कमजोर कंपनियों की मदद करना, जिससे पूंजी का गलत आवंटन होता है। सन 1990 के दशक जैसे बैंकिंग संकट आने पर केरेत्सु जैसे समूह प्रभावित होते हैं, वह हुआ भी। इसी तरह कोरिया में चैबल के खराब कारोबारी आचरण ने देश को सन 1997 के एशियाई वित्तीय संकट में धकेल दिया और सुधारों की मांग उठी। क्या देश में संकेंद्रित कॉर्पोरेट दबदबा मद्धम पड़ सकता है? यह कहना मुश्किल है क्योंकि नए प्लेटफार्मों और नेटवर्क कारोबार की प्रकृति में विजेता सर्वस्व हासिल कर लेता है। लेकिन रिलायंस की छवि पूंजी का किफायती इस्तेमाल करने की नहीं रही है। अदाणी समूह के आंकड़ों में विविधता है। यहां तक कि टाटा की सॉफ्टवेयर सेवा को हटा दिया जाए तो पूंजी किफायत पर उसका प्रदर्शन भी उल्लेखनीय नहीं। एयर इंडिया के आगमन से उसमें तो सुधार होने से रहा।

Keyword: अरविंद सुब्रमण्यन, अंबानी, अदाणी, वैश्विक पूंजीवादी इतिहास, बंदरगाह, हवाई अड्डे,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या देश में कोविड टीके की बूस्टर खुराक लगाई जाएं?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.