बिजनेस स्टैंडर्ड - जल गुणवत्ता और मांग प्रबंधन पर दें ध्यान
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, December 07, 2021 03:04 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

जल गुणवत्ता और मांग प्रबंधन पर दें ध्यान

मिहिर शाह /  October 18, 2021

नई राष्ट्रीय जल नीति (एनडब्ल्यूपी) में कहा गया है कि देश के जल संकट को आपूर्ति क्षेत्र की ओर से हल करने की संभावनाएं अब बहुत सीमित रह चुकी हैं। ऐसे में नीति में यह प्रस्ताव रखा गया है कि अब लंबे समय से उपेक्षित पानी के मांग क्षेत्र पर ध्यान देने की आवश्यकता है। सबसे अहम सुधार की जरूरत सिंचाई में है। देश में जितनी पानी की खपत होती है उसका 80 से 90 फीसदी हिस्सा सिंचाई में लगता है। और केवल तीन फसलें-चावल, गेहूं और गन्ना ही इस पानी का 80 फीसदी इस्तेमाल कर लेती हैं। यदि पानी की मांग के इस रुख में व्यापक बदलाव नहीं लाया गया तो लाखों लोगों की पानी की बुनियादी जरूरत पूरी नहीं हो सकती। पानी की कमी वाले इलाकों में भी पानी की भारी खपत वाली फसलों की खेती की जाती है क्योंकि किसानों को लगता है कि यही फसलें उन्हें उचित मूल्य दिला सकती हैं। ऐसा इसलिए है कि सरकारों ने गेहूं और चावल की सरकारी खरीद की व्यवस्था की है जबकि गन्ना मिलें, गन्ने की फसल खरीदती हैं। ऐसे में बिना राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को जोखिम में डाले फसलों में विविधता लाना देश के जल संकट को हल करने की दिशा में अहम कदम होगा।

इसके लिए नीति विशेषज्ञ यह सुझाव देते हैं कि फसल खरीद में विविधता लानी चाहिए और इसमें पोषक अन्न, दालों और तिलहन को शामिल किया जाना चाहिए। ऐसा करते समय स्थानीय कृषि पारिस्थितिकी को ध्यान में रखा जाना चाहिए। सन 2018 के पीएम-आशा (अन्नदाता आय संरक्षण अभियान) के लिए रखे गए प्रस्ताव की तरह ऐसी फसलों का कम से कम 25 फीसदी उत्पादन सरकार द्वारा खरीदा जाना चाहिए और अगर वह सार्वजनिक वितरण प्रणाली का हिस्सा हो तो इसे बढ़ाकर 40 फीसदी किया जाना चाहिए। इससे किसानों को धीरे-धीरे अपनी खेती में विविधता लाने का प्रोत्साहन मिलेगा और पानी की बचत होगी। ऐसी फसलों के लिए एकीकृत बाल विकास सेवाएं, मध्याह्न भोजन योजना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली, प्रमुख खरीदार साबित हो सकते हैं। यदि ऐसा हो सका तो यह देश में कुपोषण और मधुमेह के दोहरे खतरे के खिलाफ एक मजबूत हथियार साबित हो सकता है क्योंकि ये फसलें चावल और गेहूं की तुलना में बहुत अधिक बेहतर मानी जाती हैं।

उच्च जल खपत, उच्च लागत और जोखिम वाली रासायनिक खेती कई किसानों के लिए अव्यावहारिक हो चुकी है। उनकी शुद्ध आय अब ऋणात्मक होने लगी है क्योंकि एक तो प्रतिफल में कमी आ रही है और दूसरा कच्चे माल की लागत बढ़ रही है। खाने और पानी में मिले उर्वरकों और कीटनाशकों की बदौलत शरीर में जो खतरनाक रसायन आते हैं उनका हमारे स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव होता है। कृषि-पारिस्थितिकी आधारित खेती सही गति से रासायनिक कच्चे माल का इस्तेमाल कम करती है। इससे पानी की भारी बचत हो सकती है क्योंकि इसे सिंचाई की कम आवश्यकता होती है और साथ ही बेहतर मृदा ढांचे की बदौलत मिट्टी में नमी अच्छी तरह बरकरार रहती है। ड्रिप और स्प्र्रिंकलर से होने वाली सिंचाई, स्थानीय भौागोलिक स्थिति के अनुसार पानी की बचत करने वाली बीज की किस्मों आदि का प्रयोग करके भी पानी की खपत को कम किया जा सकता है। यदि कुछ जीवन को जैव ईंधन उत्पादन के लिए संरक्षित किया जाए। वहां वृक्ष, झाडिय़ां, रेशेदार पौधे लगाए जाएं तो इससे पानी की खपत घटेगी और मिट्टी में मजबूती आएगी तथा वह वर्षा आदि से कम प्रभावित होगी।

शहरी इलाकों को भी पानी की मांग के प्रबंधन की ओर निर्णायक रूप से बढऩा चाहिए। इस्तेमाल में कमी- पुनर्चक्रण और दोबारा इस्तेमाल को शहरी जलापूर्ति और गंदे पानी के प्रबंधन का मूल मंत्र बनाना चाहिए। नालियों और शहरी नदियों को यथासंभव गंदे पानी के प्रबंधन की विकेंद्रीकृत प्रणाली अपनाकर साफ करना चाहिए। शौचालय में इस्तेमाल, आग से बचाव, वाहन धोने में लगने वाले पानी, बागवानी आदि के लिए अनिवार्य रूप से उपचारित गंदे पानी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। पानी के किफायती इस्तेमाल वाले उपकरण और स्थान विशेष को ध्यान में रखते पानी के किफायत वाले विकल्प अपनाने होंगे।

देश का औद्योगिक क्षेत्र अगर मांग क्षेत्र की समस्याओं का समाधान नहीं करता है तो उसे भी मुश्किलों का सामना करना होगा। इसलिए कि वह पानी का अत्यधिक इस्तेमाल करता है। बीते एक दशक के दौरान पानी की कमी के कारण कई उद्योग बंद हुए हैं। भारतीय उद्योग जगत ताजे पानी पर बहुत अधिक निर्भर है और वह अपना अनुपचारित कचरा नदियों और भूजल में मिलने देता है। ताप बिजली संयंत्रों में पानी की सर्वाधिक खपत होती है। अगर वहां पुनर्चक्रित पानी इस्तेमाल किया जाए तो रोज लाखों करोड़ लीटर ताजा पानी बच सकता है। एनडब्ल्यूपी का सुझाव है कि पानी का व्यापक अंकेक्षण हो और कंपनियां अपनी सालाना रिपोर्ट में पानी खपत की जानकारी दें। वे यह भी बताएं कि उत्पादन प्रक्रिया में पानी का इस्तेमाल कम करने के लिए क्या कर रही हैं। उपचारित गंदे पानी का बढ़ता बाजार इसका एक परोक्ष लाभ साबित होगा।

एनडब्ल्यूपी जल की गुणवत्ता की समस्या को अत्यंत गंभीर मानती है। उसका प्रस्ताव है कि केंद्र और राज्यों के हर जल मंत्रालय को जल गुणवत्ता विभाग बनाना चाहिए जिसे विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवर संचालित करें। नीति में अत्यंत उत्कृष्ट कम लागत, कम ऊर्जा वाली तकनीकों की मदद से सीवेज का उपचार किया जाए। देश में प्रतिदिन 26,000 टन प्लास्टिक कचरा उत्पादित होता है।  इसमें से 10,000 टन पानी में जाता है। ऐसे में नीति प्लास्टिक की जगह हरित विकल्प अपनाने की राष्ट्रीय कार्य योजना की बात करती है। रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) के व्यापक इस्तेमाल ने जल गुणवत्ता और सेहत पर बुरा असर डाला है। आरओ बहुत बड़े पैमाने पर पानी की बरबादी भी करता है। ऐसे में नीति में कहा गया है कि यदि पानी में टीडीएस स्तर 500 मिग्रा प्रति लीटर से कम हो तो आरओ का इस्तेमाल न किया जाए।

एनडब्ल्यूपी ने का सुझाव है कि प्रदूषण के मामलों में जुर्माना बहुत बढ़ा दिया जाना चाहिए ताकि प्रदूषकों को रोका जा सके। प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाइयों का लाइसेंस अस्थायी रूप से निरस्त किया जाना चाहिए। नीति यह भी सुझाती है कि भारत सरकार उभरते जल प्रदूषकों को लेकर एक कार्य बल तैयार करे। हालिया अध्ययन से पता चलता है कि कुछ इलाकों के भूजल में यूरेनियम और मैगनीज असुरक्षित स्तर तक मौजूद हैं। जलवायु परिवर्तन से भी अनचाहे अप्रत्याशित घटनाक्रम हो सकते हैं। कार्यबल को ऐसे खतरों का अनुमान लगाते हुए देश को यथासंभव सुरक्षित रखने का प्रयास करना होगा।

(लेखक शिव नाडर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। वह नई राष्ट्रीय जल नीति का खाका तैयार करने वाली समिति के प्रमुख हैं)

Keyword: जल गुणवत्ता, मांग प्रबंधन, नई राष्ट्रीय जल नीति, एनडब्ल्यूपी, जल संकट, सिंचाई,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या आने वाले समय में भारत-रूस के सामरिक संबंध होंगे मजबूत?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.