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फेसबुक ठप होने से सामने आई कड़वी हकीकत

तकनीकी तंत्र
देवांशु दत्ता /  10 17, 2021

पिछला पखवाड़ा सोशल नेटवर्क के लिए खराब रहा। बॉर्डर गेटवे प्रोटोकॉल (बीजीपी) से संबंधित एक चूक ने फेसबुक, व्हाट्सऐप और इंस्टाग्राम को कई घंटों के लिए ठप कर दिया था। इसके अलावा फेसबुक पर एक व्हिसलब्लोअर ने कुछ गंभीर आरोप भी लगाए हैं। गत अप्रैल में फेसबुक से इस्तीफा दे चुकीं डेटा साइंटिस्ट फ्रांसिस हाजेन ने अपने उन दावों के समर्थन में लीक हुए दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा है कि फेसबुक मुनाफे की चाहत में अपने नेटवर्कों पर विषाक्त सामग्री को प्रोत्साहन देता है।

बीजीपी के गड़बड़झाले से लाखों लोगों को सीधे तौर पर नुकसान हुआ और खुद ने फेसबुक नेटवर्क पर भी इसकी मार पड़ी। हाजेन के खुलासों ने फेसबुक पर पहले से लगते रहे आरोपों को नई धार दी है और आने वाले समय में कानून-निर्माता एवं नियामक उस पर सख्ती बरत सकते हैं।

हालांकि यह मसला पहले से ज्ञात उसी पहलू पर जोर देता है कि एकाधिकार होना बुरी बात है। चाहे वे नए उभरे क्षेत्र हों या पुरानी अर्थव्यवस्था हो, एकाधिकार होना हमेशा बुरा होता है।

बीजीपी व्यवधान का आकलन एवं उसे समझ पाना कहीं आसान है। फेसबुक ने ठप होने के दौरान हर घंटे करीब 5 लाख डॉलर का राजस्व गंवाया जो उसे विज्ञापनों से मिलता। इसके साथ ही उसे आपदा से निपटने की प्रणाली पर भी भारी खर्च करना होगा ताकि इस तरह का व्यवधान फिर न आए।

उपभोक्ताओं एवं संभावित उपभोक्ताओं से संपर्क, सौदा संपन्न कराने एवं कारोबारी रिश्ते बनाए रखने के लिए फेसबुक, व्हाट्सऐप एवं इंस्टाग्राम पर निर्भर रहने वाले कारोबारों को भी इससे भारी नुकसान उठाना पड़ा। उस नुकसान का सही से अंदाजा लगा पाना भी मुश्किल है।

इस नेटवर्क पर निर्भर कुछ कारोबार तो काफी बड़े आकार के हैं। बैंक एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी इन नेटवर्क का इस्तेमाल करती हैं। वहीं छोटी दुकानें चलाने वाले छोटे कारोबारी भी इस पर आश्रित रहते हैं। बहरहाल फेसबुक को विज्ञापन से कम कमाई के चलते हुए सीधे नुकसान से कहीं ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा क्योंकि ये कारोबार अपने राजस्व का एक हिस्सा विज्ञापनों एवं मार्केटिंग के लिए रखते हैं।

फेसबुक एवं उसकी अनुषंगी कंपनियों का दबदबा होने से उपभोक्ताओं के समक्ष कोई मजबूत विकल्प भी नहीं बचा है। फेसबुक आपदा से निपटने की एक असरदार योजना बनाने में सक्षम हो सकता है। चाहे जो हो, प्रतिस्पद्र्धा जरूरी है। दुनिया में वैकल्पिक इंस्टैंट मेसेंजर प्लेटफॉर्म और डिजिटल इमेजिंग प्लेटफॉर्मों की जरूरत है जिनमें फेसबुक नेटवर्क की ही तरह सशक्त नेटवर्क प्रभाव के गुण, एंड-टु-एंड इनक्रिप्शन की निजता और वे इस्तेमाल में भी आसान हों।

हाजेन ने फेसबुक नेटवर्क के बारे में अमेरिकी बाजार नियामक प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (एसईसी) और गैर-लाभकारी विधिक संगठन व्हिसलब्लोअर एड के समक्ष कई शिकायतें दर्ज कराई हैं। उन्होंने अमेरिकी संसद के समक्ष भी अपना बयान दर्ज कराने के साथ कई मीडिया संस्थानों को साक्षात्कार भी दिए हैं। उनका कहना है कि खुद फेसबुक के अपने अध्ययन के मुताबिक इंस्टाग्राम पर पोस्ट होने वाली सामग्री युवाओं की मानसिक सेहत को नुकसान पहुंचा सकती है। हाजेन ने फेसबुक पर मौजूद कंटेंट को भी विषाक्त बताते हुए कहा है कि यह लोकतंत्र को कमजोर करता है। उन्होंने लीक हुए कई अंदरूनी अध्ययनों के आधार पर कहा है कि प्रबंधन ने इनके नतीजों को मुनाफे के लिए नजरअंदाज कर दिया।

वर्ष 2016 के कैम्ब्रिज एनालिटिका घोटाले ने दिखाया था कि ब्रेक्सिट जनमत संग्रह के नतीजे पर असर डालने के लिए फेसबुक प्लेटफॉर्म का बखूबी इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा फेसबुक पर पूर्वी यूरोपीय देशों से पोस्ट की गई फर्जी खबरों ने डॉनल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति चुनाव जिताने में बड़ी भूमिका निभाई थी।  

हाजेन ने हाल की कुछ अध्ययन रिपोर्टों का भी जिक्र किया है। इनमें फेसबुक का लीक हुआ आंतरिक दस्तावेज 'विरोधात्मक नुकसानदायक नेटवर्क-भारत का अध्ययन' भी शामिल है। अमेरिकी बाजार नियामक के समक्ष दर्ज शिकायत में इस आंतरिक दस्तावेज का जिक्र भी है। इसके मुताबिक 'डराने-धमकाने वाले मुस्लिम-विरोधी आख्यान' के लिए फेसबुक भारत में एक पसंदीदा प्लेटफॉर्म है। भारत में आरएसएस से जुड़े लोग फर्जी कंटेंट बनाकर प्लेटफॉर्म पर वितरित एवं प्रोत्साहित करते हैं और इस काम में अक्सर एक ही उपयोगकर्ता द्वारा नियंत्रित कई अकाउंट का इस्तेमाल किया जाता है।

हाजेन ने फेसबुक के अंदरूनी दस्तावेजों में यह जिक्र होने का भी दावा किया है कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों के पहले नजर आए 40 फीसदी वीपीवी पोस्टर फर्जी या जाली थे। जाली पाए गए एक पोस्टर को तो 28 दिनों के भीतर 3 करोड़ से अधिक लोगों ने देखा था। भारत में व्हाट्सऐप का इस्तेमाल करने वाले किसी भी शख्स को यह बखूबी पता होगा कि व्हाट्सऐप पर भी इस तरह के कंटेंट को ग्रुप में खूब भेजा जाता है। ऐसा लगता है कि फेसबुक की सफाई के बावजूद हाजेन के आरोपों में दम है। यह मसला हमें फिर से एकाधिकार वाले पहलू पर ले आता है। लोग फेसबुक और उसकी अनुषंगी इकाइयों का इस्तेमाल कई कारणों से करते हैं। दोस्तों से होने वाली अनौपचारिक बातचीत से लेकर कमाई के एक जरिये के तौर पर भी इनका इस्तेमाल होता है। ऐसे में कोई व्यावहारिक विकल्प न होने से उपयोगकर्ता इनसे आसानी से अलग नहीं हो सकते हैं। हालांकि इसका मतलब लगातार जहरीले कंटेंट की जद में रहना भी है।

नियामकों एवं कानून-निर्माताओं को प्रतिस्पद्र्धा के हालात बनाने एवं बेहतर कंटेंट की व्यवस्था करने की जरूरत है। वैसे इनमें से कोई भी काम आसान नहीं होगा। यह इसलिए भी सच है कि जहर उगलने के लिए इन प्लेटफॉर्म का सफलतापूर्वक इस्तेमाल करने वाले सियासी दलों को लोगों तक पहुंचने के अपने ही मॉडल को बेअसर करना होगा।

Keyword: फेसबुक, सोशल नेटवर्क, बीजीपी, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, डेटा साइंटिस्ट, लीक दस्तावेज,
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