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निजीकरण के पहले हवाईअड्डों पर होगा ज्यादा खर्च

साई मनीष /  October 17, 2021

देश के छह हवाईअड्डों को 50 वर्षों के लिए अदाणी समूह को सौंपने के साथ ही सरकार अन्य 25 हवाईअड्डों को भी निजी कंपनियों के सुपुर्द करने की तैयारी में है। हालांकि सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हवाईअड्डों को निजी क्षेत्र के हवाले करने की योजना के बावजूद सरकार इनका ढांचा दुरुस्त करने के नाम पर 14,500 करोड़ रुपये की बड़ी रकम खर्च कर रही है।

सरकार की तरफ से इन हवाईअड्डों का संचालन करने वाला निकाय भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) नई टर्मिनल इमारत एवं हवाईपट्टी के निर्माण, लैंडिंग प्रणालियों एवं रडार को उन्नत करने और अन्य ढांचागत सुधारों पर अरबों रुपये खर्च कर चुका है। सरकार ने पहले कहा था कि वह सभी हवाईअड्डों पर कुल 25,000 करोड़ रुपये खर्च करेगी। लेकिन अब यही लगता है कि सरकार इसमें से आधी से ज्यादा रकम उन्हीं हवाईअड्डों पर खर्च करती रही है जो या तो निजी कंपनियों को सौंपे जा चुके हैं या भविष्य में उन्हें निजी क्षेत्र को देने की तैयारी है। जिन छह हवाईअड्डों का परिचालन अदाणी समूह के हाथ में आया है, उनके उन्नयन एवं विस्तार पर वर्ष 2017 से 2020 के दौरान 2,500 करोड़ रुपये से अधिक राशि खर्च की। नागरिक विमानन मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक उसने इन छह हवाईअड्डों पर विभिन्न ढांचागत कार्यों पर 300 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जिसमें तिरुवनंतपुरम एवं गुवाहाटी की हवाईपट्टियों के विस्तार में लगे 100 करोड़ रुपये भी शामिल हैं। इसके अलावा अदाणी समूह को इन हवाईअड्डों के परिचालन का अधिकार मिलते समय एएआई की तरफ से वहां पर 2,200 करोड़ रुपये से भी अधिक राशि के निर्माण कार्य जारी थे। इनमें गुवाहाटी हवाईअड्डे पर 1,000 करोड़ रुपये की लागत से एयरपोर्ट टर्मिनल की नई इमारत का निर्माण भी शामिल था।

प्राधिकरण के कर्मचारी संगठन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में कहा है कि इन हवाईअड्डों के रखरखाव का जिम्मा अदाणी समूह को सौंपे जाते समय जारी निर्माण कार्यों का भुगतान निजी कंपनी को करना चाहिए था। जून 2021 में लिखे गए पत्र के मुताबिक अदाणी एंटरप्राइजेज को निर्माणाधीन कार्यों पर आए खर्च की भरपाई करनी चाहिए। पता चला है कि अदाणी ने तीन हवाईअड्डों को सौंपे जाने के बाद 2,000 करोड़ रुपये भी जमा नहीं किए हैं। निजी ऑपरेटर ने भुगतान नहीं किए हैं और शुल्क कई गुना बढ़ गए हैं। अगर फौरन इस राशि का भुगतान नहीं किया जाता है तो फिर जमानत जब्त करने के साथ करार भी रद्द करने के सख्त कदम उठाने चाहिए।

तीन हवाईअड्डों के लिए हुए समझौते पर नजर डालने से पता चलता है कि समूह ने अहमदाबाद, लखनऊ एवं मंगलूरु हवाईअड्डों के लिए क्रमश: 130 करोड़, 125 करोड़ और 120 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी दी हुई है। अगर अदाणी समूह करार की शर्तों का पालन नहीं करता है तो एएआई इस गारंटी को भुना सकता है। अनुबंध में इसका उल्लेख है कि निर्माणाधीन कार्यों पर आए खर्च को वहन करने के लिए अदाणी उत्तरदायी है। अदाणी समूह को यह रकम 120 दिनों के भीतर ही लौटानी थी।

हालांकि अदाणी समूह के प्रवक्ता ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि इन छह हवाईअड्डों में से समूह के पास सिर्फ अहमदाबाद, लखनऊ एवं मंगलूरु हवाईअड्डों के ही प्रबंधकीय नियंत्रण हैं। इन तीनों हवाईअड्डों के निजीकरण से उपजी जवाबदेही के तौर पर हमने एएआई को सारी बकाया रकम चुका दी हैं। वहीं तिरुवनंतपुरम, गुवाहाटी एवं जयपुर हवाईअड्डों की कमान अभी हमारे हाथ में नहीं आई है लेकिन हम वहां पर भी निविदा की सारी शर्तों का पालन करेंगे।

वर्ष 2022 से 2025 के बीच 25 अन्य हवाईअड्डों को निजी कंपनियों के हाथों में सौंपने की तैयारी है जिससे सरकार को 20,872 करोड़ रुपये की आय होने का अनुमान है। इनमें चेन्नई, अमृतसर, रांची और देहरादून के भी हवाईअड्डों के शामिल होने की संभावना है। इन हवाईअड्डों के निजीकरण के समय भी पुरानी कहानी दोहराए जाने की आशंका है।

जहां वर्ष 2025 तक 20,872 करोड़ रुपये की आमदनी इन हवाईअड्डों के विकास पर खर्च रकम पर हासिल होने वाले बढिय़ा रिटर्न को दर्शाती है लेकिन यह देखना बाकी है कि सरकार की यह कोशिश कितनी कामयाब होती है। मोदी सरकार एयर इंडिया का निजीकरण नहीं कर पा रही है। इसके अलावा मुंबई एवं दिल्ली हवाईअड्डों पर सार्वजनिक-निजी भागीदारी से उसे मिलने वाला राजस्व भी पिछले कुछ वर्षों से स्थिर हो चुका है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इन हवाईअड्डों के ढांचागत उन्नयन पर एएआई ने 2017-20 के दौरान करीब 1,300 करोड़ रुपये लगाए। सारे हवाईअड्डों पर खर्च रकम का करीब 40 फीसदी दिल्ली एवं मुंबई हवाईअड्डों पर ही लगा था। सच तो यह है कि वर्ष 2025 तक कई दूसरे हवाईअड्डों का जिम्मा निजी हाथों में सौंपे जाने तक एएआई उनके उन्नयन पर 8,500 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि खर्च कर चुका होगा।

 मार्च 2022 तक अमृतसर, तिरुचिरापल्ली, वाराणसी, भुवनेश्वर, इंदौर एवं रायपुर के हवाईअड्डों को भी निजी ऑपरेटरों के सुपुर्द कर दिया जाएगा। तिरुचिरापल्ली हवाईअड्डे पर 951 करोड़ रुपये की लागत से निर्माणाधीन नई टर्मिनल इमारत मई 2022 में बनकर तैयार होगी।

दूसरे चरण में 2022-23 के दौरान 8 हवाईअड्डों का निजीकरण होगा। इनमें कोझिकोड, कोयंबत्तूूर, जोधपुर, रांची, मदुरै, सूरत, पटना एवं नागपुर शामिल हैं। पटना हवाईअड्डे पर 1,225 करोड़ रुपये की लागत से निर्माणाधीन टर्मिनल अक्टूबर 2022 तक पूरा होने की उम्मीद है। तीसरे चरण में 2023-24 के दौरान छह अन्य हवाईअड्डों- चेन्नई, तिरुपति, विजयवाड़ा, भोपाल, हुबली एवं वडोदरा को निजी क्षेत्र को सौंपा जाना है। इनकी मरम्मत एवं उन्नयन पर एएआई करीब 5,500 करोड़ रुपये खर्च कर रही है जिसमें से आधी रकम सिर्फ चेन्नई हवाईअड्डे के विस्तार पर ही लग रही है।  चौथे एवं पांचवें चरण में 2024-25 के दौरान इम्फाल एवं अगरतला समेत पांच हवाईअड्डों का निजीकरण होगा। पूर्वोत्तर भारत में विमानन सुविधाओं के विकास पर बड़ी रकम खर्च करने के बाद इन्हें निजी कंपनियों के सुपुर्द कर दिया जाएगा। देहरादून एवं अगरतला हवाईअड्डों पर ही सिर्फ 1,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि निजी कंपनियां हवाईअड्डों की कमान संभालने के बाद हवाईअड्डा उपयोग शुल्क बढ़ाकर अपना मुनाफा कमाने लगेंगी। दूसरी तरफ इन हवाईअड्डों के निर्माण में आम जनता का पैसा लगने के बाद उनके इस्तेमाल के लिए भी करदाता को ही जेब ढीली करनी होगी।

Keyword: निजीकरण, हवाईअड्डों पर खर्च, अदाणी समूह, एएआई, टर्मिनल, ढांचागत सुधार,
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