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विश्वसनीय राजकोषीय नीति से मजबूत होगी भारत की साख: गीता

इंदिवजल धस्माना /  October 14, 2021

बीएस बातचीत

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ का कहना है कि कैलेंडर वर्ष 2021 की तीसरी तिमाही के आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत दे रहे हैं। हालांकि आईएमएफ ने हाल में जारी अपनी वल्र्ड इकनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट में भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान 9.5 प्रतिशत पर स्थिर रखा है। इंदिवजल धस्माना ने उनसे अर्थव्यवस्था से जुड़े विभिन्न विषयों पर बात की। पेश हैं बातचीत के संपादित अंश:

आईएमएफ ने भारत के आर्थिक वृद्धि के संदर्भ में जुलाई के अपने अनुमान में कोई बदलाव नहीं किया है। हालांकि जुलाई के बाद औद्योगिक उत्पादन सूचकांक, प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में उत्पादन, कर संग्रह, विनिर्माण आदि अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत दे रहे हैं। आप इसे कैसे देखती हैं?

जुलाई में हमने वित्त वर्ष 2021-22 के लिए आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान 12.5 प्रतिशत से घटाकर 9.5 प्रतिशत कर दिया था। उस समय कोविड-19 की वजह से जोखिम बढ़ गया था और देश के विभिन्न राज्यों में लॉकडाउन लगा दिया गया था। अगस्त अंत में चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के जीडीपी के आंकड़ों पर भी असर दिखा और यह अनुमान से कम रहा। ठीक उसी समय तीसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था का हाल बताने वाले आंकड़े मजबूत होते गए। हमने अपने सालाना अनुमान में तिमाही आधार पर बदलने वाले हालात पर पूरी तरह विचार किया इसलिए अनुमान में कोई बदलाव नहीं किया है।


सरकार कहती है कि चालू कैलेंडर वर्ष में सभी वयस्कों का टीकाकरण हो जाएगा। क्या इससे यह गुंजाइश बनती है कि अर्थव्यवस्था आईएमएफ के अनुमान की तुलना में अधिक तेजी से आगे बढ़ेगी?

टीकाकरण के मोर्चे पर भारत ने सराहनीय प्रगति की है। इस समय देश की करीब 20 प्रतिशत आबादी को टीके की दोनों खुराक लगाई जा चुकी हैं। करीब 51.2 प्रतिशत लोगों को कम से कम एक खुराक अवश्य लग चुकी है। टीकाकरण की रफ्तार बढऩे से कोविड महामारी पर अधिक कारगर ढंग से नियंत्रण पाया जा सकता है। आने वाले समय में मांग में सुधार के संकेत मिल सकते हैं।


हाल में भारत अपनी रेटिंग में सुधार के लिए प्रयास करता रहा है। मगर मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने केवल संप्रभु रेटिंग (सॉवरिन रेटिंग्स) पर अपने अनुमान में सुधार किया है। आपको लगता है कि आने वाले कुछ महीनों में भारत की रेटिंग सुधर सकती है?

हम किसी एक रेटिंग एजेंसी के कदम पर टिप्पणी नहीं करते हैं। आने वाले समय में निजीकरण के प्रयास में तेजी, बुनियादी ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों पर सरकार के निवेश के साथ संरचनात्मक सुधार से आर्थिक तरक्की की गुंजाइश बढ़ सकती है। इनके अलावा राजकोषीय स्थिति मजबूत करने की रणनीति और आर्थिक प्रोत्साहन धीरे-धीरे समाप्त करने सहित राजस्व बढ़ाने के उपायों से सरकार की व्यय करने की क्षमता बढ़ेगी। इससे राजकोषीय स्थिति मजबूत होगी तो रेटिंग में सुधार की गुंजाइश भी बढ़ जाएगी।


आईएमएफ ने कहा है कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक संपन्नता की राह में जोखिम बढ़ गए हैं और नीतिगत उपाय अधिक पेचीदा हो गए हैं। ऐसे में चालू कैलेंडर वर्ष के लिए वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर में महज 0.1 प्रतिशत अंक की कटौती करना आशावाद का परिचायक नहीं है?

कुल मिलाकर 2021 की पहली छमाही में जीडीपी वृद्धि दर अपेक्षाओं के अनुरूप ही था। यह अलग बात थी कि संक्रमण बढऩे और आपूर्ति मोर्चे पर बाधा से आर्थिक गतिविधियां सुस्त हो गई थीं। यह सही है कि वृद्धि दर अनुमान में 0.1 प्रतिशत की कमी कुछ देशों की आर्थिक गतिविधियों में भारी कमी को नहीं दर्शाता है। अनुमान में यह संशोधन विकसित देशों के समूह के लिए निकट अवधि में और कठिन चुनौती का संकेत दे रहा है। आपूर्ति मोर्चे पर आ रही बाधा इसकी प्रमुख वजह होगी।


आईएमएफ ने क्यों कहा कि महंगाई का जोखिम अधिक बढ़ गया है?

दुनिया के कई देशों में महंगाई बढ़ गई है मगर इसका स्तर-स्तर अलग-अलग है। ज्यादातर देशों में महंगाई में वृद्धि की मुख्य वजह पिछले वर्ष का न्यून आधार प्रभाव, महामारी की वजह से वस्तुओं की कमी और जिंसों की ऊंची कीमतें हैं। हालांकि 2022 में महंगाई कम होने की उम्मीद जरूर है मगर महंगाई को बढ़ाने वाले जोखिम बरकरार हैं। अगर महामारी की वजह से पैदा हुई वस्तुओं एवं जिंसों की कमी जारी रही तो कीमतें ऊपर भागेंगी और आगे भी महंगाई का खतरा बरकरार रहेगा।  


आईएमएफ का कहना है कि दुनिया में रोजगार उत्पादन में सुधार की तुलना में कमजोर रहेगा। रोजगार सृजन महामारी के पूर्व के स्तर तक कब तक पहुंच जाएगा?

श्रम बाजार में सुधार जारी है मगर विभिन्न देशों में इसकी चाल एकसमान नहीं है। दुनिया के ज्यादातर देशों में रोजगार सृजन की दर महामारी के पूर्व के स्तर की तुलना में कम है। यह इस बात का संकेत दे रहा है कि आर्थिक गतिविधियां तेज नहीं हुई हैं और कर्मचारियों के मन में कोविड-19 महामारी का खौफ बना हुआ है। इन बातों को देखते हुए यही लग रहा है कि रोजगार सृजन और कर्मचारियों की भर्ती की प्रक्रिया सुस्त रह सकती है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं के रोजगार पर महामारी का अधिक असर हुआ है।  


रोजगार सृजन और महंगाई दर पर अंकुश लगाने की बात आने पर आईएमएफ ने महंगाई दर नियंत्रित करने की बात क्यों कही है। ऐसा क्यों?

हम ऐसा नहीं कह रहे हैं। वास्तविकता यह है कि नीतिगत उपाय पहले से अधिक पेचीदा हो गए हैं। रोजगार की दर अब भी कम है और दुनिया के कई देशों में खुदरा महंगाई में खासा इजाफा हो गया है। आने वाले समय में महंगाई को लेकर अनिश्चितता बरकरार है। इसकी एक वजह यह है कि आपूर्ति एवं मांग में मौजूदा असंतुलन कब तक रहेगा यह कोई नहीं जानता है। महंगाई दर जब तक स्थिर है तब तक मौद्रिक नीति का मुख्य ध्यान रोजगार सृजन को बढ़ावा देने पर होना चाहिए। अगर महंगाई बढ़ती है तो नीति निर्धारकों को इससे निपटने के लिए ब्याज दरें बढ़ानी होंगी। इसके साथ ही लोगों के साथ पारदर्शी तरीके से संवाद भी जारी रहना चाहिए।


आपने चीन में जायदाद क्षेत्र में ऋण पुनगर्ठन को अव्यवस्थित करार दिया है। आपकी नजर में दुनिया पर इसका क्या असर होगा, खासकर तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था किस तरह प्रभावित होंगी?

हमने ऐसा नहीं कहा है। चीन में जायदाद क्षेत्र पर हो रही प्रगति पर हमारी पैनी नजर है क्योंकि इसका आर्थिक गतिविधि और वित्तीय स्थायित्व दोनों पर असर हो सकता है। अगर पूरे वित्तीय तंत्र के लिए कोई खतरा पैदा होता है तो मेरा मानना है कि वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के उपाय भी किए जाएंगे। हमने अपने वृद्धि अनुमान में रियल एस्टेट क्षेत्र में निवेश में आई सुस्ती पर विचार किया है। इससे दुनिया के दूसरे देशों पर भी असर हुआ है, खासकर चीन से करीबी कारोबारी संबंध रखने वाले देशों पर भी प्रभाव हुआ है। अगर चीन में जायदाद क्षेत्र में अस्थिरता अनुमान से भी कहीं अधिक रही तो घरेलू मांग और वृद्धि पर असर हो सकता है और इसका असर पूरी दुनिया पर होगा।

Keyword: राजकोषीय नीति, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, आईएमएफ, गीता गोपीनाथ,
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