बिजनेस स्टैंडर्ड - कंपनियों के स्वामित्व का जटिल है मामला
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कंपनियों के स्वामित्व का जटिल है मामला

प्रसेनजित दत्ता /  October 13, 2021

यह बात स्पष्ट है कि 18 फीसदी शेयरों के साथ ज़ी एंटरटेनमेंट की सबसे बड़ी अंशधारक इन्वेस्को और प्रवर्तक गोयनका परिवार (जिसके पास 5 फीसदी से भी कम शेयर बचे हैं) के बीच संघर्ष होगा और वह कड़वाहट की ओर जाएगा। इन्वेस्को चाहती है कि असाधारण आम बैठक (ईजीएम) आयोजित की जाए ताकि वह बोर्ड में अपने निदेशक ला सके और प्रबंध निदेशक तथा मुख्य कार्याधिकारी पुनीत गोयनका को हटा सके। मौजूदा बोर्ड गोयनका के साथ मजबूती से खड़ा नजर आता है और उसने ईजीएम बुलाने से मना कर दिया है। ऐसे में लंबी कानूनी लड़ाई नजर आ रही है।

ऐसा बहुत कम ही होता है कि संस्थापक और प्रवर्तक उस कंपनी पर से अपना नियंत्रण जाने दें जिसे वे 'अपनी' कंपनी समझते हैं। खासतौर पर तब जबकि प्रबंधन भी उनके पास हो। कई देशों में संस्थापकों ने दोहरी श्रेणी के शेयरों का इस्तेमाल करके अपने लिए उच्च मताधिकार रखे और इस तरह नियंत्रण भी अपने पास रखा। सन 2000 तक भारत में ऐसा करना संभव नहीं था। उसी वर्ष बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कंपनियों को अलग-अलग मताधिकार वाले शेयर जारी करने की इजाजत दी। ज़ी एंटरटेनमेंट के मामले में ऐसा नहीं है इसलिए यहां सीधी लड़ाई होनी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं है।

ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो भारत में कम अंशधारिता वाले प्रवर्तक भी अक्सर अपने प्रति संवेदना रखने वाले बोर्ड की मदद से या राजनेताओं की सहायता लेकर कंपनी पर अपना नियंत्रण बरकरार रखने में कामयाब रहते हैं। सन 1982 में स्वराज पाल ने एस्कॉर्ट और डीसीएम के अधिग्रहण की कोशिश की थी लेकिन अंतत: उन्हें पीछे हटना पड़ा था जबकि दोनों कंपनियों के प्रवर्तकों के पास हिस्सेदारी कम थी।

भारत में लंबे समय तक प्रवर्तक या संस्थापक केवल पारिवारिक लड़ाई के बाद ही हटते। रैनबैक्सी और अपोलो टायर्स दोनों मामलों में यही हुआ। रैनबैक्सी मामले में परविंदर सिंह ने अपने पिता भाई मोहन सिंह को हटाया और अपोलो टायर्स में नीरज कंवर रौनक सिंह के खिलाफ कामयाब रहे। इससे पहले भी नुस्ली वाडिया उस समय समूह की कंपनियों का नियंत्रण हासिल करने में कामयाब रहे थे जब उनके पिता नेविले वाडिया उन्हें बेचना चाहते थे।

भारत में पहले प्रवर्तकों को हटाना इसलिए मुश्किल होता था क्योंकि उन्हें अक्सर संस्थागत निवेशकों का समर्थन मिलता था जो आमतौर पर सरकारी उपक्रम और सरकारी बैंक होते थे। निजी संस्थागत निवेशकों और फंड प्रबंधकों के कारण हालात में बदलाव आ रहा है। वैश्विक और भारतीय दोनों निवेशक और फंड प्रबंधक पहले से अधिक आक्रामक हैं। परंतु अभी भी किसी प्रवर्तक को प्रबंधन से हटाना आसान नहीं है। यकीनन कई प्रवर्तकों ने अपनी अंशधारिता बढ़ाकर स्थिति मजबूत कर ली है ताकि वे अधिग्रहण के खतरों से बच सकें। ऐसा करने वालों में टाटा समूह भी शामिल है जिसकी होल्डिंग कंपनी टाटा संस ने समूह की कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा ली है।

बड़े पेशेवर निवेशक भी उन कंपनियों में अपनी हैसियत मजबूत करना चाहते हैं जहां उन्होंने ज्यादा निवेश किया है। नए दौर की गैर सूचीबद्ध स्टार्टअप में भी ऐसा ही देखने को मिला है जहां ज्यादातर फंडिंग वेंचर कैपिटलिस्टों ने की है। साथ ही सूचीबद्ध कंपनियों में भी यह नजर आ रहा है जहां निजी इक्विटी कारोबारियों ने रणनीतिक साझेदारी वाली कंपनियों में भी अहम हिस्सेदारी हासिल कर ली है। फ्लिपकार्ट के बंसल जैसे जानेमाने संस्थापकों को भी नियंत्रण निवेशकों को सौंपना पड़ा।

सूचीबद्ध कंपनियों में विजय माल्या को अपनी हिस्सेदारी कम होने और किंगफिशर एयरलाइंस की खातिर लिया गया कर्ज नहीं चुका पाने के कारण अपनी सभी कंपनियों का नियंत्रण गंवाना पड़ा। माइंडट्री में संस्थापक ने अपने सबसे बड़े अंशधारक स्वर्गीय वीजी सिद्धार्थ को अपनी हिस्सेदारी एलऐंडटी को बेचने से रोकने की भरपूर कोशिश की लेकिन वह नाकाम रहे। इनमें से कोई मौजूदा मामले के हिसाब से सटीक नहीं है। इन्वेस्को एक पेशेवर निवेशक है और आमतौर पर वह प्रबंधन नहीं संभालती। गोयनका ने ज़ी एंटरटेनमेंट को एकदम शुरुआत से खड़ा किया है। उद्योगपति हर्ष गोयनका समेत तमाम लोग हैं जो मानते हैं कि पुनीत गोयनका अच्छा काम कर रहे हैं।

परंतु मुद्दा यह है कि इन्वेस्को को अपने निवेश के बाद शायद ही कोई प्रतिफल मिला हो। मार्च 2019 से ज़ी के शेयर लगातार गिर रहे हैं और 2020 के मध्य में आई तेजी में भी इन्होंने गति नहीं पकड़ी। पुनीत गोयनका ने भले ही ज़ी एंटरटेनमेंट को पूरी तरह चलाया हो लेकिन शेयर कीमतों में तेजी तभी आई जब इन्वेस्को ने प्रबंधन को हटाने के लिए असाधारण आम बैठक बुलाने पर जोर दिया। जब सोनी के साथ प्रस्तावित विलय की घोषणा हुई तब वह आगे बढ़ी।

सोनी पिक्चर्स के साथ प्रस्तावित विलय में गोयनका परिवार को अन्य अंशधारकों की तुलना में बेहतर सौदा मिलता नजर आ रहा है। ज़ी बड़ी कंपनी है लेकिन प्रस्ताव के अनुसार विलय के बाद उसकी अंशधरिता कम रह जाएगी। विलय के बाद बनी कंपनी में इन्वेस्को की हिस्सेदारी आधी या उससे कम हो जाएगी। दूसरी ओर गोयनका परिवार न केवल ज़ी एंटरटेनमेंट की तरह विलय के बाद बनी कंपनी में भी चार फीसदी हिस्सेदारी बरकरार रखेगा बल्कि पुनीत गोयनका प्रबंध निदेशक भी बने रहेंगे। गोयनका परिवार को तय अवधि में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 20 फभ्सदी करने का अधिकार भी मिलेगा।

इन्वेस्को बनाम गोयनका की यह दास्तान एक लंबी लड़ाई के रूप में आगे बढ़ेगी उसके बाद ही अंशधारकों को प्रबंधन या इन्वेस्को के किसी प्रस्ताव पर मतदान करने का कोई मौका मिलेगा। अंत में चाहे जो भी हो, इससे ऐसे बड़े अंशधारकों को स्पष्ट संकेत मिलेगा जो उन प्रवर्तकों को हटाना चाहते हैं जो उनका भरोसा गंवा चुके हैं। इससे यह संकेत भी मिलेगा कि सेबी को कंपनी में अहम हिस्सेदारी रखने वाले गैर प्रवर्तक अंशधारकों के अधिकारों की बेहतर रक्षा के लिए सेबी को नियमन बदलने की जरूरत है या नहीं।

(लेखक बिज़नेस टुडे और बिज़नेसवल्र्ड के पूर्व संपादक एवं संपादकीय सलाहकार फर्म प्रोसैकव्यू के संस्थापक-संपादक हैं)

Keyword: कंपनियों का स्वामित्व, इन्वेस्को, गोयनका, विवाद, मतदान, ईजीएम, संस्थागत निवेशक,
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