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पंजाब में पहचान की राजनीति के अब कई हैं दावेदार

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  October 11, 2021

अगले वर्ष जितने विधानसभा चुनाव होने हैं उनमें सबसे अधिक ध्यान उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों पर है। बहरहाल, पंजाब विधानसभा चुनाव एक ऐसा चुनाव होने जा रहा है जहां राजनीति और चुनाव सर्वेक्षण को लेकर कुछ ऐसी बातें सामने आएंगी जो इससे पहले देश की राजनीति में नहीं देखी गईं।

पंजाब एक ऐसा राज्य है जिसकी सीमा पाकिस्तान से लगती है, वह अलगाववादी आंदोलन का सामना कर चुका है और दलित आबादी के सबसे अधिक घनत्व के बावजूद वहां पहले कभी दलित मुख्यमंत्री नहीं रहा तो ऐसे राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव में क्या नया है? पाकिस्तान की पंजाब से लगने वाली सीमा को सैन्य दृष्टि से बहुत हलचल वाली नहीं माना जाता। खासतौर पर दो दशक पहले यहां बाड़बंदी होने के बाद से। लेकिन भारत-पाकिस्तान के रिश्ते राजनीति में एक जीवंत विषय हैं, खासतौर पर ऑपरेशन ब्लूू स्टार की पीछे छूट गई विरासत को देखते हुए। इन चुनावों में अहम राजनीतिक रुख इस बात पर पर निर्भर करेगा कि भारत पाकिस्तान को किस तरह शामिल करता है और खासतौर पर सिख पहचान और भारतीय राज्य की जटिलताएं भी इसमें अहम होंगी। पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह आरोप लगा चुके हैं कि नवजोत सिंह सिद्धू (उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने में अहम भूमिका निभाने वाले) की वफादारी भारत से अधिक पाकिस्तान के साथ है।

चुनाव विश्लेषक और सी वोटर इंटरनैशनल के संस्थापक निदेशक यशवंत देशमुख कहते हैं, 'पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) इसलिए हार गई थी क्योंकि उसके नेतृत्व ने सिखों के अधिकार के मुद्दे पर कुछ ज्यादा ही जोर दिया। इस बात ने हिंदुओं को दूर कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि आप खालिस्तानियों और पाकिस्तान के साथ है।'

सन 2016 में पंजाबी अनिवासी भारतीयों ने आप के चुनाव अभियान को फंड किया था और कहा जा रहा था कि इनमें से कुछ को यकीन था कि आप अलगाववादियों के उद्देश्य के साथ सहानुभूति रखती थी। हिंदुओं के बीच आप को लेकर बनी इसी धारणा ने पार्टी को पंजाब में सरकार बनाने से रोक दिया लेकिन पार्टी विपक्ष का नेता बनने में कामयाब रही। इस बार आप अनिवासी सिखों से दूरी बरत रही है। परंतु कथित रूप से सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ को दूषित करने और उसके बाद पुलिस की गोलीबारी आगामी विधानसभा चुनावों में अहम मुद्दा बनेगी। कोटकापुरा और बेहबल कलां में गोलीबारी के मामलों की जांच करने वाली विशेष जांच टीम के अध्यक्ष कुंवर विजय प्रताप ने उस समय पुलिस सेवा से इस्तीफा देकर आप की सदस्यता ले ली जब पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालयों ने 9 अप्रैल को उनकी रिपोर्ट को खारिज कर दिया। आप के राष्ट्रीय समन्वयक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी घोषणा की है कि आप की ओर से कोई सिख ही मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी होगा।

इस बार पहचान की राजनीति के कई दावेदार हैं। गत विधानसभा चुनाव शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ मिलकर लड़ा था। अब वह गठबंधन टूट चुका है। भाजपा ने कहा है कि वह 117 सीट पर अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। एसएडी को पहले ही बहुजन समाज पार्टी  (बसपा) के रूप में साझेदार मिल चुका है। कैप्टन अमरिंदर सिंह के बारे में अभी कुछ स्पष्ट नहीं है कि वह नई पार्टी बनाएंगे या नहीं। पारंपरिक रूप से पंजाब के चुनावों में तीन दल प्रमुख रहते हैं। पिछले चुनाव में आप के आगमन के बाद इनकी तादाद चार हो गई। इस बार राजनीतिक हिस्सेदारी की लड़ाई और कठिन हो सकती है।

सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च  के फेलो, अशोक विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के अतिथि सहायक प्राध्यापक और घरेलू राजनीति के जानकार राहुल वर्मा कहते हैं, 'पंजाब के राजनीतिक हालात में बहुत जल्दी-जल्दी बदलाव संभव है। प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि आगामी चुनाव में पंजाब में पंचकोणीय मुकाबला होगा। लेकिन मेरा मानना है कि मोटे तौर पर यह त्रिकोणीय मुकाबला रहेगा।' वह अपनी बात स्पष्ट करते हैं, 'इसकी वजह इस प्रकार है: पहली, यदि कैप्टन एक नई पार्टी बना भी लेते हैं (और भाजपा या एसएडी-बसपा के साथ रणनीतिक तालमेल बना लेते हैं) तो भी उनका प्रभाव पटियाला-संगरूर यानी पूर्वी मालवा के इलाके में सीमित रहेगा। दूसरा, भाजपा राज्य में अभी भी बहुत छोटी पार्टी रहेगी जिसे शहरी इलाकों के कुछ हिंदुओं के वोट मिलेंगे। तीसरा, आप की मौजूदगी पंजाब के मालवा क्षेत्र में सीमित रहेगी जहां 117 में से 69 सीट आती हैं। पार्टी अभी भी संघर्ष कर रही है माझा की 25 और दोआबा की 23 सीट पर पार्टी का प्रभाव है। आखिर में देखें तो पंजाब कांग्रेस के मौजूदा संकट, एसएडी के भ्रष्टाचार मामलों से नहीं उबर पाने और आप की अपना आधार बढ़ाने की कोशिशों ने राज्य की राजनीति में कई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं।' सी वोटर ने देश के मतदाताओं के चुनावी व्यवहार पर शोध किया है। वह इस बात से सहमत हैं कि पंजाब में यह चुनाव पहले के तमाम चुनावों से अलग होगा लेकिन इसके कारण जुदा हैं। एक हालिया सर्वेक्षण के आधार पर देशमुख का विश्लेषण कहता है कि कैप्टन और सिद्धू के झगड़े के कारण कांग्रेस का जनाधार प्रभावित होगा और आप को सबसे अधिक फायदा पहुंचेगा। अक्टूबर के आरंभ में हुए सर्वेक्षण में कहा गया कि 2016 में 38.5 फीसदी मत पाने वाली कांग्रेस अब 31.8 फीसदी मत पा सकती है जबकि आप जिसे 23.7 फीसदी मत मिले थे उसकी मत हिस्सेदारी बढ़कर 35.9 फीसदी हो सकती है। यानी उसका मत प्रतिशत 12 फीसदी बढ़ेगा। यानी 117 सीट वाली पंजाब विधानसभा में आप की सीट 20 से बढ़कर 53 हो सकती हैं और कांग्रेस 77 (बाद में उपचुनाव में उसकी सीट और बढ़ीं) से घटकर 43 पर आ सकती है। अकाली दल और भाजपा के मत प्रतिशत और सीट में बदलाव बहुत कम है। चर्चा है कि पंजाब में त्रिशंकु विधानसभा बन सकती है जबकि देशमुख इसे खारिज करते हुए कहते हैं कि यदि ऐसा हुआ भी तो यह केवल कागज पर होगा। चाहे जो भी हो, पंजाब विधानसभा चुनावों के नतीजे यकीनन चौंकाने वाले होंगे।

Keyword: पंजाब, राजनीति, विधानसभा चुनाव, सर्वेक्षण, अमरिंदर सिंह, नवजोत सिंह सिद्धू,
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