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चीन का रास्ता रोकने से जुड़ी अजीब मुश्किल

तकनीकी तंत्र
देवांशु दत्ता /  October 10, 2021

वर्ष 1945 से लेकर 1991 तक चला शीत युद्ध द्वितीय विश्व युद्ध की तुलना में कहने को ही शीत था। वियतनाम और कोरिया युद्ध जैसी गर्म घटनाओं ने करीब 40 लाख लोगों की जान ले ली थी। सोवियत संघ के विघटन ने एकध्रुवीय अमेरिकी वर्चस्व का एक दौर शुरू किया। अब वह दौर भी खत्म हो चला है और चीन अपनी 'वुल्फ वॉरियर' कूटनीति और 'वन बेल्ट वन रोड' मुहिम एवं 'स्ट्रिंग ऑफ पल्र्स' के जरिये तगड़ी चुनौती पेश कर रहा है।

ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन एवं अमेरिका के बीच बने नए गठजोड़ 'ऑकस' का गठन चीनी जनवादी गणराज्य को नियंत्रित करने के लिए हुआ है। उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) और वारसा समझौते के बीच की तनातनी से समरूपता रखता है। लेकिन विस्तार में देखने पर यह काफी हद तक अलग होगा।

सोवियत संघ ने एक भारी नीतिगत भूल की थी जो उसके लिए पराभव का कारण बनी। उसके पास तकनीकी शिक्षा की एक बेहतरीन व्यवस्था थी और समर्थ वैज्ञानिक एवं तकनीकी कार्यबल भी बड़े पैमाने पर मौजूद था। इसकी वजह से वह अंतरिक्ष अभियानों एवं सैन्य साजोसामान के विकास जैसे उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में अमेरिका से प्रतिस्पद्र्धा कर पाने की स्थिति में रहा। लेकिन सोवियत संघ ने कभी भी अपने वैज्ञानिक एवं तकनीकी सामथ्र्य का वाणिज्यिक रूप से दोहन करने की अनुमति नहीं दी। इसका परिणाम यह हुआ कि वह इलेक्ट्रॉनिक्स, जेनेटिक्स और पैसा कमाने की मंशा से किए गए अन्य वैज्ञानिक-तकनीकी विकास में पिछड़ता गया।

सोवियत संघ एवं उसके गुट में शामिल देश गरीब थे और गरीब ही बने रहे। यूएसएसआर के पास अपने सैन्य-औद्योगिक परिसर के बाहर विनिर्माण का सीमित आधार ही था। अपने पतन से पहले के एक दशक में सोवियत संघ को स्टार वार्स जैसे महंगे हथियार विकास कार्यक्रमों से टक्कर लेने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी थी।

इसके उलट चीन ने अपनी वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षमता से कमाई करने का विकल्प हमेशा खुला रखा। इसके शोध एवं विकास का 80 फीसदी से ज्यादा खर्च कॉर्पोरेट जगत से आता है और उसके पास घरेलू स्तर पर विकसित एवं उच्च तकनीक वाले अरबों डॉलर कारोबार वाली कंपनियों की एक बड़ी संख्या है।

चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा एवं सबसे विविधीकृत विनिर्माण आधार है। यह कई क्षेत्रों में एकाधिकार या लगभग-एकाधिकार की स्थिति में पहुंच चुका है और जेनेटिक्स, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सुपर-कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में नवीनतम शोध का अगुआ बन चुका है। इसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में ऑर्गेनिक वृद्धि हुई है जो क्षमताओं के विकास एवं उनके मुद्रीकरण के कारण हो पाया है। इसने अपने उद्यमियों को हरेक विदेशी बाजार का दोहन करने के लिए प्रोत्साहित किया है। इसके साथ ही उसने अपने बेहतरीन एवं प्रतिभावान छात्रों को विदेश जाकर पढऩे के लिए भी प्रोत्साहन दिया है ताकि वह हरेक क्षेत्र में विकास के शीर्ष पर बना रहे।

शीत युद्ध में शिकस्त के लिए सोवियत संघ की अलगाववाद की नीति का भी योगदान रहा। 'लौह आवरण' की संकल्पना ही इसलिए की गई थी कि एकल पार्टी के शासन वाले देश के नागरिक कहीं उदार राजनीतिक व्यवस्थाओं के संपर्क में आकर दूषित न हो जाएं। पूर्व जर्मनी या सोवियत संघ में रहने वाले किसी व्यक्ति के लिए सिर्फ मौज-मस्ती के इरादे से पेरिस या न्यूयॉर्क जाने का सवाल ही नहीं उठता था। इसी तरह सोवियत संघ या उसके अनुगामी देशों की यात्रा करना भी आसान नहीं था।

लेकिन इस लौह आवरण से छनकर आने वाली जानकारियों से सोवियत नागरिकों को इतना पता चल गया था कि एकल-पार्टी व्यवस्था में उन्हें खराब जीवन-स्तर पर रहना पड़ता है और दमन का सामना करना पड़ता है। हालत यह थी कि वे अपना जीवन स्तर सुधारने की चाहत भी नहीं रख सकते थे।

वहीं 'बम्बू कर्टेन' कोई भौतिक आवरण नहीं है। चीन बाहरी असर को रोकने के दूसरे तरीके अपनाता है। उसके पास ग्रेट फायरवाल है। वह अनुमोदित इन्फ्लूएंसरों के बड़ी फौज की मदद से घरेलू स्तर पर नियंत्रित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का काबू में रखता है।

वर्ष 2019 में चीन के 14 करोड़ से अधिक नागरिक दूसरे देशों की यात्रा पर गए और इसमें हॉन्ग कॉन्ग शामिल नहीं है। 'मिडल रिपब्लिक' के बाहर की दुनिया के साथ इसका खासा संपर्क है। चीन के नागरिक पहली दुनिया के देशों की संपन्नता से अच्छी तरह परिचित हैं। लेकिन उन्हें आकांक्षी उपभोक्ता बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और उन्होंने अपने जीवन स्तर में तेजी से आए सुधार का पूरा लुत्फ भी उठाया है।

चीन को हथियारों की होड़ में उलझाकर गरीबी के दलदल में नहीं धकेला जा सकता है। मुमकिन है कि ग्रेट फायरवाल से पार होकर पर्याप्त सूचना निकले और राजनीतिक सुधारों की मांग जोर पकड़ेगी। शायद एवरग्रैंड जैसे रियल एस्टेट बुलबुले व्यापक तरलता वाली अर्थव्यवस्था में एक धमाके की शुरुआत करेंगे।

अगर चीन में बड़े पैमाने पर राजनीतिक बदलाव होते हैं तो उसकी वैश्विक आर्थिक लागत भी बहुत ज्यादा होगी। हम पहले ही देख चुके हैं कि पिछले साल चीन में तीन महीनों के लिए लॉकडाउन लगने पर आपूर्ति शृंखला की हालत क्या हुई थी? अगर चीन फलता-फूलता रहता है तो समस्या होगी। अगर उसका पतन होता है तो भी समस्या होगी। भू-राजनीतिक संदर्भों में चीन की स्थिति 'दिल्ली का लड्ड'ू जैसी है जिसे खाने वाले और न खाने वाले दोनों को ही कष्ट होता है।

Keyword: चीन, शीत युद्ध, ऑकस, नाटो, वारसा, सोवियत संघ, तकनीकी शिक्षा, छात्र, बम्बू कर्टेन,
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