बिजनेस स्टैंडर्ड - नियामकीय स्वायत्तता तथा मानव संसाधन
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नियामकीय स्वायत्तता तथा मानव संसाधन

के पी कृष्णन /  October 06, 2021

कुछ दिन पहले समाचारपत्रों ने राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (एनएफआरए) के चेयरमैन की तरफ से एक 'एकल कानून' बनाने की मांग के बारे में खबर दी थी। एनएफआरए सापेक्षिक रूप से एक नया नियामक है और आम लोगों की नजर से अमूमन ओझल ही रहता है। कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 132 के तहत वर्ष 2018 में इसका गठन हुआ था। इसके चेयरमैन ने कहा है कि कंपनी अधिनियम की यह धारा अधिकरण की सभी गतिविधियों एवं शक्तियों को व्यापक रूप से समाहित नहीं करती है। उनका कहना है कि एनएफआर की प्रकार्यात्मक, वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए एक एकल कानून की सख्त जरूरत है। उनके मुताबिक ऐसा कानून एनएफआरए की नियामकीय क्षमता के निर्माण में बेहद अहम साबित होगा।

एनएफआरए जैसे स्वतंत्र नियामक के गठन की जरूरत दुनिया भर में हो रहे लेखांकन घोटालों की वजह से महसूस की गई थी ताकि कंपनियों के वित्तीय ब्योरे का मानक लेखा-परीक्षण हो सके और उस परीक्षण की गुणवत्ता भी सुनिश्चित हो सके। ऐसा होने पर कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले वित्तीय खुलासों पर निवेशक एवं आम लोग भरोसा कर सकें। एनएफआरए का स्वरूप एवं ढांचा और इसके एवं सरकार के बीच दायित्वों के विभाजन पर अधिक व्यापक चर्चा करने की जरूरत है। इस लेख में मानव संसाधन के क्षेत्र में नियामकों की स्वायत्तता के मसले पर गौर किया जाएगा।

नियमन को व्यापक स्तर पर निजी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों पर सरकारी एजेंसियों के इरादतन एवं सीधे दखल के तौर पर परिभाषित किया जाता है। भारत में विकसित नियमन का स्वरूप एक वैधानिक नियामकीय प्राधिकरण (एसआरए) के गठन और उस क्षेत्र से जुड़ी राज्य के तीनों अंगों- कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका की शक्तियों को कमोबेश रूप से समाहित कर देने का रहा है। ऐसा होने से यह वैधानिक अधिकरण न सिर्फ बहुत ताकतवर हो जाता है बल्कि उसे अपने क्षेत्र में विशिष्ट एवं लगातार अद्यतन होने वाले ज्ञान से तालमेल बिठाने के लिए जरूरी काबिलियत का भी विकास करने रहना पड़ता है।

इसे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के उदाहरण से बखूबी समझा जा सकता है। आरबीआई को बैंकिंग क्षेत्र के नियामक की अपनी भूमिका निभाने के लिए बैंकिंग से जुड़ी विशिष्ट जानकारी रखने वाले लोगों की जरूरत होती है। उसी तरह पूंजी बाजार के नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) को वित्तीय बाजार और कॉर्पोरेट जगत एवं प्रतिभूति बाजार से जुड़े कानूनों की गहरी समझ रखने वाले विशेषज्ञों की जरूरत होती है। कुछ साल पहले तक आरबीआई को वित्तीय-प्रौद्योगिकी (फिनटेक), भुगतान प्रणाली या डिजिटल मुद्रा से संबंधित जानकारों की बड़ी संख्या में जरूरत नहीं होती थी। इसी तरह सेबी को भी एल्गोरिद्मिक ट्रेडिंग या हाई-फ्रीक्वेंंसी ट्रेडिंग में महारत रखने वाले जानकारों की जरूरत नहीं पड़ती थी। लेकिन अब आरबीआई और सेबी दोनों ही नियामकों को अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावी कार्य निष्पादन के लिए नए क्षेत्रों से जुड़े विशेषज्ञों की जरूरत हो गई है। इन विशेषज्ञों को न सिर्फ अपने क्षेत्र की गहरी समझ होती है और वे नए परिवेश में उसके दुरुपयोग की आशंका से भी परिचित होते हैं। ऐसी स्थिति में विशेषज्ञ संभावित दुरुपयोग से उपभोक्ताओं को सुरक्षित रखने के लिए एहतियाती उपाय सुझाते हैं और उन्हें प्रभावी ढंग से लागू भी किया जाता है। अगर इन गतिविधियों से अधिनिर्णायक कार्य जुड़े होते हैं तो उस नियामक की ही दूसरी शाखा के पास यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि ये कदम उठाते समय नियमों का उल्लंघन किया गया और फिर उसके हिसाब से जरूरी सुधारात्मक एवं दंडात्मक कदम उठा सके।

इस लिहाज से नियामक की क्षमता का निर्माण सरकारी विभागों में क्षमता निर्माण से कहीं अधिक जटिल है। अगर यह मान भी लें कि वित्त मंत्रालय में काम करने के लिए अर्थशास्त्र एवं वित्त के ज्ञान को बदलते समय के हिसाब से अद्यतन करते रहना जरूरी होता है तो भी जरूरी ज्ञान का फलक एवं गहनता काफी अलग होती है। लिहाजा नियामकीय अधिकरणों को संबंधित क्षेत्र में होने वाले विकास के अनुरूप प्रतिभाओं की भर्ती, उसे बनाए रखना और स्थानापन्न खोजते रहने का लचीलापन दिखाना जरूरी होता है। कार्मिकों से संबंधित सामान्य सरकारी व्यवस्था ऐसे विशिष्ट क्षेत्रों एवं उनकी जरूरतों का ध्यान नहीं रख सकती है। इसके अलावा सरकार की सामान्य वेतन व्यवस्था इन विशेषज्ञों के लिए वांछनीय वेतन एवं अन्य लाभ देने के लिहाज से अपर्याप्त साबित होती है। मानव संसाधन के संदर्भ में वैधानिक अधिकरणों के पक्ष में यह बुनियादी दलील दी जाती है।

हालांकि इसका समाधान सिर्फ एक खास कानून से ही नहीं आ सकता है। मसलन, सेबी और भारतीय ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया बोर्ड जैसे नियामकीय अधिकरणों का गठन संसद द्वारा पारित कानूनों के जरिये हुआ है। इनमें नियामकों को अपनी गतिविधियों के संचालन को ध्यान में रखते हुए कार्मिकों की नियुक्ति करने का अधिकार दिया गया है। लेकिन व्यवहार में यही दिखता है कि तमाम नियामकों में नियुक्ति संबंधी हालात काफी अलग हैं।

इसका मतलब है कि समस्या कहीं और है। सरकार के सामान्य वित्तीय नियम (जीएफआर) कहते हैं कि अपने खर्च का 50 फीसदी से अधिक राशि सहायता अनुदान की शक्ल में लेने वाले संगठनों को अपने कर्मचारियों की सेवा शर्तें इस तरह निर्धारित करनी चाहिए कि वे सरकार में कार्यरत समान श्रेणी के कर्मचारियों को देय वेतन से ज्यादा न हों। असाधारण स्थिति में ही इस व्यवस्था में रियायत दी जा सकती है जिसके लिए वित्त मंत्रालय की मंजूरी जरूरी होती है। जीएफआर का एक और नियम यह अनिवार्य करता है कि ऐसे निकायों में पदों के सृजन के सभी प्रस्तावों को पहले मंजूरी लेनी होगी।

लोकसेवकों में पाई जाने वाली जोखिम से बचने की प्रवृत्ति और इतिहास को ध्यान में रखें तो संसद द्वारा बनाए गए कानून में अंतर्निहित प्रावधानों के बावजूद जीएफआर में वर्णित कार्यकारी निर्देश भारी पड़ते हैं। सेबी इस अत्याचार से इसलिए बच जाता है कि वह सरकारी सहायता पर आश्रित संगठन नहीं है और खुद ही अपने संसाधन जुटाता है। शुरुआती वर्षों में सेबी को सरकार से ब्याज-मुक्त कर्ज मिला था लेकिन उस समय भी सरकार ने जीएफआर के बजाय सेबी अधिनियम के प्रावधानों के ही हिसाब से काम किया। भारत को आने वाले समय में एनएफआरए और आईबीबीआई जैसे नियामकों की जरूरत पड़ेगी जिनके पास आमदनी के स्वाभाविक एवं प्रत्यक्ष स्रोत नहीं हों, लिहाजा दीर्घकालिक समाधान जीएफआर में नियामकीय अधिकरणों के साथ अलग बरताव पर ही निर्भर करेगा।

आधुनिक शासन चुनौतीपूर्ण है और इसके लिए तमाम तरह के सरकारी संगठनों की जरूरत होती है। संगठन के कामकाज की प्रकृति एवं उसका उद्देश्य ही संगठनों के वर्गीकरण का आधार होना चाहिए, न कि खुद संसाधन जुटा पाने की क्षमता। वैधानिक अधिकरणों की श्रेणी में संगठन को क्षमता एवं सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करने के लिए मानव संसाधन के मामले में स्वायत्तता की जरूरत होती है। वित्तीय क्षेत्र नियामकीय सुधार आयोग ने इस संदर्भ में वैधानिक नियामकीय अधिकरणों के बोर्ड को पूरा अधिकार देने और जीएफआर में जरूरी सुधार करने का सुझाव दिया था। ऐसा होने पर वैधानिक अधिकरणों को स्वायत्तता देने के साथ जवाबदेह भी ठहराया जा सकेगा।

(लेखक एनसीएईआर में प्रोफसर तथा पूर्व अफसरशाह हैं)

Keyword: नियामकीय स्वायत्तता, मानव संसाधन, संगठन, एनएफआरए, नियामक,
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