बिजनेस स्टैंडर्ड - आयुध कारखानों के 'निजीकरण' में सक्षमता का रहे ध्यान
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, October 20, 2021 09:19 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

आयुध कारखानों के 'निजीकरण' में सक्षमता का रहे ध्यान

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  October 06, 2021

आयुध कारखाना बोर्ड (ओएफबी) का वजूद शुक्रवार से खत्म हो चुका है। इसके कोलकाता स्थित मुख्यालय, 41 आयुध कारखानों, नौ प्रशिक्षण संस्थानों, तीन क्षेत्रीय विपणन केंद्रों एवं चार सुरक्षा नियंत्रक कार्यालयों को सार्वजनिक क्षेत्र के सात रक्षा उपक्रमों में बांट दिया गया है। नई व्यवस्था में निजी क्षेत्र को भी 542 रक्षा विनिर्माण लाइसेंस दिए गए हैं। ये सभी 60,000 करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादन का हिस्सा होंगे।

ओएफबी के अवसान के साथ ही ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से जुड़ा एक इतिहास खत्म हो चला है। भारत पर शिकंजा कसने और एशिया के अपने अन्य उपनिवेशों पर नियंत्रण के लिए ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने वर्ष 1787 में बंगाल के इच्छापुर में एक बारूद कारखाना स्थापित किया था। वर्ष 1801 में अंग्रेजों ने कोलकाता के पास काशीपुर में गन कैरेज एजेंसी शुरू की। वर्ष 1947 में देश को आजादी मिलने तक आयुध कारखानों की संख्या बढ़कर 18 हो चुकी थी। इस तरह ओएफबी के साथ 234 साल पुराना अध्याय भी खत्म हो गया है।

आयुध कारखानों ने यह सुनिश्चित किया कि सीमाओं पर तैनात जवानों को जंग के लिए जरूरी हर गोली, बंदूक, तोप, टैंक एवं अन्य रक्षा उपकरण मिलते रहें। लेकिन ओएफबी कभी भी इस सवाल का माकूल जवाब नहीं दे पाया कि 41 कारखानों में तैनात 76,000 कर्मचारी साल भर में सिर्फ 11,500 करोड़ रुपये के रक्षा उत्पाद ही क्यों बना पाते हैं? यह प्रति कर्मचारी सालाना 15 लाख रुपये मूल्य के उत्पादन को ही दर्शाता है। वर्ष 2005-06 में गठित विजय केलकर समिति समेत कई समितियों ने ओएफबी को कॉर्पोरेट ढांचे में ढालने की वकालत की थी और आखिरकार रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार-प्राप्त मंत्री समूह के सुझाव को लागू किया गया है। इस मंत्री समूह में गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, तत्कालीन कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, पूर्व श्रम एवं रोजगार मंत्री संतोष गंगवार और तत्कालीन कार्मिक, शिकायत एवं पेंशन राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह भी शामिल थे। समूह को केपीएमजी एडवाइजरी सर्विसेज और खेतान ऐंड कंपनी ने परामर्श सेवाएं दी थीं।

प्रस्तावित योजना के मुताबिक, गोला-बारूद बनाने वाले 12 बड़े आयुध कारखानों को मिलाकर रक्षा उपक्रम 'कम्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड' बनाया जाएगा। सैन्य वाहन बनाने वाले पांच अन्य कारखानों को मिलाकर 'आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड' नाम का उपक्रम बनेगा। वहीं हथियार एवं उपकरण बनाने वाले पांच अन्य कारखानों को मिलाकर 'एडवांस्ड वेपन्स ऐंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड' बनाया जाएगा। धातु एवं स्टील बनाने वाले आठ कारखानों को यंत्र इंडिया लिमिटेड नाम के उपक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा। बाकी 11 कारखाने इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड, ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड एवं ट्रूप कम्फट्र्स लिमिटेड का हिस्सा बनेंगे।

बड़ा सवाल अब भी यही है कि क्या ये संरचनात्मक बदलाव ओएफबी की खामियों को दूर करने के लिए काफी होंगे? ओएफबी को कॉर्पोरेट ढांचे में ढालने के पीछे की बुनियादी संकल्पना यही है कि निर्णय-निर्माण एवं रणनीति बनाने के स्तर पर कंपनियों के बोर्ड रक्षा मंत्रालय से आने वाले निर्देशों की तुलना में अधिक कारगर होंगे। हालांकि कई विश्लेषकों का मानना है कि ओएफबी की जगह बनने वाले नए उपक्रमों की भी संरचना पुरानी बनी रहने तक इनके सक्षम होने की संभावना कम ही है।

अक्षमता का एक बड़ा मुद्दा रक्षा उत्पादों की कीमतें तय करने से जुड़ा है। ओएफबी 'लागत प्लस' की अवधारणा पर कीमतें तय करता रहा है जिसमें बोर्ड प्रबंधन, श्रम, सामग्री एवं वितरण लागत के साथ करीब 15 फीसदी मुनाफे का मार्जिन रखकर सेना को सामान बेचता रहा है। सेना को किसी सस्ते विनिर्माता से सामान खरीदने का विकल्प नहीं दिया जाता है। ओएफबी के कामकाज में अक्षमता समाहित होने से उत्पादन प्रक्रिया में सुधार का कोई भी प्रोत्साहन नहीं रह जाता है। ओएफबी के मौजूदा कामकाजी मॉडल में बदलाव कर देने भर से इन अंतर्निहित अक्षमताओं के दूर हो जाने की संभावना कम ही है। अब तक ओएफबी की कमान रक्षा मंत्रालय के पास रही है और नए मॉडल में मंत्रालय के तहत गठित रक्षा उत्पादन विभाग उसका नियंत्रण करेगा। दोनों व्यवस्थाओं में रक्षा मंत्रालय का एक अफसरशाह ही उत्पादन पर नजर रखता है और उसे साफ-साफ बता दिया जाता है कि ऑर्डर-बुक भरना ही उसके वार्षिक मूल्यांकन का आधार होगा। मझगांव डॉक लिमिटेड के प्रभारी संयुक्त सचिव हमेशा यह ध्यान रखते हैं कि खरीद उनके मातहत के ऑर्डर-बुक के हिसाब से ही हो।

इसी तरह आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड के प्रभारी अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि खरीदे जाने वाले साजो-सामान में टी-90 या अर्जुन टैंक जरूर शामिल हों। इसी तरह एडवांस्ड वेपन्स ऐंड इक्विपमेंट इंडिया का प्रभार संभालने वाले अधिकारी चाहेंगे कि उनके उपक्रम को एके-203 राइफल बनाने का ऑर्डर जरूर मिले। आखिर रक्षा मंत्रालय ही भारत-रूस अंतर-सरकारी समझौते के लिए वार्ता करेगा और संबंधित अफसर पूरी कोशिश करेगा कि अनुकूल प्रावधान ही रखे जाएं।

एक और खतरा नए रक्षा उपक्रम के पास जंग जैसे हालात में अचानक उत्पादन बढ़ा पाने की क्षमता से जुड़ा है। यह क्षमता तैयार करना जरूरी है और इसे बनाए रखने पर भी अलग लागत आएगी। नए रक्षा विनिर्माण ढांचे में इस पहलू का किस तरह से ध्यान रखा गया है? अगर इस क्षमता की पुष्टि किसी जंग के समय ही करने के लिए छोड़ दिया गया है तो देश को उसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

आयुध कारखानों को कॉर्पोरेट ढांचे में ढालने या उनके निजीकरण की प्रक्रिया से संबंधित दूसरे देशों के अनुभवों से भी सीखा जा सकता है। मसलन, ब्रिटेन ने सरकारी स्वामित्व वाले रक्षा उत्पादन की जगह काफी हद तक निजीकृत रक्षा उद्योग का ढांचा अपनाया है। भारत और ब्रिटेन के रक्षा उद्योगों के बीच सामरिक संपर्क विकसित होने के बीच भारत को इस मसले पर ब्रिटेन से सीखने के लिए काफी कुछ होगा।

Keyword: आयुध कारखाने, निजीकरण, आयुध कारखाना बोर्ड, ओएफबी, सुरक्षा नियंत्रक,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या बाजार में तेजी का सिलसिला अभी बना रहेगा?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.