बिजनेस स्टैंडर्ड - हरित अर्थव्यवस्था से जुड़े जोखिमों का प्रबंधन
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हरित अर्थव्यवस्था से जुड़े जोखिमों का प्रबंधन

राजेश कुमार /  October 05, 2021

संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर गठित अंतर-सरकारी पैनल आईपीसीसी की तरफ से जारी नई रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इंसानी गतिविधियां अभूतपूर्व ढंग से जलवायु पर असर डाल रही हैं और इनमें से कुछ नुकसान की तो कभी भरपाई ही नहीं हो सकती है। जलवायु परिवर्तन दुनिया भर में लोगों की जिंदगी एवं आजीविका को प्रभावित करेगा और कुछ देशों पर इसका असर तुलनात्मक रूप से ज्यादा होगा। स्विस री इंस्टीट्यूट की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कारगर कदम नहीं उठाए जाने पर वर्ष 2050 तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में करीब 18 फीसदी की गिरावट आ सकती है। भारत पर भी इसकी तगड़ी मार पडऩे का अंदेशा है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के 2019 के एक अध्ययन से पता चला था कि भीषण गर्मी से उत्पादकता में आने वाली वैश्विक गिरावट वर्ष 2030 में करीब 8 करोड़ रोजगार अवसरों के बराबर होगी। साफ है कि जलवायु परिवर्तन के जोखिम को कम करने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है।

संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में आयोजित होने वाले अगले जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में इस मसले पर हुई प्रगति का आकलन कर भविष्य का एजेंडा तय किया जाएगा। इस गंभीर मुद्दे पर भारत समेत तमाम देशों का चलताऊ तरीका रहा है लेकिन हरित अर्थव्यवस्था की तरफ तेजी से कदम बढ़ाने से जुड़े गतिरोधों के बारे में भी ज्यादा चर्चा नहीं हुई है। अब इस बदलाव को टाल पाना मुमकिन न होने से इसके लिए खुद को बेहतर ढंग से तैयार करना ही समझदारी है। यह लेख भारत के संदर्भ में तीन क्षेत्रों पर गौर करेगा।


हरित व्यवसाय जोखिम

नवीकरणीय ऊर्जा की तरफ त्वरित बदलाव अब जरूरी हो चुका है लेकिन यह कई कारोबारों में बड़े बदलाव भी लेकर आएगा। मसलन, भारत में पैदा होने वाली बिजली का बड़ा हिस्सा कोयला-आधारित संयंत्रों से आता है और विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए अगले कुछ वर्षों में ऐसे कुछ संयंत्र और बनाने होंगे। लेकिन भारत के तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा का रुख करने से कोयला-आधारित बिजली संयंत्रों की उत्पादन क्षमता का दोहन कम होगा और निवेश पर मिलने वाला प्रतिफल प्रभावित होगा। इसका ऋण एवं इक्विटी धारकों दोनों पर ही असर पड़ेगा। इसी तरह भारत के पास एक बड़ा ऑटोमोटिव उद्योग आधार है। इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ रुझान बढऩे से बाजार पर गहरा असर पड़ेगा और कुछ विनिर्माता एवं उपकरण निर्माता कारोबार से ही बाहर हो जाएंगे। वित्तीय नुकसान से इतर इसका रोजगार पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इलेक्ट्रिक वाहनों में कम कलपुर्जे होने से उनकी मरम्मत की भी कम जरूरत होगी। इस तरह नीतिगत नजरिये से जलवायु परिवर्तन के प्रभाव एवं इस बदलाव के प्रबंधन की उनकी क्षमता दोनों के ही संदर्भ में कारोबारों का आकलन अहम होगा।


मौद्रिक नीति एवं केंद्रीय बैंक

कुछ केंद्रीय बैंकों ने जलवायु परिवर्तन के तनाव को मापना शुरू कर दिया है। वित्तीय स्थिरता के अलावा कीमत स्थिरता कायम रखने का उद्देश्य भी प्रभावित हो सकता है, खासकर भारत जैसे देश में जहां खपत का एक बड़ा हिस्सा खाद्य पदार्थों का है। हाल ही में प्रकाशित एक लेख में भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर ऊर्जित पटेल ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केंद्रीय बैंक की गतिविधियों का समायोजन नहीं होने पर सर्वोत्कृष्ट नीतिगत विकल्प नहीं आ पाएंगे। इस मसले पर आगे चलकर दुनिया भर में बहस होने की संभावना है।

जलवायु जोखिमों से निपटने एवं कीमत स्थिर रखने के लिए केंद्रीय बैंकों के तौर-तरीकों पर संभवत: अधिक शोध की जरूरत होगी। आउटपुट पर स्थायी रूप से चोट पहुंचने के जोखिम को कम करने के लिए यह महत्त्वपूर्ण होगा क्योंकि इससे निवेश पर असर और जलवायु जोखिम बढ़ सकते हैं। अगर आरबीआई इस संदर्भ में अनुसंधान कर समुचित प्रतिक्रिया का खाका बना लेता है तो उससे मदद मिलेगी। केंद्रीय बैंकों के अब बाजार हस्तक्षेपों के जरिये टिकाऊ वृद्धि को समर्थन देने की उम्मीद है। हालांकि आरबीआई के एक और पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि केंद्रीय बैंकों को ऐसा करने से परहेज ही करना चाहिए क्योंकि यह बुनियादी तौर पर एक राजकोषीय मसला है।


भीषण राजकोषीय जोखिम

 भारत का एक हरित अर्थव्यवस्था के रूप में बदलाव केंद्र एवं राज्य दोनों स्तरों पर गंभीर किस्म के राजकोषीय जोखिम लेकर आएगा। दोनों जगह की सरकारें पेट्रोलियम उत्पादों से प्राप्त राजस्व पर ज्यादा निर्भर हैं। पिछले वित्त वर्ष में ही सामान्य सरकारी राजस्व में पेट्रोलियम उत्पादों का अंशदान 6.7 लाख करोड़ रुपये रहा था। केंद्र सरकार को पेट्रोलियम क्षेत्र से प्राप्त कुल कर एवं गैर-कर राजस्व 4.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक था। सैद्धांतिक तौर पर अगर पेट्रोलियम उत्पादों की जगह अन्य स्रोत लेते हैं तो राजस्व की यह धारा खत्म हो जाएगी। अगर इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन मिलने से मांग का कुछ हिस्सा भी बिजली क्षेत्र की तरफ खिसकता है तो इससे और बड़ी राजकोषीय जटिलताएं पैदा होंगी। भारत का बिजली क्षेत्र इस समय पूरी तरह अस्त-व्यस्त हालत में है। राज्य द्वारा संचालित बिजली वितरण कंपनियों का कर्ज बोझ इस वित्त वर्ष में 6 लाख करोड़ रुपये के पार हो जाने का अनुमान है। उन पर बिजली उत्पादक कंपनियों का करीब 1 लाख करोड़ रुपये बकाया है और यह स्थिति पिछले साल केद्र सरकार द्वारा बकाया भुगतान के लिए 90,000 करोड़ रुपये मूल्य का तरलता समर्थन देने के बाद की है। बिजली वितरण कंपनियों की हालत राज्य सरकारों के वित्त पर जोखिम को बढ़ा सकती है।

इस तरह ऑटो क्षेत्र में पेट्रोलियम के बजाय बिजली की मांग बढऩे से सरकारी वित्त के लिए असाधारण जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। यह भी साफ नहीं है कि इन जटिलताओं को ठीक से समझा गया है या नहीं। इस संदर्भ में दो व्यापक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर सुधार लाने होंगे। पहला, केंद्र एवं राज्यों की सरकारों को राजस्व के लिए पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता कम करनी होगी। पेट्रोलियम उत्पादों पर ज्यादा कर लगाना समझदारी भरा कदम है क्योंकि इससे नए ऊर्जा विकल्प अपनाने के लिए लोग प्रोत्साहित होंगे। लेकिन पेट्रोलियम पर ज्यादा कर लगाना राजकोषीय बाध्यता नहीं होनी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि प्रत्यक्ष कर एवं जीएसटी प्रणाली दोनों में ही आमूलचूल बदलाव किए जाएं। दूसरा, ऊर्जा क्षेत्र में व्याप्त अव्यवस्था को हमेशा के लिए दूर करना होगा। यह स्वीकृति अहम है कि उपभोक्ताओं को ही भुगतान करना होगा और इसका कोई और तरीका नहीं है। अगर इन दोनों मुद्दों पर फौरन ध्यान नहीं दिया गया तो हरित अर्थव्यवस्था की तरफ कदम बढ़ाने की कोई भी सार्थक कोशिश राजकोषीय स्थिति, वृद्धि एवं वित्तीय स्थिरता के लिए गंभीर जोखिम के हालात पैदा करेगी। इसका अंत आखिर में जलवायु जोखिमों के बढऩे एवं भारत की वैश्विक स्थिति कमजोर होने के रूप में ही होगा।

Keyword: हरित अर्थव्यवस्था, जोखिम प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन, आईपीसीसी, रिपोर्ट,
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