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क्या भारत मायने रखता है?

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  September 26, 2021

इस सप्ताह के स्तंभ के शीर्षक को लेकर और तीव्र प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि यकीनन भारत मायने रखता है और आप यह अहमकाना सवाल तब उठा रहे जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका में थे और पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन तथा अपने साथी क्वाड नेताओं से मुलाकात कर रहे थे तथा संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित कर रहे थे। या फिर यह कहा जा सकता है कि सुनिए आप इंटरनेट पर हिट बटोरने के लिए जानबूझकर भड़काऊ बातें कर रहे हैं।

यकीनन भारत मायने रखता है और अगर मैं अपने ही आलेख के शीर्षक के सवाल का नकारात्मक उत्तर दूंगा तो अनाड़ी ही माना जाऊंगा। दूसरे आरोप पर मैं खुद को दोषी मानता हूं। मैं जानबूझकर भड़काऊ बात कर रहा हूं। इसकी वजह इस प्रकार है।

पहली बात, यह समझाना आसान है कि भारत क्यों हमेशा से मायने रखता है और 21वीं सदी में तो वह और भी ज्यादा मायने रखता है। प्रधानमंत्री ने खुद यह समझाया है कि आखिर क्यों भारत दुनिया के लिए भारी आकर्षण की वजह है। अनुप्रास अलंकार की अपनी चिरपरिचित शैली में उन्होंने तीन 'डी' सामने रखे : डेमोग्राफी, डेमोक्रेसी और डिमांड यानी आबादी, लोकतंत्र और मांग। जब मोदी देश के वैश्विक आकर्षण की इतनी जबरदस्त व्याख्या कर दें तो एक स्तंभकार के पास कहने को कुछ खास नहीं रह जाता।

हमें यह सवाल पूछना चाहिए कि कौन सी बात भारत को ऐसे समय में अधिक या कम महत्त्वपूर्ण बनाती है, जब उसकी वैश्विक संबद्धता, खासतौर पर रणनीतिक मोर्च पर संबद्धता सबसे मजबूत है और निर्णायक है?

सोवियत संघ के टूटने के बाद भारत अपेक्षाकृत एक दशक तक विश्व स्तर पर गुमनामी में रहा। इसके बाद इसे दोबारा निर्मित करने की तैयारी आरंभ हुई। चार प्रधानमंत्रियों ने इस दिशा में प्रयास किए। पीवी नरसिंह राव ने बहुमत की कमी के बावजूद, अटल बिहारी वाजपेयी ने कठिन गठबंधन के दौरान जो 17 दिन, 13 महीने और फिर साढ़े चार वर्ष चला, मनमोहन ङ्क्षसह ने वाम दलों के समर्थन से सरकार चलाने के बाद और नरेंद्र मोदी लगातार दो बार पूर्ण बहुमत से यही कर रहे हैं।

मैं इस बात को लेकर सतर्क हूं कि इन दिनों नेहरू का कोई भी जिक्र कई लोगों को भड़काऊ लगता है। लेकिन अगर मैं नियति से साक्षात्कार वाली उनकी बात उधार लूं तो यह कहना सुरक्षित होगा कि राव भारत के लिए नई रणनीतिक नियति के साथ एक नया वादा लेकर आए थे और अब इसे पूरा करने का वक्तआ चुका है, भले ही पूरी तरह या संपूर्ण रूप से नहीं लेकिन महत्त्वपूर्ण रूप से। यह मौका मोदी के पास है। सवाल यह है कि क्या भारत तैयार है? ये बातें हमें भारत के आकर्षण की उन तीन वजहों की ओर लाती हैं जिन्हें प्रधानमंत्री अक्सर तीन डी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। फिलहाल वह 2019 के बाद रणनीतिक रूप से अब तक की सबसे अहम बैठकें कर रहे हैं, ऐसे में इन तीनों पर अलग-अलग तरह की समस्याएं मंडरा रही हैं। देश की जनांकीय स्थिति अब चुनौती बन चुकी है क्योंकि बेरोजगारी तेजी से बढ़ी है और अगर इस पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो हम मुसीबत में पड़ सकते हैं। हमारी आर्थिक स्थिति के कारण मांग संघर्ष कर रही है और इस बात से सरकार भी इनकार नहीं करेगी। हम महामारी को दोष दे सकते हैं, और दुनिया इससे उबरने की प्रतीक्षा करेगी।

लोकतंत्र वह क्षेत्र है जहां मोदी के भारत को सबसे तीव्र चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। यह लगभग पूरी तरह मोदी सरकार और उनकी पार्टी की राजनीति की देन है। गूगल करके उन वक्तव्यों को दोबारा देखिए जो मोदी और अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने अपनी मुलाकात शुरू होने के पहले मीडिया से बातचीत में दिए। वहां कूटनीतिक अच्छाई और सराहना तो मौजूद थी ही लेकिन हैरिस के संक्षिप्त वक्तव्य में कुछ पैराग्राफ उल्लेेखनीय थे। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में लोकतंत्र खतरे में है लेकिन 'यह जरूरी है कि हम अपने-अपने देश में लोकतांत्रिक सिद्धांतों और संस्थानों की रक्षा करें।' क्या अमेरिकी उपराष्ट्रपति भारतीय प्रधानमंत्री को उपदेश दे रही थीं जबकि प्रोटोकॉल के मुताबिक वह उनके समकक्ष नही हैं?

हैरिस ने कुछ भी अस्पष्ट नहीं रखा और कहा, 'मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव और अपने परिवार के माध्यम से यह जानती हूं कि भारत के लोग लोकतंत्र को लेकर कितने प्रतिबद्ध हैं...और ऐसे में जो कुछ किया जाना है उसकी हम कल्पना कर सकते हैं और फिर आखिरकार हम लोकतांत्रिक सिद्धांतों और संस्थानों का अपना विजन हासिल कर लेंगे।'

यह ट्रंप के युग से एकदम अलग है। हम जानते हैं कि डेमोके्रट ऐसे मसलों को लेकर रिपब्ल्किन नेताओं की तुलना में ज्यादा कड़ा रुख रखते हैं। यहां तक कि बराक ओबामा ने भी 2015 के अपने दौरे के अंत में एक सार्वजनिक भाषण में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर 'सलाह' दी थी। हालांकि तब दौरे का औपचारिक हिस्सा समाप्त हो चुका था और वहां नरेंद्र मोदी भी मौजूद नहीं थे।

यदि मोदी को इससे झटका भी लगा हो तो उन्होंने इसे कैमरे पर नहीं झलकने दिया। बाद में बंद कमरे में हुई बैठक में यह मुद्दा कितना उठा यह हमें आने वाले दिनों में द न्यूयॉर्क  टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट, पॉलिटिको आदि को पढ़कर मिल जाएगा।

यह पहला मौका था जब मोदी को एक विदेशी वार्ताकार से सार्वजनिक रूप से ऐसी बातें सुननी पड़ीं। हालांकि उन्होंने इसे जिस सहजता से लिया वह सराहनीय कूटनयिक कौशल दर्शाता है। सवाल यह है कि क्या वह इस बात पर मंथन करेंगे कि उनकी सरकार और पार्टी के किन गलत कदमों से यह नौबत बनी? ट्रंप-पेंस से बाइडन-हैरिस तक अमेरिका में बदलाव आया भी है और नहीं भी। बाइडन प्रशासन चीन की चुनौती के बारे में खुलकर बात कर रहा है। वह केवल ट्वीट नहीं कर रहा है बल्कि ठोस तरीके से बात कर रहा है। खासतौर पर चीन को ध्यान में रखकर की गई ऑक्स जैसी सैन्य संधि इसका प्रमाण है। लोकतांत्रिक व्यवहार और अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिमों के साथ व्यवहार के कारण वह अलग है।

सभी नेता अपनी राजनीतिक जरूरतों पर प्रतिक्रिया देते हैं। ट्रंप मुस्लिमों पर इसलिए ध्यान नहीं देते थे क्योंकि वे उन्हें वोट नहीं देते थे, न कभी देने वाले थे। बाइडन-हैरिस उनकी फिक्र करते हैं क्योंकि वे उन्हें वोट देते हैं और आगे भी उन्हें उनके वोट चाहिए। बड़े देशों की तरह उनके नेता भी अपने हित में काम करते हैं। यदि दोनों एक साथ हों तो यह उनके हित में होता है।

यह सत्य का साक्षात्कार करने का अवसर है जब मोदी को अपनी घरेलू, चुनावी राजनीति पर मंथन करना होगा। क्या यह देश के व्यापक सामरिक हित के खिलाफ है? अफगानिस्तान का घटनाक्रम यही बताता है कि दुनिया खासकर दुनिया का वह हिस्सा जिससे हम जुड़े हैं, अब इस्लामिक आतंकवाद से दूर हो चुका है। चीन अब इस्लामिक आतंकवाद को वैश्विक खतरा नहीं मानता।

अमेरिकी विचारक फ्रांसिस फुकुयामा इस बारे में कुछ समय से चेतावनी दे रहे हैं कि दुनिया के लिए नया रणनीतिक खतरा चीन है, न कि इस्लामिक आतंकवाद। इसीलिए दुनिया को यह फिक्र नहीं है कि तालिबानी अफगान नागरिकों के साथ क्या कर रहे हैं।

इन हालात में भी बाइडन इमरान खान को फोन नहीं कर रहे क्योंकि पाकिस्ताान मायने नहीं रखता। यदि अफगानिस्तान को तकदीर के हाथों छोड़ा जा सकता है तो पाकिस्तान भी अपनी रणनीतिक अहमियत गंवा चुका है। इसके उलट भारत की अहमियत बढ़ गई है। केवल इसलिए नहीं कि वह आतंक के खिलाफ जंग में सहयोगी है बल्कि इसलिए भी कि वह बड़ा, शक्तिशाली और सैन्य मोर्चे पर मजबूत है तथा वह चीन का सामना करने को तैयार है। उसने अपनी रणनीतिक हिचक भी दूर कर ली है। फ्रीडम हाउस को आप अमेरिकी सत्ता का अनुकरण करने वाला या उससे भी बुरा कुछ कह लें लेकिन यदि वह भारत को आंशिक रूप से स्वतंत्र लोकतंत्र कहता है तो यह बात बहुत नुकसान पहुंचाने वाली है। ऐसे में पांच दशकों में देश के सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री को अमेरिकी उपराष्ट्रपति से सार्वजनिक रूप से बातें सुननी पड़ती हैं।

मोदी के पास ऐतिहासिक अवसर है कि वह देश को एक नए सुरक्षित कूटनीतिक क्षेत्र में ले जाएं। ऐसा पूर्ण लोकतंत्र के साथ ही संभव है। वह इस अवसर का लाभ उठा सकते हैं या घरेलू राजनीति के आकर्षण में इसे गंवा भी सकते हैं।

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