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चीन की संशोधित पटकथा!

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  September 24, 2021

चीन वैश्विक आर्थिक वृद्धि में किसी एक देश द्वारा किए जाने वाले योगदान में शीर्ष पर है। दुनिया के विनिर्माण केंद्र के रूप में और प्रमुख कारोबारी देश के रूप में वह वैश्विक मांग में बदलाव में सबसे अधिक योगदान देता है। वह लगभग सभी जिंसों के कारोबार में प्रमुख है। इस वर्ष चीन वैश्विक वृद्धि में एक तिहाई से अधिक योगदान कर सकता है। इसका अर्थ यह भी है कि जब चीन में मंदी आएगी तो दुनिया भर में मंदी आएगी। यदि चीन में मांग कम होगी तो तेल से लेकर स्टील तक हर चीज की कीमत गिरेगी। इसका प्रभाव वित्तीय जगत समेत पूरी दुनिया में महसूस होगा।

यही कारण है कि चीन की सबसे बड़ी आवासीय कंपनी एवरग्रैंड (जिसका स्वामित्व उस व्यक्ति के पास है जो चीन का सबसे अमीर व्यक्ति हुआ करता था) में आए संकट ने हर जगह बाजार में घबराहट पैदा की है। एवरग्रैंड का कारोबार बहुत व्यापक है। कंपनी के 16 लाख आवास निर्माणाधीन हैं और कंपनी पर 300 अरब डॉलर का कर्ज है जो भारत के कारोबारी जगत के कुल कर्ज के लगभग बराबर है। इस समूह की एक इलेक्ट्रिव व्हीकल कंपनी में दो तिहाई हिस्सेदारी है। जब इस वाहन ने एक भी वाहन नहीं बनाया था तब भी उसका मूल्यांकन फोर्ड मोटर्स से अधिक था। जब इतने बड़े आकार की कंपनी वित्तीय डिफॉल्ट के कगार पर होती है तो बाजार दम साध लेते हैं। पिछले सप्ताह ऐसा ही हुआ। एवरग्रैंड के शेयरों की कीमत पहले ही एक वर्ष पहले की तुलना में एक बटा छह रह गई है। उसके बॉन्ड की कीमत एक डॉलर से घटकर 26 सेंट रह गई। निवेशकों को आशा थी कि वे कम से कम अपना एक चौथाई पैसा वापस निकाल लेंगे। शुक्रवार को वे आंशिक वसूली में कामयाब रहे। एवरग्रैंड वेतन भुगतान करने में विफल रही, वह वेंडरों का बिल भी नहीं चुका पा रही। कुछ स्थानीय सरकारों ने नए अपार्टमेंटों की बिक्री पर रोक लगा दी है। यदि कंपनी नाकाम होती है तो इसका असर चीन की अन्य आवासीय कंपनियों पर पड़ेगा। इससे उभरते बाजारों के बॉन्ड का जोखिम प्रीमियम बढ़ेगा। यदि ऋण का प्रवाह खत्म होता है तो चीन की अन्य आवासीय कंपनियों के लिए भी हालात मुश्किल हो सकते हैं। इसके बावजूद जब चीन जैसी बड़े आकार की अर्थव्यवस्था के समक्ष रखकर देखा जाए तो यह एक छोटी समस्या नजर आती है जिसे बिना किसी खास मुश्किल के दूर किया जा सकता है। एवरगैं्रड का 300 अरब डॉलर का कर्ज चीन के कुल कर्ज के एक फीसदी का बहुत छोटा हिस्सा है। चीन के अधिकारी कंपनी का पुनर्गठन कर सकते हैं। असंबद्ध कारोबार मसलन इलेक्ट्रिक वाहन कारोबार को बेचा जा सकता है। राज्य का समर्थन मिलने से बाजार शांत हो सकते हैं और दुष्प्रभाव में कमी आ सकती है।

एवरग्रैंड संकट में इसलिए आई क्योंकि वह एक बड़ी समस्या का हिस्सा है जिसने गत वर्ष चीन को अत्यधिक कर्ज के खिलाफ कदम उठाने को मजबूर किया था। खासतौर पर आवासीय क्षेत्र की कंपनियों पर। जैसा कि हम सब जानते हैं, चीन का कर्ज जीडीपी का करीब तीन गुना है जो बहुत खतरनाक स्तर है। हाल के वर्षों में कर्ज और जीडीपी का अनुपात दोगुना हो गया है। गत वर्ष घोषित कड़े ऋण मानक का अर्थ यह है कि एवरग्रैंड जैसी कंपनियों के सामने ऋण की नई सीमा खड़ी हो गई। तब चीन ने संकेत दिया कि वह कुछ कंपनियों की बंदी को लेकर गंभीर था। ऐसे में अगर सरकार अब एवरग्रैंड को उबारती है तो अन्य कंपनियां भी ऐसा ही चाहेंगी। इससे वित्तीय संकुचन का लक्ष्य धरा रह जाएगा। आगे का घटनाक्रम वित्तीय संक्रमण और व्यवस्थित जोखिम को लेकर चीन की अवधारणा से तय होगा। संक्षेप में एवरग्रैंड का कुल कर्ज भले ही चीन के कुल कर्ज के एक फीसदी से कम हो लेकिन क्या वह इतनी बड़ी है कि उसे नाकाम नहीं होने दिया जा सकता?

एवरग्रैंड के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रभाव सीमित हो सकते हैं क्योंकि उसका अधिकांश कर्ज घरेलू है। इसके बावजूद दूसरे दौर के प्रभाव अवश्य होंगे। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यदि मुक्त ऋण प्रवाह ने चीन की तेज वृद्धि में मदद की है, खासकर 2008 के वित्तीय संकट के बाद तो कड़े ऋण मानक उसकी आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं। यह बात व्यापक वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर डालेगी। यदि एवरग्रैंड बच जाती है तो भी उसे अपने बहीखाते दुरुस्त करने में वर्षों का समय लगेगा। भारत ऐसा अहसास कर चुका है। चाहे जो भी हो इसके साथ ही उस चमत्कारी वृद्धि का अंत हो सकता है जिसने चीन को दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और अमेरिका को आर्थिक और सामरिक चुनौती देने लायक बनाया। शायद एक संशोधित पटकथा लिखने की आवश्यकता है।

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