बिजनेस स्टैंडर्ड - राज्यों को साथ लेकर चले केंद्र सरकार
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, October 20, 2021 10:27 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

राज्यों को साथ लेकर चले केंद्र सरकार

ए के भट्टाचार्य /  September 23, 2021

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान की गई बड़ी आर्थिक पहलों में एक दिलचस्प विरोधाभास नजर आता है। एक ओर सरकार ने लंबे समय से लंबित कई दिक्कतदेह नीतिगत मसलों को हल करने की उत्सुकता दिखाई है लेकिन दूसरी ओर आर्थिक नीतियों में बुनियादी बदलाव की उसकी कोशिशें परवान नहीं चढ़ सकी हैं।

इन निर्णयों को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। एक हिस्सा उन निर्णयों का है जिनका इरादा देश के औद्योगिक जगत की मदद करना था तो दूसरा उन नीतिगत बदलावों से संबंधित है जो राज्य सरकारों की प्रतिभागिता और सहयोग चाहते हैं। मोदी सरकार ने इनमें से पहले हिस्से पर जिस सहजता से निर्णय लिए वह उल्लेखनीय है लेकिन नीतिगत बदलाव लागू करने के क्षेत्र में विफलता की अनदेखी भी नहीं की जा सकती।

सरकार ने दूसरे कार्यकाल के आरंभ में ही कॉर्पोरेशन कर दरों में कमी की घोषणा की थी जो रियायतों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने से संबद्ध थी। देश का कारोबारी जगत इससे प्रसन्न था। सन 2021-22 के आम बजट में निजीकरण और सरकारी परिसंपत्तियों के मुद्रीकरण की नीति घोषित की गई। यह सच है कि निजीकरण की गति धीमी रही है। अब तक कोई संपत्ति नहीं बेची जा सकी है और बीमा कंपनियों के निजीकरण का विधेयक पारित जरूर हुआ है लेकिन कुछ प्रश्नों के साथ। इस बीच सरकार मुद्रीकरण योजना के साथ सामने आई है जिसका इरादा है बुनियादी ढांचा क्षेत्र की सरकारी परिसंपत्तियों को लीज पर देकर राजस्व जुटाना।

इसी प्रकार सन 2012 का अतीत की तिथि से प्रभावी कानून का भूत भी एक विधायी बदलाव के साथ चला गया है और पीडि़त विदेशी कंपनियों के साथ बातचीत आरंभ की गई ताकि उनके साथ हुए विवाद को हल किया जा सके। संकटग्रस्त दूरसंचार क्षेत्र के लिए एक राहत पैकेज घोषित किया गया। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह कंपनियों के वित्तीय संकट को हल करने में कितना मददगार होगा।

इसके विपरीत सरकार ने कृषि और श्रम कानूनों में सुधार के जो प्रयास किए हैं उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली। कोविड-19 के बीच तथा संसद में ज्यादा बहस के बगैर सरकार ने 2020 में तीनों कानून पारित कर दिए। इन कानूनों की बदौलत किसान अपनी उपज अपनी पसंद से किसी को भी बेच सकते थे। फसल भंडारण के मानक भी शिथिल किए गए और अनुबंधित कृषि की इजाजत दी गई। परंतु उत्तर भारत के कुछ इलाकों में किसानों के भारी विरोध के चलते सर्वोच्च न्यायालय ने इन तीनों कानूनों पर रोक लगा दी।

जिन चार श्रम संहिताओं की मदद से श्रम कानूनों को सहज बनाना था उन्हें भी संसद ने पारित कर दिया लेकिन अब तक उनके नियम नहीं बन सके हैं। अब लग रहा है कि चारों संहिताएं अगले वर्ष से ही प्रभावी हो सकेंगी, हालांकि संसद ने उन्हें 2020 में पारित किया था। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था में सुधार धीमे रहे हैं। दरों को तार्किक बनाने के लिए अब तक कोई समयसीमा तय नहीं है और राज्य क्षतिपूर्ति पैकेज के जरिये अपने राजस्व को बरकरार रखने के लिए जूझ रहे हैं। सहकारी क्षेत्र का महत्त्वाकांक्षी सुधार एजेंडा जिसके बारे में जुलाई में नए सहकारिता मंत्रालय के जरिये संदेश दिया गया था, उसमें दिक्कत आ रही है क्योंकि अदालतों ने केंद्र के नीतिगत क्षेत्र का दायरा सीमित कर दिया है।

ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि मोदी सरकार निजी क्षेत्र के लिए उपाय और प्रोत्साहन पेश करने में कतई नहीं हिचकिचा रही है। कारोबारी जगत के लिए कर कम करना, सरकारी उपक्रमों का निजीकरण, कुछ क्षेत्रों में उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजना के जरिये निजी क्षेत्र को निवेश बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन, चुनिंदा वस्तुओं के लिए शुल्क बढ़ाना, अतीत से प्रभावी प्रावधानों का अंत, दूरसंचार क्षेत्र के लिए सरकारी राजस्व गंवाने जैसे कदमों का भारतीय जनता पार्टी, संघ परिवार या सरकार के भीतर भी विरोध नहीं हुआ।

यदि मोदी सरकार को आर्थिक नीति क्रियान्वयन में कहीं विरोध का सामना करना पड़ता है तो यह वही क्षेत्र है जहां राज्यों की भूमिका है। भाजपा तथा उसके राजनीतिक सहयोगी देश के 18 राज्यों में शासन में हैं। लेकिन अगर कृषि, श्रम, जीएसटी तथा सहकारिता कानूनों में बदलाव लाना है तो सभी राज्यों की सहमति जरूरी है ताकि सहज क्रियान्वयन हो सके। चूंकि प्रधानमंत्री अतीत में स्वयं मुख्यमंत्री रह चुके हैं इसलिए उन्हें यह पता होना चाहिए था। किसी को भी देश के राज्यों की शक्ति को कम करके नहीं आंकना चाहिए क्योंकि उन्हें संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। परंतु मौजूदा केंद्रीय नेतृत्व को अभी यह समझना है और इसका संचालन और वृद्धि पर अहम प्रभाव होगा।

व्यापक तौर पर माना जाता है कि मध्यम अवधि की आर्थिक वृद्धि को सरकारी निवेश बढ़ाकर स्थायी बनाया जा सकता है क्योंकि निजी खपत में जल्दी सुधार की गुंजाइश नहीं है। परंतु दिक्कत यह है कि अधिकांश विश्लेषक केंद्र की पूंजीगत व्यय योजना के आधार पर यह अनुमान लगाते हैं कि निवेश कितना बढ़ रहा है। इस दौरान वे इस बात की अनदेखी कर देते हैं कि इस मोर्चे पर राज्यों का प्रदर्शन कैसा है? ऐसे चालू वित्त वर्ष के शुरुआती चार महीनों में केंद्र के पूंजीगत व्यय में 15 फीसदी की वृद्धि दर चिंता का विषय बन जाती है क्योंकि यह दर 26 फीसदी की प्रस्तावित वार्षिक वृद्धि दर से बहुत कम है।

परंतु लगता नहीं कि कोई राज्यों की पूंजीगत व्यय योजना पर ध्यान दे रहा है। राज्यों का कुल बजट आकार केंद्रीय बजट के कुल व्यय से 30 फीसदी अधिक है। राज्यों के व्यय के रुझान का आकलन करने में कई समस्याएं भी हैं। पहली बात तो यह कि राज्य अपने राजस्व और व्यय के वर्गीकरण में किसी मानक का प्रयोग नहीं करते जिससे तुलना करना मुश्किल होता है। दूसरा राज्यों के बजट आंकड़े कई महीनों की देरी से जारी किए जाते हैं। जबकि केंद्र के आंकड़े एक महीने बाद सामने आ जाते हैं। राज्यों के बजट पर रिजर्व बैंक एक वर्ष बाद जानकारी प्रकाशित करता है।

राज्यों के बजट आंकड़ों के मानकीकरण की आवश्यकता है। इसके साथ ही उन्हें केंद्र के आंकड़ों के वर्गीकरण के साथ सुसंगत करना होगा। इसके अलावा ऐसे संस्थानों की जरूरत है जो केंद्र तथा राज्यों के बीच आर्थिक नीति के मसलों पर स्वस्थ बहस का मंच दे सकें। अहम नीतिगत सुधार राजनीतिक मतभेद की भेंट नहीं चढऩे चाहिए क्योंकि इससे क्रियान्वयन में देरी होती है।

अंतरराज्यीय परिषद का गठन 1990 में हुआ था। बीते तीन दशक में उसकी केवल 11 बैठक हुई हैं। पिछली बैठक 2016 में हुई थी। अब वक्त आ गया है कि सहकारी संघवाद को बढ़ावा देकर केंद्र और राज्यों के बीच के नीतिगत मसले हल किए जाएं। चूंकि कई नीतिगत क्षेत्रों में केंद्र और राज्य बीते वर्षों से आमने सामने हैं इसलिए वक्त आ गया है कि मोदी सरकार अंतरराज्यीय परिषद की 12वीं बैठक बुलाए।

Keyword: राज्य, केंद्र सरकार, अंतरराज्यीय परिषद, कॉर्पोरेशन कर दर, मुद्रीकरण योजना,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या बाजार में तेजी का सिलसिला अभी बना रहेगा?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.