बिजनेस स्टैंडर्ड - प्रबंध संस्थानों में अब परिवर्तन का वक्त
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प्रबंध संस्थानों में अब परिवर्तन का वक्त

अजित बालकृष्णन /  September 22, 2021

हर साल लाखों भारतीय युवा देश के करीब 5,000 प्रबंध शिक्षण संस्थानों में प्रवेश पाने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। प्रबंध स्नातक यानी एमबीए की डिग्री को न सिर्फ बेहतर वेतन पाने के एक रास्ते के तौर पर देखा जाता है बल्कि यह करियर बदलने का भी एक मौका देती है। यह बात भारत की ही तरह यूरोप, अमेरिका और साम्यवादी चीन में भी उतनी ही सही है। इसके अलावा उच्च प्रबंध संस्थानों में शिक्षा के लिए एक से दूसरे देश जाने वाले युवाओं की भी अच्छी तादाद होती है। भारत के छात्र अमेरिका एवं यूरोपीय देशों का रुख करते हैं जबकि यूरोपीय छात्र भारत के प्रबंध संस्थानों में पढऩे के लिए आते हैं। बीते एक दशक में दुनिया के हरेक देश में प्रबंध संस्थान अपने कुछ छात्रों को मिलने वाले मोटे वेतन पैकेज को लेकर अक्सर सुर्खियों में आते रहते हैं।

अमेरिका के बहुचर्चित उद्यमी एलन मस्क ने द वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए एक साक्षात्कार में कहा है कि अमेरिकी कारोबार का 'एमबीए-करण' होने से इसे नुकसान उठाना पड़ रहा है और अमेरिकी कंपनी अधिकारियों को उत्पाद या सेवा पर अधिक ध्यान देना चाहिए, न कि बोर्ड बैठकों एवं वित्तीय पहलुओं पर।

बिजनेस स्कूलों को ज्यादा दोषी न ठहराएं तो दुनिया भर में उनकी वित्त-उन्मुखता सापेक्षिक रूप से एक नई परिघटना है जिसका जन्म संभवत: वर्ष 2000 के बाद के दौर में हुआ है। उसके बाद से बिजनेस स्कूलों से निकले युवाओं की वित्त एवं प्रबंध क्षेत्र ( मसलन गोल्डमैन सैक्स, मॉर्गन स्टैनली, मैकिंजी, बेन ऐंड कंपनी ) में इतनी शिद्दत से मांग रही है कि इन दो क्षेत्रों में ही प्रबंध स्नातकों को कुल नौकरियों में से करीब 40 फीसदी की पेशकश हुई। इसके अलावा सर्वाधिक शुरुआती वेतन देने वाली 80 फीसदी कंपनियां इन दोनों क्षेत्रों की ही रही हैं।

ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि बिजनेस स्कूलों ने अपने पाठ्यक्रम को भी इस तरह से ढाल दिया कि इन दोनों क्षेत्रों की जरूरतों को आसानी से पूरा किया जा सके।

अगर हम गहराई से देखें तो प्रबंध संस्थानों के रुख में आया बदलाव अधिकांश अर्थव्यवस्थाओं में घट रही 'वित्तीयकरण' की परिघटना की उपज था। अस्सी के दशक से लेकर आज के दौर तक अधिकांश देशों में वित्तीय सेवाओं का अन्य क्षेत्रों की तुलना में राष्ट्रीय आय में हिस्सा बढ़ता रहा है। वित्तीय समाधानों की संख्या एवं प्रकार में आई व्यापक तेजी से इसे और मजबूती मिली। शेयर, बॉन्ड एवं मुद्रा जैसे परंपरागत रूपों के अलावा शेयर वायदा, मुद्रा वायदा, ब्याज दर अदला-बदली एवं डेरिवेटिव जैसी चीजें भी सामने आई हैं। इस प्रक्रिया की अगुआई करने वाले अमेरिका में भी वित्तीय क्षेत्र का जीडीपी में अंशदान 2019 में बढ़कर 21 फीसदी हो गया था जबकि 1950 में यह सिर्फ 2.8 फीसदी हुआ करता था।  

स्वाभाविक है कि वृद्धि की इस विशाल लहर में तालमेल बिठाने के लिए वित्तीय सेवा प्रदाता एवं सलाहकार कंपनियां प्रबंध संस्थानों में भीड़ लगाने लगीं और प्रबंध स्नातकों को ऐसे वेतन की पेशकश करने लगीं जिसके बारे में पहले कभी सुना ही नहीं गया था। उधर बिजनेस स्कूलों के छात्र भी आसमान छूता वेतन देने वाली इन कंपनियों के साथ काम करने लायक बनने के लिए वित्त संबंधी पाठ्यक्रमों को ही तरजीह देते नजर आए।

निश्चित रूप से यह पहली बार नहींं है जब प्रबंध संस्थानों ने अर्थव्यवस्था में आए संरचनात्मक बदलावों के हिसाब से खुद को ढाला है। इसके पहले 1960 के दशक के उत्तराद्र्ध और 1970 के दशक के पूर्वाद्र्ध में बिजनेस स्कूलों में चर्चा का केंद्र 'मार्केटिंग' हुआ करता था। उस समय (मैं आईआईएम कलकत्ता का छात्र था) यह साफ नहीं था कि ऐसा क्यों हो रहा है, लेकिन समय बीतने के साथ अब यह स्पष्ट हो चुका है कि तब दुनिया एक रासायनिक क्रांति के बीच में थी जिसमें जिसमें सिंथेटिक डिटर्जेंट, पेंट और पॉलिएस्टर कपड़े जैसे नए उत्पाद सामने आ रहे थे। इन चीजों का विनिर्माण आसान होने से दर्जनों कंपनियां उन्हें बना रही थीं, लिहाजा उपभोक्ताओं के मन में किसी खास उत्पाद को स्थापित करना जरूरी था। यहीं से ब्रांड की अवधारणा का जन्म हुआ जिसका मतलब किसी खास उत्पाद के बारे में एक अमूर्त छवि का निर्माण है। ब्रांड निर्माण में महारत रखने वाली विज्ञापन एजेंसियों का भी खूब प्रसार हुआ। (खुद मैंने भी दो विज्ञापन एजेंसियों में काम करने के बाद खुद रीडिफ्यूजन एजेंसी की स्थापना की थी)। उस समय के बिजनेस स्कूल इसके लिए जरूरी दक्षताएं विकसित करने में जोर-शोर से जुटे रहते थे। मसलन, मार्केट रिसर्च, ब्रांड रणनीति और तैयार उत्पादों के वितरण के लिए विशाल बिक्री टीम का प्रबंधन।

अब हम स्पष्ट रूप से एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं जहां किसी कारोबार की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि उत्पाद  नवाचार से जुड़े कौशल का कितना इस्तेमाल किया गया है। इसे व्यापक तौर पर कृत्रिम मेधा (एआई) का नाम दिया जाता है जो कारोबार जगत की पुरानी चुनौतियों- उपभोक्ता वर्गीकरण और बिक्री पूर्वानुमान के बारे में अधिक कुशलता से काम करती है। एआई से कारोबार जगत को देखने का एकदम नया तरीका भी सामने आ सकता है ; मसलन, कारोबार को इकाइयों के एक नेटवर्क के रूप में देखना, अपने कारोबार से संबंधित नेटवर्क की मैपिंग और अवसरों की संबद्धता, भौगोलिक क्लस्टर एवं हब का पता लगाने के साथ एल्गोरिद्म से जुड़े पूर्वग्रहों से बचने का सबक। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के दो प्रोफेसरों मार्को लैंसिटी और करीम लखानी की लिखी किताब 'कम्पीटिंग इन द एज ऑफ एआई' उत्पाद नवाचार में इन विषयों की अहमियत को रेखांकित करती है। इससे पता चलता है कि अब तक सिर्फ तकनीकी जानकारों के बीच ही जुनून के रूप में देखा जाने वाला एआई किस तरह से बिजनेस स्कूलों में भी अपनाया जा रहा है।

किसी दौर में होने वाले हरेक बदलाव की तरह बिजनेस स्कूलों एवं सभी शिक्षण संस्थानों के लिए इन नए विषयों को पढ़ाने वाले अच्छे शिक्षकों की तलाश भर नहीं है। कहीं बड़ी चुनौती मौजूदा शिक्षकों के ऐसा बदलाव होने की स्वीकारोक्ति, कुछ पाठ्यक्रमों को हटाने में उनका सहयोग लेने और नए पाठ्यक्रम शुरू करने की है। शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा कोई भी शख्स आपको यह बता देगा कि एक शैक्षणिक ढांचे में इस काम को अंजाम तक पहुंचाना सबसे मुश्किल कामों में से एक है। अचानक ही एलन मस्क की टिप्पणी के कहीं गहरे अर्थ समझ आने लगते हैं कि एमबीए डिग्री-धारकों को उत्पाद एवं कारोबार-मॉडल नवाचारी बनना होगा, न कि सिर्फ वित्तीय लक्ष्यों के पीछे भागने वाला युवा।

(लेखक इंटरनेट उद्यमी हैं)

Keyword: प्रबंध संस्थान, परिवर्तन, कृत्रिम मेधा, पाठ्यक्रम, एमबीए, वेतन, छात्र,
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