बिजनेस स्टैंडर्ड - 'ऑकस' प्रभाव
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'ऑकस' प्रभाव

संपादकीय /  September 20, 2021

ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका (संक्षेप में ऑकस) के बीच हालिया समझौते का समय भारत के लिए अनुकूल है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 24 सितंबर को होने वाले चार देशों के सुरक्षा संवाद (क्वाड्रिलैटरल सिक्युरिटी डायलॉग या क्वाड) शिखर बैठक के लिए वॉशिंगटन रवाना होने वाले हैं। चूंकि कोविड-19 महामारी के आगमन के बाद क्वाड के नेता पहली बार भौतिक रूप से मिल रहे हैं (गत मार्च में एक आभासी बैठक हुई थी) इसलिए बैठक से अपेक्षाएं भी ज्यादा हैं। खासकर अमेरिका के अफगानिस्तान से अचानक बाहर निकलने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के परिदृश्य में। क्वाड एक ढीलाढाला भूराजनीतिक समूह है जिसमें अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत शामिल हैं। इसे चीन की समुद्री सीमाओं को लेकर विस्तारवादी नीति से निपटने के लिए आकार दिया गया था। मूल रूप से इसकी स्थापना 2007 में की गई थी लेकिन इसने 2017 में तब गति पकड़ी जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने चीन से निपटने की व्यापक रणनीति तैयार की।

सन 2020 में भारत के तटवर्ती इलाके में क्षेत्रीय सैन्य कवायद हुई। उस वक्त ऑस्ट्रेलिया संवाद और इस कवायद दोनों में शामिल हुआ। चीन ने इस मंच को 'एशियाई नाटो' का नाम दिया है। यह नामकरण भले ही गलत है लेकिन इससे यही संकेत मिलता है कि वह इस समूह को गंभीरता से ले रहा है। ऑकस समझौते पर 15 सितंबर को हस्ताक्षर हुए और यह राष्ट्रपति जो बाइडन द्वारा उस रणनीति पर जोर दिए जाने का संकेत है। यह ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच सबसे बड़ी रक्षा साझेदारियों में से एक है और इसके माध्यम से ऑस्ट्रेलिया के पास पहली बार मौका है कि वह अमेरिका द्वारा मुहैया कराई गई तकनीक के जरिये परमाणु ऊर्जा चालित पनडुब्बी बनाए। इस समझौते में कृत्रिम मेधा तथा अन्य तकनीक शामिल होंगी। तीनों देशों के नेताओं के संयुक्तआभासी संवाददाता सम्मेलन में चीन का स्पष्ट उल्लेेख नहीं था लेकिन बढ़ती क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं के उल्लेेख ने उनके इरादे जाहिर कर दिए। अनुमान के मुताबिक चीन ने इस गठजोड़ की भी आलोचना की है। उसने अमेरिका पर आरोप लगाया है कि वह 'शीतयुद्ध की मानसिकता' बरकरार रखे है। परंतु ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के लिए इसका प्रभाव फ्रांस की नाराजगी के रूप में सामने आया क्योंकि ऑस्ट्रेलिया ने फ्रेंच शिपयार्ड को दिया बर्राकुडा श्रेणी की पनडुब्बियों का ठेका निरस्त कर दिया।

ऑकस क्वाड की तुलना में ज्यादा मजबूत गठजोड़ है क्योंकि क्वाड मोटेतौर पर सदस्यों के बीच साझा हित के मसलों पर द्विपक्षीय समझौतों का अस्पष्ट नेटवर्क बनकर रह गया है। इसमें कोविड-19 टीका कूटनीति आदि बातें भी शामिल हैं। इसकी द्विपक्षीय प्रकृति बैठक के पहले नेताओं की मुलाकातों में स्पष्ट है। उदाहरण के लिए 23 सितंबर को मोदी अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। इसके बाद अन्य सदस्य देशों के नेताओं के साथ ऐसी ही बातचीत होगी। प्रत्येक साझेदार एक दूसरे के साथ ऐसी बैठकें करेगा। इन बैठकों का अपना महत्त्व है लेकिन वे यह रेखांकित करती हैं कि क्वाड अब तक द्विपक्षीय हितों वाला समूह है, न कि ऐसा गठजोड़ जो समान साझा एजेंडा प्रकट करे। यह बात इस तथ्य से भी प्रमाणित है कि मार्च की बैठक के बाद एक साझा घोषणा के बजाय हर नेता ने अलग-अलग वक्तव्य जारी किया। भारत के लिए यह बात अहम है। तीन बुनियादी समझौतों पर देर से हस्ताक्षर के बावजूद भारत अमेरिकी सैन्य छतरी के बाहर है जबकि जापान और ऑस्ट्रेलिया उसके दायरे में हैं। ऑकस आसानी से क्वाड से आगे निकल सकता है। एक मजबूत बहुपक्षीय मंच के रूप में बदलाव तकनीक और सूचना साझा करने की क्षमता देता है। यदि ऐसा हो सका तो क्वाड चीन से निपटने के क्रम में ज्यादा सार्थक समूह बन सकेगा। ऐसे में मोदी के लिए बेहतर होगा कि वह अमेरिका में बहुपक्षीयता के एजेंडे का इस्तेमाल करें।

Keyword: ऑकस, समझौते, नरेंद्र मोदी, शिखर बैठक, क्वाड, अफगानिस्तान, भूराजनीति,
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