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पुराने अनुभव और सहयोगियों के दबाव ने खट्टर को निखारा

आदिति फडणीस /  September 17, 2021

मनोहर लाल खट्टर सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में दो साल पूरे कर लिए हैं। सवाल है कि इस सरकार का प्रदर्शन कैसा रहा है? अगर आप हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा का कहना है कि यह एक निकम्मी सरकार है। हुड्डा ने कहा है कि खट्टर सरकार के कार्यकाल में राज्य में बेरोजगारी रिकॉर्ड स्तर पर जा पहुंची है, कानून व्यवस्था का कोई नामोनिशान नहीं है और सरकार फैसले करने के मामले में तो विलक्षण है। 

हुड्डा ने खट्टर सरकार के दूसरे कार्यकाल के 600 दिन पूरे होने पर कहा था, 'सीएमआईई के आंकड़ों के मुताबिक, हरियाणा का हरेक तीसरा व्यक्ति बेरोजगार है क्योंकि सरकार का ध्यान भर्ती करने के बजाय कर्मचारियों की छंटनी पर है। युवाओं को रोजगार देने की जगह सरकार ने पुराने कर्मचारियों को बर्खास्त करने की नीति अपना ली है। सरकार पहले विज्ञापन निकालती है और फिर भर्ती प्रक्रिया को ही निरस्त कर देती है।' लेकिन यह सच्चाई का एक बहुत छोटा हिस्सा है। सच तो यह है कि खट्टर सरकार को पहले कार्यकाल में हासिल अनुभव, गठबंधन सहयोगियों के दबाव और तुलनात्मक रूप से कम भ्रष्टाचार का का लाभ मिल रहा है। अगर खट्टर सरकार के कुछ मंत्री ऐसा न मानें तो भी यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। मुख्यमंत्री के रूप में खट्टर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन एवं संरक्षण हासिल है और राज्य में कोई बड़ा फेरबदल नहीं होने तक वह अपने पद पर बने रहेंगे। इस तरह के कोई संकेत नहीं हैं कि भाजपा हरियाणा में भी अपनी सरकार का चेहरा बदलने की तैयारी में है। 

मोदी और खट्टर एक-दूसरे को तब से जानते हैं जब मोदी हरियाणा के प्रभारी हुआ करते थे। खट्टर आपातकाल के दौरान ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संपर्क में आए थे और 1977 में बाकायदा इसके सदस्य बन गए। आरएसएस की विचारधारा एवं आपातकाल के दौरान स्वयंसेवकों के आचरण से प्रभावित खट्टर तीन साल बाद आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक भी बन गए। बाद में वह हरियाणा की राजनीतिक गतिविधियों में मोदी के सहयोगी के तौर पर काम करने लगे। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने और भुज एवं कच्छ इलाकों में भीषण भूकंप ने तबाही मचाई थी तो खट्टर को पुनर्निर्माण एवं पुनर्वास समिति की अगुआई करने के लिए बुलाया गया। उसके अगले साल वह जम्मू कश्मीर के चुनाव प्रभारी बनाए गए। फिर 2014 में खट्टर को हरियाणा में विधानसभा चुनावों के लिए गठित अभियान समिति का प्रमुख बनाया गया।

खट्टर का परिवार मूलत: पश्चिम पाकिस्तान से ताल्लुक रखता है। बेहद गरीबी के हालात में उनका परिवार हरियाणा आकर बस गया था। संपर्क में आने पर मोदी को खट्टर बेहद आत्मीय शख्स लगे। आरएसएस संगठन एवं भाजपा के सहयोगी ढांचे की गहरी एवं व्यापक समझ उनकी खासियत थी। व्यक्तिगत स्तर पर ईमानदारी का पालन उनकी शख्सियत का एक खास पहलू अब भी बना हुआ है।

पिछली कई सरकारों में उगाही एवं गलत तरीकों से पैसे कमाने के असर से बेहाल हरियाणा के लिए खट्टर के रूप में वह रोशनी नजर आई जो सबसे स्याह कोनों में भी उजाला फैला सके। लेकिन कुछ समस्याएं साफ नजर आ रही थीं। खट्टर भाजपा के लिए तो चुनाव जीत सकते थे लेकिन वह अपने जीवन में खुद पहली बार विधायक बने थे। उन्होंने करनाल सीट से चुनाव जीता था। भाजपा के सबसे अनुभवी विधायक राम विलास शर्मा थे जो बंसीलाल के साथ भी काम कर चुके थे जबकि अनिल विज के पास अच्छा विधायी अनुभव था। लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में खट्टर को चुना गया तो अन्य दावेदारों के मन का गुस्सा छिपा नहीं रह पाया। इतने साल बाद भी वह नजर आ जाता है। 

खट्टर ने तो वही काम किया जो उन्हें आता था, जिसे वह बखूबी समझते थे और जिस पर उन्हें पूरा यकीन था। वह आरएसएस या उससे जुड़े लोगों की सलाह पर अमल करने लगे। शीर्ष अधिकारियों की नियुक्ति उनकी काबिलियत के आधार पर नहींं हो रही थी, उन्हें अपने परिवार या संघ से संपर्कों की वजह से अहम पोस्टिंग दी जाने लगी। एक निरापद दुनिया में अफसरों की ट्रांसफर-पोस्टिंग जाति एवं अन्य संबद्धताओं से परे होती। लेकिन भारतीय समाज एवं राजनीति में यह हमेशा ही मौजूद होती है। 

खट्टर सरकार की प्रशासकीय नाकामियों के लिए जाति और अनुभव की कमी को जिम्मेदार बताया गया। हरियाणा में खासा दबदबा रखने वाले जाट समुदाय के आंदोलन पर काबू पाने में प्रशासन बुरी तरह नाकाम रहा था। इसी तरह रामपाल की गिरफ्तारी के समय उसके समर्थकों का हिंसात्मक विरोध और फिर डेरा प्रमुख राम रहीम की गिरफ्तारी के समय भी पुलिस-प्रशासन बेबस नजर आए। लोगों की नजर में ये घटनाएं सरकार की अक्षमता की ही उपज थीं।

फिर 2019 के चुनाव आ गए। हरियाणा में भाजपा लोकसभा की सभी 10 सीट जीतने में सफल रही लेकिन विधानसभा में इसका प्रदर्शन उतना अच्छा नहीं रहा। हालांकि इसका मत प्रतिशत पहले से बेहतर हुआ लेकिन यह कुल 90 में से 40 सीट का आंकड़ा नहीं पार कर पाई। उसे मजबूरन दुष्यंत चौटाला की जनता जननायक पार्टी (जजपा) से हाथ मिलाना पड़ा और खट्टर को उन्हें अपनी सरकार में उप मुख्यमंत्री का पद देना पड़ा।

लगता है कि खट्टर के लिए यह कार्यभार जिंदगी बदलने वाला अनुभव रहा है। पहले वह दूसरे नेताओं का सर्वे किया करते थे लेकिन सरकार के मुखिया के तौर पर उन्हें अपनी पार्टी, सरकार एवं गठबंधन सहयोगियों के अंतर्विरोधों से भी निपटना पड़ता है। संभवत: खट्टर ने राजनीतिक सामंजस्य बिठाने की कला सीख ली है। किसानों के आंदोलन को संभालने का उनका अंदाज इसकी तस्दीक भी करता है। 

हरियाणा में चुनाव अभी दूर हैं। इस सरकार में गृह मंत्री अनिल विज और उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला का काफी अहम स्थान है और खट्टर को खुद ज्यादा नियंत्रण लेने की जरूरत पड़ सकती है। भाजपा में खट्टर के उत्तराधिकारी को लेकर स्थिति साफ नहीं होने तक हर कोई खुद को खट्टर से बेहतर हरियाणा का 'हृदय सम्राट' समझता रहेगा।
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