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खपत का वाहक बन सकता है ग्रामीण भारत का मध्यम वर्ग

महेश व्यास /  September 17, 2021

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) अपने कंज्यूमर पिरामिड्स हाउसहोल्ड सर्वे का इस्तेमाल करके उपभोक्ता रुझान सूचकांक तैयार करता है। सूचकांक 12 सितंबर को समाप्त सप्ताह में 5.3 फीसदी बढ़ा। इससे पिछले सप्ताह यह 3.9 फीसदी बढ़ा था। परिणामस्वरूप सितंबर में इसकी समग्र वृद्धि 9 फीसदी से अधिक हो चुकी है। चूंकि देश में 2021 के त्योहारी मौसम की शुरुआत हो रही है इसलिए उपभोक्ता रुझान में यह तेजी उत्साह बढ़ाने वाली है।

गणेश उत्सव की शुरुआत 10 सितंबर को हुई और यह 20 सितंबर तक जारी रहेगा। अक्टूबर के पहले सप्ताह में नौ दिवसीय नवरात्रि  उत्सव की शुरुआत होगी। नवंबर के आरंभ में दीपावली के त्योहार की तैयारी शुरू हो जाएगी और फिर 19 नवंबर को गुरु नानक जयंती आ जाएगी। इसी समय खरीफ की फसल की कटाई भी होगी।

यह महत्त्वपूर्ण है कि उपभोक्ताओं का यह उत्साहवद्र्धक रुझान त्योहारी मौसम में उपभोक्ताओं के खर्च में तब्दील हो। यही कारण है कि सितंबर में अब तक उपभोक्ता रुझान में 9 फीसदी का इजाफा खासा महत्त्व रखता है। यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि उपभोक्ता रुझान की मदद से उन आम परिवारों को त्योहारी मौसम में खर्च करने के लिए प्रेरित किया जाए जिनके पास वाकई खर्च करने की क्षमता है। इस संदर्भ में करनाल में किसानों और सरकार के बीच थोड़े समय की संधि मायने रखती है। इसके चलते मॉनसून के अनिश्चित होने के बावजूद आखिरकार खरीफ की बुआई ने भी जोर पकड़ा है। अब यह बुआई सामान्य रकबे को पार कर चुकी है। मॉनसून के उतार-चढ़ाव के कारण फसल उत्पादन में जरूर गिरावट आ सकती है। परंतु मॉनसून के शुरुआती महीनों की तुलना में सीजन के आखिरी दिनों में बुआई की स्थिति में सुधार हुआ है। सितंबर में हुई बारिश के कारण फसल को हुआ नुकसान कीमतों में मजबूती की वजह बन सकता है। ध्यान रहे कि कीमतें मार्च-अप्रैल की तुलना में कुछ कम हो चुकी हैं। शायद खरीफ की फसल में सुधार और अन्य संबद्ध कारकों की वजह से ही ग्रामीण भारत प्रभावित हुआ है और उपभोक्ताओं का रुझान मजबूत हो रहा है।

आंकड़े बताते हैं कि हाल के सप्ताहों में उपभोक्ताओं के रुझान में जो सुधार हुआ है वह ग्रामीण भारत के कारण ही है। 12 सितंबर को समाप्त सप्ताह में जहां समग्र उपभोक्ता रुझान 5.3 फीसदी बढ़ा, वहीं ग्रामीण भारत का सूचकांक 9 फीसदी की दर से बढ़ा। इसी प्रकार 5 सितंबर को समाप्त सप्ताह में भी जहां समग्र उपभोक्ता रुझान सूचकांक 3.9 फीसदी बढ़ा था, वहीं ग्रामीण भारत का सूचकांक 4.9 फीसदी की दर से बढ़ा था।

ग्रामीण भारत का सितंबर में अखिल भारतीय उपभोक्ता रुझान सूचकांक को इस प्रकार वाहक बनना अगस्त महीने के प्रदर्शन के साथ निरंतरता में है। अगस्त में सूचकांक में 1.7 फीसदी की मामूली वृद्धि देखने को मिली थी। अगस्त में हुई बढ़ोतरी पूरी तरह ग्रामीण भारत पर केंद्रित थी। उपभोक्ता रुझानों का ग्रामीण सूचकांक महीने के दौरान 4 फीसदी बढ़ा जबकि शहरी भारत के लिए यह दो फीसदी कम हुआ। 

उपभोक्ता रुझान सूचकांक का मासिक अनुमान व्यापक विष्लेषण का अवसर देते हैं क्योंकि इसमें शामिल नमूने का आकार व्यापक है। इस पड़ताल से हमें पता चलता है कि देश के ग्रामीण इलाके में उपभोक्ता रुझान में तेजी का प्राथमिक स्रोत क्या है।

पहली बात, अगस्त में जहां उपभोक्ता रुझान का ग्रामीण सूचकांक 4 फीसदी बढ़ा, जाहिर है वह ग्रामीण भारत का ही कोई आय समूह होगा जिसने इस वृद्धि को गति दी। यह वह समूह था जिसने सालाना 2 लाख रुपये से 5 लाख रुपये के बीच कमाए। यह ग्रामीण भारत का सबसे बड़ा आय समूह भी है। इस समूह के उपभोक्ता रुझान अगस्त में 12.5 फीसदी बढ़े। यह आम परिवारों का एक बड़ा समूह है।

बल्कि यह ग्रामीण भारत के आधे हिस्से से संबद्ध है। एक अनुमान के मुताबिक 21.5 करोड़ आबादी वाले ग्रामीण भारत में से 6.9 करोड़ इस वर्ग में आते हैं। यह ग्रामीण भारत का मध्य आय वाला समूह है। यदि करीब एक तिहाई ग्रामीण भारत का उपभोक्ता रुझान त्योहारी मौसम के ठीक पहले तेजी महसूस कर रहा है तो आने वाले महीनों में ग्रामीण भारत के उपभोक्ता बाजार में इसका असर होगा।

परिवारों के पेशे के अनुसार अगस्त के रुझान को देखें तो यह भी पता चलता है कि एक खास समूह के उपभोक्ता रुझानों में भी ऐसा ही देखने को मिला। यह है ग्रामीण भारत का वेतनभोगी वर्ग। अगस्त में इस समूह का उपभोक्ता रुझान सूचकांक 16.1 फीसदी बढ़ा। यह ग्रामीण भारत की 4 फीसदी की समग्र वृद्धि से अधिक है। ग्रामीण भारत में वेतनभोगी वर्ग का आकार बहुत बड़ा नहीं है क्योंकि वे अखिल भारतीय स्तर पर भी उनकी गिनती बहुत अधिक नहीं है।

ग्रामीण भारत में ऐसे 2.3 करोड़ परिवार होने का अनुमान है। इनमें से करीब आधे यानी 1.1 करोड़ 2 लाख से 5 लाख रुपये तक कमाते हैं। इन रुझानों को लेकर यही वर्ग सबसे अधिक उत्साही होते हैं। ग्रामीण भारत में बड़ा तबका ऐसा है जो वेतनभोगी नहीं है। करीब 5 करोड़ परिवार ऐसे हैं जो 2 लाख रुपये से 5 लाख रुपये के बीच कमाते हैं। यह वर्ग फिलहाल बहुत आशावादी है। इनमें से कारोबारी और किसान उपभोक्ता रुझान में 5 फीसदी से अधिक सुधार के लिए जिम्मेदार हैं। लेकिन ग्रामीण भारत के दैनिक वेतन भोगियों के उपभोक्ता रुझान में कोई सुधार देखने को नहीं मिला।

शहरी भारत में उपभोक्ता रुझान कमजोर रहा है। सितंबर के पहले दो सप्ताह में जहां ग्रामीण सूचकांक 14.3 फीसदी बढ़ा वहीं, शहरी भारत में यह केवल एक फीसदी बढ़ा। 12 सितंबर को समाप्त सप्ताह में इसमें एक फीसदी की गिरावट आई। अगस्त में यह दो फीसदी गिरा था। जब तक कोई नई उथलपुथल नहीं मचती, ग्रामीण भारत उपभोक्ता मांग में सहायक होता दिख रहा है।

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