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मातृभाषा की किताबों से ही आदर्श समाज गढ़ने का काम होगा पूरा: अनामिका

बीएस बातचीत
शिखा शालिनी /  09 13, 2021

साहित्य के क्षेत्र में पिछले तीन दशकों से कवि, आलोचक, उपन्यासकार के तौर पर सक्रिय अनामिका को उनके कविता संग्रह 'टोकरी में दिगन्त:थेरी गाथा' के लिए 2020 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से 18 सितंबर को सम्मानित किया जाना है। उनका यह पुरस्कार इस मायने में भी अहम है कि साहित्य अकादमी के 68 वर्षों के इतिहास में पहली बार हिंदी कविता संग्रह के लिए किसी महिला को यह पुरस्कार दिया जा रहा है। अनामिका को स्त्रीवादी विमर्श की सशक्त हस्ताक्षर माना जाता है और उनकी पुस्तकों का अनुवाद रूसी, कोरियाई, जापानी, स्पैनिश और अंग्रेजी जैसी भाषाओं में हो चुका है। वह मानती हैं कि भाषा को जानने का सबसे कारगर माध्यम है साहित्य और नई पीढ़ी को इससे जोडऩे की आवश्यकता है। शिखा शालिनी के साथ उनकी बातचीत के प्रमुख अंश:

मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को प्रोत्साहन देने के लिए संसद की समितियां, विभाग बनाने, प्रयोजनमूलक भाषा का कोर्स शुरू करने जैसी कोशिशों के बावजूद हर जगह अंग्रेजी का वर्चस्व दिखता है। इसकी क्या वजह लगती है?

प्रोत्साहन शब्द ही मारक है। बचपन में जब किसी प्रतियोगिता में मुझे सांत्वना या प्रोत्साहन पुरस्कार मिलता था तो मैं अपनी पसंदीदा लेमनचूस चूसती हुई सोचती थी कि 'यह कैसा गजब मेल'। 'सांत्वना' और 'प्रोत्साहन' की जोड़ी 'पुरस्कार' के साथ बिल्कुल नहीं जमती। यह पदानुक्रम जैसा है, जो हिंदी की प्रकृति के विरुद्ध है। हिंदी स्वाधीनता आंदोलन की भाषा थी, आधुनिकता के गर्भ से जन्मी स्वाधीनता आंदोलन की भाषा, तभी इसने तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशज, सब तरह के शब्द-समूहों को एक पांत, एक चटाई पर बिठाया। ऐसा ही अन्य मातृभाषाओं में भी हुआ, पर सरकारी समितियां इस सहज सहकारी प्रवृत्ति के विरुद्ध आचरण करके शुद्धता रचती हैं। जैसे हर व्यक्ति अपने ढंग से अनूठा है, हर भाषा भी। ठीक है, कुछ भाषाओं के पास अधिक समृद्ध साहित्य की विरासत है पर जनतंत्र में विरासत शब्द भी 'मूंछ' पर ताव देने का माध्यम नहीं बनना चाहिए। कोई अनाम-गोत्र है, उसके पीछे विरासत की गठरी नहीं तो भी वह इतना ही अनूठा है, उसमें भी उतनी ही संभावनाएं मौजूद हैं, जिन्हें सामने लाने का हरसंभव प्रयास न सिर्फ  सरकारी समितियों बल्कि भगिनी भाषाओं को भी करना चाहिए, उससे बोल-बतियाकर, उसका संकोच तोड़कर, सुंदर अनुवादों के द्वारा उसमें नए स्वर, नई बिजली भरकर। लेकिन ये प्रयास 'आरोपित'नहीं लगने चाहिए और न इस भाव से किए जाने चाहिए जैसे कृपा की जाती है या जबरदस्ती।

मातृभाषा भी मां ही है। हर संकट, हर दुविधा की घड़ी में, अंतरंग संवाद के लिए उसका उपलब्ध रहना जरूरी है। आठवीं के बाद मातृभाषाएं क्या, हिंदी भी पाठ्यक्रमों से गायब हो जाती हैं। माता-पिता, शिक्षक, किताब की दुकानें, वीडियो-कंपनियों, वाचनालय, पुस्तकालय, नाट्यमंडल आदि को इस ओर अत्यधिक सजग होना होगा कि ढेर सारी कहानियां-कविताएं मातृभाषा में बच्चों को उपलब्ध हों ताकि मातृभाषा रक्त में रसधार-सी बहे। अंग्रेजी ने यह काम बखूबी किया और 'नर्सरी राइम' था 'फेयरी टेल्स' मनहर किताबों का चस्का बचपन से अपने उपनिवेश के सब कर्णधारों को लगाया। साथ ही चमकीली और रोचक पुस्तकें भी अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध कराईं तो वर्ग-विशेष के लिए यह 'धाय मां'  'मां'  हो गई।

आप अंग्रेजी साहित्य पढ़ाती रही हैं और हिंदी भाषा में लेखन का काम करती हैं। आमतौर पर यह नजरिया थोपा जाता है कि मेधा के फलक का विस्तार अधिकतर अंग्रेजी के सहारे होता है, इससे आप कितनी सहमत हैं?

अंग्रेजी प्रचारतंत्र की भाषा है, चुस्त प्रबंधन-नियोजन की भाषा। मगर मेधा के फलक का विस्तार प्रचारतंत्र की भाषा से नहीं होता। मेधा के फलक का विस्तार तो निरंतर साधना द्वारा अर्जित चित्त-विस्तार से ही होता है। किताबें बाजार का हिस्सा हैं, इसलिए अंग्रेजी की किताबें दूर तक पहुंचती हैं। प्री-व्यू, रीव्यू, विज्ञापन, बुक प्रमोशन टुअर आदि टीम-टाम की व्यवस्था अंग्रेजी प्रकाशक अधिक कुशलता से कर पाते हैं क्योंकि अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन के जोर पर शुरू से ही राज-काज और कुशल प्रबंधन की भाषा तो रही ही है। हवाईअड्डे से लेकर मेट्रो स्टेशन, बड़े पुस्तक केंद्रों, एमेजॉन आदि विक्रय केंद्रों, पुस्तकालयों में भी अंग्रेजी की सामान्य किताबें भी सहज उपलब्ध हो जाती हैं। बड़े पुस्तक मेलों में भी इनके होर्डिंग बड़े होते हैं। हिंदी के कुछ प्रकाशकों ने समानान्तर विक्रय व्यवस्था खड़ी की है किंतु अन्य प्रकाशकों को भी साथ लेकर चलना चाहिए। सब मिलकर, बाजार की तनातनी भूलकर गांवों-कस्बों और छोटे शहरों में, स्त्री, दलित और आदिवासी समूहों में (जहां हिंदी की पत्रिकाओं, अखबार और पुस्तकों के लिए जन मन अधिक लालायित रहता है) समानांतर विक्रय केंद्र चलाएं। स्टेशन पर, बस स्टॉप, विद्यालय और विश्वविद्यालय के सामने मोबाइल वैन रखकर यह काम आसानी से हो सकता है। हमें स्पर्द्धा से चलने वाला नहीं बल्कि सहकारिता से चलने वाला समाज बनाना है।

किताबें अलादीन का चिराग हैं, जिस घर में आती हैं वहां एक शीतल प्रकाश हमेशा जगा रहता है। मातृभाषा की किताबें ही उन लोगों के जीवन में नई रोशनी भर सकती हैं, जिन्हें रोशनी की आवश्यकता सबसे ज्यादा है। उसी परिवेश से हमारे नए चिंतक-लेखक, समाज सेवक आएंगे। वंचित समाज और स्त्रियां उभरेंगी क्योंकि उनमें एक आदर्श समाज गढऩे का जज्बा अभी बाकी है और उनके मन में सामुदायिक जीवन का स्पंदन अभी बाकी है। वे पूरी तरह से आत्मलीन और स्वार्थी नहीं हुए। मातृभाषा की किताबों का थोड़ा प्रकाश मिल जाए तो वे बड़े परिवर्तन ला पाएंगे।

पिछले कुछ दशकों से सरकारी सहायता से कृत्रिम हिंदी का विकास हुआ है जिसे सरकारें अपना रही हैं ऐसे में हिंदी के साहित्यकार इस कृत्रिम, सरकारी हिंदी का विरोध एकजुट होकर क्यों नहीं कर पा रहे हैं?

सरकारी महकमे में नौकरी पाने वाले लोग स्वयं भी घर में मातृभाषा की किताबें नहीं रखते। उनमें ज्यादातर अभी 'भूरे साहब' ही बने हुए हैं। उनके कर्मचारियों का भी वही हाल है। शब्दकोश देख-देखकर कार्यालय के सूचना पट्ट पर लिखे जाते हैं। पर्यायवाचियों में जो शब्द सबसे कठिन लगा, उसी में सूचनाएं लिखी जाती हैं। हिंदी के और अन्य मातृभाषाओं के साहित्यकारों, अध्यापकों से जहां हिंदी प्रभारी लगातार संपर्क में रहते हैं, उन कार्यालयों/बैंकों की स्थिति बहुत बेहतर है। ऐसे हिंदी अधिकारियों को तो 'सितारा-ए-हिंद' का खिताब मिलना चाहिए, जिन्होंने इस कुर्सी पर रहते हुए साहित्यकारों को हर योजना में शामिल ही नहीं किया बल्कि स्वयं भी श्रेष्ठ साहित्य रचा और श्रेष्ठ अनुवाद किए। डॉ ओम निश्चल और डॉ राजेंद्र पांडा इनमें अग्रणी हैं।

हिंदी भाषा को समृद्ध बनाने के लिए भारतीय भाषाओं के बीच आपसी संवाद कैसे बढ़ाया जा सकता है और इसमें साहित्यकारों की क्या भूमिका है?

हिंदी भाषा खुली बांहों वाली भाषा है और इसकी समृद्धि में कहीं कोई कमी नहीं। जितने अनुवाद विदेशी और भारतीय भाषाओं से हिंदी में हुए हैं, उतने किसी और भाषा में नहीं हुए। हिंदी ने सबको ही प्यार से गले लगाया है मगर तेलुगू, मराठी, मलयालम, पंजाबी और उडिय़ा जैसी महामना भाषाओं के सिवा किसी और भाषा ने हिंदी को नहीं अंकवारा, बांग्ला और भारतीय अंग्रेजी के सिवा दूसरी भगिनी भाषाओं को भी नहीं। 

महादेवी वर्मा ने जिन दिनों 'चांद' के अंक निकाले थे, उन्होंने एक अनूठा काम किया था। उन्होंने हिंदुस्तानी हिंदी, मराठी हिंदी, मलयाली हिंदी, पंजाबी हिंदी, बांग्ला हिंदी में कई मनहर आलेख छापे। हर जगह प्रबुद्ध लेखिकाओं से हिंदी में लेख लिखवाए या उनके लेखों के ऐसे अनुवाद संभव किए जिनमें उनकी अपनी मातृभाषा की छांह बनी रहे। इस एक कदम से हिंदी पट्टी के कई विवाद एकदम से सुलझ गए। हिंदी का भगिनी भाषा उर्दू और अपनी ही पितामही-मातामही भाषाओं यानी बोलियों से जो रगड़ा सुलझ गया था, उसका प्रत्यक्ष समाधान भगिनी भाषाओं की यह होली है जिसमें सब पर सबका रंग हो, वह भी प्रीत का गाढ़ा, चटक रंग, ऐसा कि 'धोबिनिया धोए आधी रात' तब भी न छूटे। सीधी सी बात यह कि भाषा कोई भी हो, वह जोड़ने को प्रतिश्रुत होती है, तोड़ने को नहीं।

गिलक्रिस्ट, बीम्स के काम को देखें या जॉर्ज ग्रियर्सन के भारतीय भाषा सर्वेक्षण के काम को देखें तो अंदाजा मिलता है कि भाषा की समृद्धि के लिए यूरोप के कई विद्वानों ने काम किए लेकिन आगे ऐसी परंपरा क्यों नहीं कायम हो सकी...

धरती कभी वीरों से खाली नहीं होती है। रुपर्ट स्नेल, लूसी रोजेन्स्टीन, आर्लोन जाइदी मारिया आदि विदेशी विद्वानों के नाम इसमें शामिल हैं, प्रिंसटन, सोआस आदि में दक्षिण एशियाई भाषाओं की ऐसी पूरी टीम आज भी बहुत अच्छे काम कर रही है।

भाषा के विकास की प्रक्रिया सामाजिक विकास के साथ ही तारतम्य बनाकर आगे बढ़ती है और सामाजिक विकास की प्रक्रिया पर संस्कृति और बाजार के मौजूदा कारक प्रभाव डालते हैं, ऐसे में वैश्विक बाजार और उदारीकरण के इस दौर में हिंदी की सार्वभौमिक स्वीकार्यता पर संदेह और गहरा नहीं हो रहा?

हिंदी की चिंता न करें। हिंदी सिर्फ  बाजार, सिनेमा और मनोरंजन की भाषा ही नहीं है बल्कि समृद्ध साहित्य वाली लचीली भाषा है जो एक हंसमुख, दोस्त भाषा, सड़क और गलियों की भाषा, पंचायत, अलाव, चौक के चाय-ढाबों और विश्वविद्यालयों के प्रखर विचार-विमर्श की भाषा भी है। भाषा हो या व्यक्ति, श्रेष्ठ वही है जो सबको प्यार करता है, सबको लेकर चलता है और ऊंचा-नीचा नहीं मानता।

देश में न्याय, शिक्षा और प्रशासन की भाषा जब अंग्रेजी हो तब हिंदी भाषी लोगों को सम्मानजनक रोजगार कैसे मिल जाएगा?

नेतरहाट विद्यालय, केंद्रीय विद्यालय, सर्वोदय विद्यालय आदि में पढ़े हुए बच्चे हिंदी माध्यम से पढ़कर आते हैं और जहां रहते हैं, अलग से दमकते हैं क्योंकि हिंदी-अंग्रेजी दोनों में उनकी गति अच्छी होती है। हर भाषा जीवन-जगत पर एक नई खिड़की की तरह खुलती है। जो जितनी भाषाओं का साहित्य जानता है, वह उतना ही मननशील होता है। हिंदी भारत के लिए सेतु-भाषा है, ठीक वैसे ही अंग्रेजी विश्व के लिए। आसन्न परिवेश से, आमजन से गहनतम संवाद साधने के लिए स्थानीय भाषा के साथ कम से कम एक सूत्रधार भाषा या सेतु भाषा तो ठीक से जाननी ही चाहिए और भाषा जानने का सबसे कारगर माध्यम साहित्य है क्योंकि भाषा के सबसे सरस, सबसे बंकिम और सर्वाधिक स्मरणीय प्रयोगों का खजाना है साहित्य। कोई भाषा ठीक तरह से जाननी हो तो तीन आसान तरीके हैं, उस भाषा के सफल प्रयोक्ताओं से प्रेम करिये और अंतरंग बातचीत, उसका साहित्य पढि़ए और सब-टाइटल के साथ उस भाषा की अच्छी फिल्में देखिए। एक बात और, जो अच्छा लगे, उसका अनुवाद करके अपने बच्चों को सुनाइए। संभव हो तो उन चुने हुए अंशों का मंचन भी कराइए। इतनी प्रतिश्रुति तो हर नागरिक से भाषा मांगती है। यह भी एक तरह का मातृऋण है जो हमें चुकाना ही चाहिए। आपके साक्षात्कार के माध्यम से मैं हिंदी प्रकाशकों समेत हर हिंदी सेवा संस्था से अनुरोध करती हूं कि हर बड़े साहित्यकार से वह बाल-साहित्य लिखवाकर उसकी वीडियो शृंखला जारी करे।

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