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रोजगार नीति के लिए अहम प्राथमिकताएं

नितिन देसाई /  September 13, 2021

अधिकतर भारतीयों को वृद्धि से केवल तभी फायदा हो सकता है जब उन्हें काम के बढिय़ा हालात और वाजिब वेतन वाली नौकरी मिले। सापेक्षिक रूप से उच्च वृद्धि के कई दशक भी भारतीयों के बड़े हिस्से को अच्छी गुणवत्ता वाले रोजगार दे पाने में नाकाम रहे हैं। इस नाकामी के दुष्प्रभाव आय की बढ़ती असमानता, सामाजिक असंतोष और बेरोजगार युवाओं के हिंसा की घटनाओं में लिप्त होने, देश के दूसरे हिस्सों से आने वाले प्रवासियों और स्थानीय लोगों के बीच तनाव को राजनीतिक रंग देने की कोशिश और कम गुणवत्ता वाले रोजगार में फंसे लाखों लोगों के रहन-सहन के हालात में गिरावट के रूप में सामने आए हैं। 

भारत को रोजगार के बारे में एक ऐसे नजरिये की शिद्दत से जरूरत है जो...

- वृद्धि एवं रोजगार सृजन के बीच के संपर्कों को मजबूत करे, खासकर शिक्षित युवाओं के लिए अवसर बढ़ाने के मामले में।
- काम के हालात में खासा सुधार लाए और कामकाजी पिरामिड के निचले स्तर पर मौजूद लाखों लोगों को अधिक पारिश्रमिक मिल सके।

- कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी में बढ़ोतरी करे।

शिक्षित युवाओं के लिए नौकरियों पर बल देना इसलिए जरूरी है कि 2.2 करोड़ बेरोजगार युवाओं में से करीब 1.8 करोड़ 15-29 साल की उम्र समूह वाले हैं। इस श्रेणी में अभी वो तमाम युवा नहीं शामिल हैं जो मजबूरी में कम कुशलता वाले कामों में लिप्त हैं। युवा कामगारों के लिए कौशल पर जोर देना इसलिए भी जरूरी है कि शहरी इलाकों में इस उम्र समूह के करीब 70 फीसदी और ग्रामीण क्षेत्रों के करीब 50 फीसदी युवा माध्यमिक या उससे ऊपर तक शिक्षित हैं। साफ तौर पर शिक्षित युवा ऐसे रोजगार को तरजीह देते हैं जो अकुशल या अद्र्ध-कुशल कार्य अवसरों से ऊपर होते हैं।

हां, यह मुमकिन है कि भारत में सार्वजनिक शिक्षा की निम्न गुणवत्ता उन्हें आधुनिक विनिर्माण और सेवा संबंधी नौकरियों के लायक बनाने में असफल रही हो जिसकी शिकायत अक्सर नियोक्ता करते रहते हैं। इसका दीर्घकालिक उत्तर शिक्षा की गुणवत्ता में खासा सुधार लाने, पूर्व-प्राथमिक से ही यह सिलसिला शुरू हो और बच्चों का पोषण स्तर भी सुधरे। लेकिन फिलहाल तो हमें कौशल स्तर सुधारने वाले ऐसे कदमों की जरूरत है जिनका ज्यादा तात्कालिक असर हो। 

सरकार ने कौशल विकास के लिए कई कार्यक्रम चलाने की घोषणा की है। नई शिक्षा नीति में भी स्कूलों में कौशल विकास कार्यक्रम अनिवार्य रूप से संचालित करने का प्रस्ताव रखा गया है। सरकार को स्कूल एवं कॉलेज की पढ़ाई छोडऩे वालों को इन कौशल विकास कार्यक्रमों में शिरकत करने के लिए प्रोत्साहित करने वाली रियायतें देने के बारे में सोचना चाहिए।

इसका एक तरीका यह है कि माध्यमिक शिक्षा और कॉलेज छोडऩे वाले सभी छात्रों को इस शर्त पर बेरोजगारी भत्ता दिया जाए कि वे किसी संगठित कौशल विकास पाठ्यक्रम में शामिल होंगे। दूसरी जरूरत कौशल विकास कार्यक्रमों एवं उन्हें संचालित करने वाले संस्थानों को संभावित नियोक्ताओं के साथ जोडऩे की है जिसके लिए फंडिंग एवं प्रबंधन में उन्हें सहयोगी बनाया जा सकता है। 

विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्रों में नई नौकरियों के लिए उपलब्ध कामगारों की गुणवत्ता सुधारने की ये मुहिम जवाब का महज एक हिस्सा हैं। रोजगार एवं आर्थिक वृद्धि के बीच का नाता मांग में आई तेजी से जुड़े कमोडिटी संयोजन पर काफी निर्भर करता है। निम्न आय समूह वाले लोगों की मांग वाले रोजमर्रा के उपभोक्ता सामान या उच्च आय देशों में उपभोक्ताओं की पसंद निर्यात उत्पादों से अधिक श्रम-बहुलता वाली गतिविधियों में निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

लिहाजा आय पिरामिड के निचले तल पर मौजूद लोगों को आमदनी मुहैया कराने वाले और निर्यात वृद्धि को प्रोत्साहन देने वाले उपाय श्रम कानूनों की प्रयोजनीयता की सीमारेखा में  बदलाव की कोशिशों से कहीं ज्यादा अहम हैं। किसी भी हाल में श्रम कानूनों का क्रियान्वयन बेहद खराब है और कारखानों को बंद होने से नहीं रोक पाए हैं।

मसलन, हम मुंबई के कपड़ा उद्योग में मजदूरों की हालत लगातार बिगड़ती हुई और मालिकों को अमीर बनते हुए देख चुके हैं। यह पहलू मुझे ठोस रोजगार रणनीति के दूसरे आयाम से रूबरू कराता है जो कि कामगारों के बड़े तबके के लिए काम के हालात सुधारने से जुड़ा हुआ है। कृषि क्षेत्र में नियोक्ताओं की संख्या इतनी बड़ी है कि मनरेगा जैसे कार्यक्रम ही रोजगार मुहैया कराने की सबसे अच्छी रणनीति हैं। मनरेगा योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूनतम मजदूरी पर पूरक रोजगार मुहैया कराया जाता है। 

लेकिन गैर-कृषि क्षेत्र की हालत थोड़ी अलग है। इस क्षेत्र में कार्यरत करीब 23 करोड़ लोगों में से करीब 10 करोड़ लोग स्व-रोजगार में लगे हैं जिनमें से बड़ी संख्या सूक्ष्म इकाइयों की है। वहीं 7 करोड़ लोगों के पास नियमित वेतन या पारिश्रमिक वाला रोजगार है और 6 करोड़ लोग अस्थायी मजदूर हैं। नियमित भुगतान वाले रोजगार में लगे 7 करोड़ लोगों में से भी करीब दो-तिहाई के पास कोई लिखित रोजगार अनुबंध नहींं है और आधे से अधिक लोगों को भविष्य निधि जैसा कोई सामाजिक सुरक्षा कवर भी नहीं मिलता है और न ही वे भुगतान-सहित छुट्टियां लेने के हकदार हैं।

गैर-कृषि कार्यों में लगे करीब 70 फीसदी लोग मुख्यत: अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं जो काफी हद तक श्रम कानूनों के दायरे के बाहर ही है। संगठित क्षेत्र की कंपनियां असंगठित क्षेत्र की मध्यवर्ती कंपनियों के जरिये कामगारों को आउटसोर्स कर श्रम कानूनों के चंगुल में आने से अक्सर बच जाती हैं। निर्माण क्षेत्र में तो यह प्रवृत्ति बहुत मुखर है जहां गैर-कृषि कार्यबल के पांचवें हिस्से को रोजगार मिला हुआ है। 

हमें असल में सभी नियुक्त लोगों तक श्रम अधिकारों का विस्तार करने की जरूरत है, चाहे वे नियमित आय वाले रोजगार में हों या फिर दिहाड़ी मजदूरी पर काम करने वाले अस्थायी कामगार हों। कम-से-कम हरेक नियुक्त शख्स को एक लिखित अनुबंध देना तो बाध्यकारी ही होना चाहिए और न्यूनतम वेतन कानून का भी सख्ती से पालन किया जाए। वहीं निर्माण श्रमिकों एवं प्रवासी कामगारों जैसे शोषण के शिकार लोगों के लिए कामकाजी हालात में सुधार के प्रयास अधिक सख्ती से किए जाने चाहिए। 

इस दिशा में उठने वाली बड़ी दलील सामाजिक न्याय के नजरिये से पेश की जाती है। अगर आप आय पिरामिड के निचले समूह की आय बढ़ा देते हैं और कुल आय में उनकी हिस्सेदारी को बढ़ा देते हैं तो वृद्धि एवं रोजगार सृजन के बीच बेहतर संपर्क के साथ तगड़ा आर्थिक लाभ भी होगा। दरअसल श्रम-सघनता वाले उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन कंपनियों के लिए निवेश का आकर्षक विकल्प बन सकता है।

तीसरी वरीयता कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की है। फिलहाल कार्यबल में महिलाओं की तादाद सिर्फ 23 फीसदी है जबकि पुरुषों का अनुपात 57 फीसदी का है। काम में लगीं करीब 12 करोड़ महिलाओं में से 4.2 करोड़ तो सिर्फ घरेलू कामकाज में सहायक की ही भूमिका में हैं। 

राज्यों के आंकड़ों पर गौर करें तो महिलाओं की श्रमबल भागीदारी दर में काफी फासला है। बिहार में यह अनुपात महज 6 फीसदी है तो हिमाचल प्रदेश में यह दर 52 फीसदी है। उत्तर एवं पूर्व भारत के अधिकांश राज्यों में महिलाओं की भागीदारी दर राष्ट्रीय औसत से कम दिखती है जबकि पर्वतीय एवं आदिवासी-प्रभुत्व वाले राज्यों और दक्षिण एवं पश्चिम भारत में यह राष्ट्रीय  औसत से बेहतर नजर आती है। विकास की स्थानीय रफ्तार में मौजूद अंतर के कारण यह फर्क हो सकता है। इसके अलावा सामाजिक प्रथाएं और काम के हालात भी अंतर पैदा करते हैं। 

अगर सभी बिंदुओं को समाहित करें तो रोजगार-बहुल वृद्धि के लिए श्रमिक कौशल में फौरन सुधार, अनौपचारिक क्षेत्र में काम के हालात बेहतर करने, श्रमिक हितों की सुरक्षा, गरीब परिवारों की आय बढ़ाने पर जोर और श्रम-बाहुल्य उत्पादों एवं सेवाओं पर केंद्रित निर्यात रणनीति अपनाने की जरूरत है।
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