बिजनेस स्टैंडर्ड - कम पानी में फलों की खेती से सुधर सकता है भविष्य
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कम पानी में फलों की खेती से सुधर सकता है भविष्य

सुनीता नारायण /  September 06, 2021

मैं अपने करीब के जिस नाशपाती के पेड़ को देख रही हूं, वह फलों के भार से जमीन की ओर झुक गया है। इस 50 वर्ष पुराने फलों के बाग में हर वृक्ष पर 50-100 किलोग्राम फल होते हैं। इसके बाद मेरी नजर अमरुद, आडू और आलूबुखारा, कीनू तथा अन्य फलों के वृक्षों पर जाती है। वहां खजूर का वृक्ष भी था। जी नहीं, मैं इजरायल नहीं गई थी। मैं पंजाब के फाजिल्का जिले के अबोहर की बात कर रही हूं जो पाकिस्तान की सीमा से लगा हुआ है। उसके बाद मैं राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में भी गई। यह नहर का क्षेत्र है जिसे इंदिरा गांधी नहर के नाम से भी जाना जाता है। 

यह देखना अद्भुत है कि कैसे पानी जमीन को बदल सकता है। इसके अलावा विभिन्न पहल और वैज्ञानिक जानकारी को सीखना तथा रेगिस्तान को हरियाली में बदलने में के बारे में जानना भी बहुत अहम रहा। इंदिरा गांधी नहर करीब 400 किलोमीटर लंबी है। यह सतलज और ब्यास नदी के पानी को बीकानेर और जैसलमेर तक लाती है। जैसे-जैसे इसका सफर लंबा होता जाता है, पानी की मांग बढ़ती जाती है। समृद्धि के साथ यह नहर विवाद और प्रतिस्पर्धा भी पैदा करती है क्योंकि पानी की भारी कमी है। परंतु पानी की कम खपत वाली अर्थव्यवस्था विकसित करने के बजाय, नहर के पहुंचने वाली जगह पर अब धान जैसी पानी की भारी खपत वाली फसल की खेती हो रही है। खेती में विविधता लाने, धान-गेहूं के चक्र से बाहर निकलने और कम पानी की खपत वाली फसलों का रुख करने की बातें हकीकत में नहीं बदल सकीं। सवाल यह है कि इस बेशकीमत पानी का अधिकतम उपयोग कैसे किया जाए? यहां फलों के वृक्षों की अहम भूमिका हो सकती है। कृषि वानिकी और बागवानी की मदद से उच्च मूल्य वाली उपज हासिल की जा सकती है और ड्रिप सिंचाई की मदद से पानी का इस्तेमाल भी कम किया जा सकता है। इससे आर्थिक वृद्धि और रोजगार हासिल करने में भी मदद मिल सकती है। फलों के वृक्ष न केवल पोषण से भरपूर रस उपलब्ध कराते हैं बल्कि उनका औषधीय और सौंदर्य प्रसाधन उद्योगों में भी इस्तेमाल होता है। इसके अलावा खजूर भी है जो खारे भूजल में पनपता है। इसे नहर के पानी की जरूरत भी नहीं। 

परंतु मुझे पता चला कि फलों की क्रांति अभी तैयार होने की प्रक्रिया में है। मैं सबसे पहले अबोहर में पंजाब विश्वविद्यालय के डॉ. जे सी बख्शी क्षेत्रीय शोध संस्थान पर रुकी जहां वैज्ञानिक फलों के वृक्षों की उत्पादकता बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। वे खारेपन में होने और कीटों से बचाव वाली किस्म तलाशने के लिए टिश्यू कल्चर का प्रयोग कर रहे हैं। यहीं मुझे रेतीले इलाके में फलों से लदे नाशपाती नजर आए। मुझे टिश्यू कल्चर से तैयार खजूर भी नजर आए।

यह इतना अधिक मुनाफा पैदा कर रहा है कि हर पौधा 4,500 रुपये का है और इसके बावजूद किसानों को इसे पाने के लिए दो वर्ष की प्रतीक्षा करनी पड़ रही है। राजस्थान में मांग इतनी ज्यादा है कि राज्य सरकार को हर किसान के लिए सीमा तय करनी पड़ रही है कि वह इससे ज्यादा पौधे नहीं खरीद सकता। 

इसके बाद मैं स्वर्गीय करतार सिंह नरूला के खेत पर गई जो श्रीगंगानगर के सूखे इलाके में सन 1960 के दशक में ही कीनू लाए थे। यह वह समय था जब नहर का पानी वहां पहुंचा ही था। कहा जाता है कि जवाहरलाल नेहरू इस विचार को लेकर इतने उत्सुक थे कि वह नरुला के लायलपुर फार्म की यात्रा करना चाहते थे लेकिन उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के निधन के कारण इसे टालना पड़ा। आज नरुला के परिवार द्वारा संचालित इस फार्म में खट्टे फलों की हरसंभव किस्म मौजूद है। यह सहरा में नखलिस्तान का सच्चा दृश्य है। लगभग इसी समय अपने समय के बड़े राजनेता बलराम जाखड़ ने भी अबोहर में कीनू की खेती शुरू की थी।

इन लोगों में यह सोच थी कि उच्च मूल्य वाली फसल की खेती करें। वे स्थायी उत्पादकता चाहते थे। उन्हें पता था कि कम पानी और उच्च उत्पादन के फायदे क्या हैं। आज जाखड़ के खेत उनके पोते अजय जाखड़ संभालते हैं जो एक किसान नेता हैं। यहां मुझे देखने को मिला कि कैसे तकनीक की मदद से व्यापक पैमाने पर अच्छी गुणवत्ता वाले खट्टे फलों का उत्पादन किया जा रहा है। जाखड़ नर्सरी में हर वर्ष नींबू, संतरा, कीनू आदि खट्टे फलों  के एक लाख से अधिक पौधे तैयार किए जाते हैं। इसके बावजूद मांग में कमी नहीं है।

बदलाव बहुत व्यापक है और बदलाव की संभावना भी उतनी ही ज्यादा है। हमें पता है कि दुनिया को प्राकृतिक उपायों की ओर जाना होगा। हमें प्राकृतिक संसाधनों के सतत इस्तेमाल से संपत्ति तैयार करनी होगी। इसमें पानी शामिल है। हमें कार्बन उत्सर्जन से निपटने के लिए वृक्षों की आवश्यकता है और आजीविका भी तैयार करनी है।

परंतु मैं कुछ अनुत्तरित सवालों के साथ वापस लौटी। फल क्रांति की भावना रास्ते में कहीं खोती दिखी। हमें फलों के वृक्ष दिखे लेकिन उपज में मूल्यवद्र्धन के प्रयास नहीं नजर आए। फलों के रस के उत्पादन के रूप में भी यह नहीं दिखता। हमें फलों पर आधारित अर्थव्यवस्था विकसित करने का कोई प्रयास नहीं दिखा। बल्कि हमें इस सूखे इलाके में धान की खेती की लोकप्रियता बढ़ती दिखी। स्थायित्व का भी सवाल है। फलों के वृक्षों में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का जमकर इस्तेमाल होता है। दुनिया के सभी फल उगाने वाले इलाकों में यह दिक्कत है। हम औरों से अलग क्या कर सकते हैं? 

इन सवालों से इतर अबोहर और श्रीगंगानगर के खेतों की यात्रा ने मुझे भविष्य के बदलावों को लेकर रोमांचित किया। हमारी नई अर्थव्यवस्था प्रकृति, पोषण और किसानों के माध्यम से ही आगे बढ़ सकती है।
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