बिजनेस स्टैंडर्ड - राजद्रोह का कानून और असहमति के स्वर
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राजद्रोह का कानून और असहमति के स्वर

देवांशु दत्ता /  August 30, 2021

राजद्रोह के मामलों के लिए वर्ष 1870 में भारतीय दंड संहिता के तहत धारा 124ए को शामिल किया गया था। इस कानून को औपनिवेशिक सरकार ने ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ असहमति के सुरों को रोकने के मकसद से बनाया था। ब्रिटेन की अपनी दंड संहिता में भी राजद्रोह को आपराधिक कृत्य माना गया था। 

यह एक कठोर कानून है जिसमें किसी भी व्यक्ति को मौखिक या लिखित शब्दों के माध्यम से या प्रत्यक्ष गतिविधियों से विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति वैमनस्य जगाने की कोशिश या नफरत फैलाने के लिए अधिकतम आजीवन कारावास तक की सजा देने का प्रावधान किया गया है। ब्रिटेन में इस कानून को बहुत पहले ही खत्म किया जा चुका है लेकिन भारत की मौजूदा सरकार अब भी इसे लागू करना जारी रखे हुए है।

अगर 1870 और उसके बाद के दौर की साक्षरता दर पर गौर करें तो किसी को भी अचरज हो सकता है कि ब्रिटिश हुकूमत लिखित शब्दों के निषेध को लेकर इतनी फिक्रमंद क्यों रहती थी? उस समय किसी को शिक्षित मानने का पैमाना भी काफी कम हुआ करता था, अगर कोई व्यक्ति किसी भी भाषा में अपना नाम लिख सकता था तो उसे शिक्षित मान लिया जाता था। उस मापदंड के भी हिसाब से भारत की साक्षरता दर 1881 में 4 फीसदी से थोड़ी ही ज्यादा थी और आजादी के बाद 1951 में भी यह स्तर सिर्फ 18 फीसदी पर ही पहुंच पाया था। वर्ष 2011 में हुई पिछली जनगणना के मुताबिक सात साल या उससे अधिक उम्र की करीब 74 फीसदी आबादी शिक्षित पाई गई। 

21वीं सदी में मोबाइल फोन की दस्तक देने के पहले तक हरेक बड़े डाकघर में 'लेखकों' की जरूरत हुआ करती थी। रोजगार की तलाश में शहरी इलाकों में आने वाले प्रवासी मजदूर गांवों में रहने वाले अपने परिजनों को पैसे भेजने के लिए 'मनी ऑर्डर' का सहारा लेते थे। मनी ऑर्डर के फॉर्म में एक हिस्सा कुछ संदेश लिखने के लिए हुआ करता था जहां पर छोटी लिखावट में कुछ जरूरी बातें लिखी जाती थीं। लेखक डाकघर के पास बैठते थे और अशिक्षित लोगों के संदेश को उस फॉर्म में दर्ज करते थे। इसी तरह गांवों में मौजूद डाकिया घरवालों को पैसे सुपुर्द करते समय उस मनी ऑर्डर फॉर्म पर लिखे संदेश को पढऩे का भी काम करते थे।

19वीं सदी के अंतिम दशकों से ही राष्टï्रवादी नेताओं पर नियमित रूप से राजद्रोह कानून का शिकंजा कसा जाता रहा। चाहे आप जिस राष्टï्रवादी नेता का नाम लें, इस बात की पूरी संभावना है कि उसने डोमिनियन स्टेटस, होमरूल से लेकर स्वराज जैसे आजादी के तमाम स्वरूपों के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद की थी। गोखले, तिलक, गांधी, राय, बोस, पटेल, नेहरू, जिन्ना, मालवीय, आंबेडकर, भगत सिंह एवं अन्य नेताओं ने अंग्रेजी के अलावा तमाम भाषाओं में अपने विचारों को खुलकर व्यक्त किया था। ये सारे नेता सुशिक्षित होने के साथ ही कम-से-कम दो भाषाओं के जानकार भी थे। वे पत्रिकाओं, राष्ट्रवादी माचारपत्रों में लेख लिखा करते थे और अक्सर उन पर पाबंदियां लगा दी जाती थीं। उन्होंने पुस्तिकाएं और किताबें लिखने के साथ ही बाहर निकलकर अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ भाषण दिए और विरोध प्रदर्शनों में भी खुलकर शिरकत की। 

सवाल उठता है कि ब्रिटिश हुकूमत भारत की उतनी कम साक्षरता होने पर भी लिखित शब्दों को लेकर इतनी फिक्रमंद क्यों हुआ करती थी? इसकी वजह यह सोच थी कि पढ़े-लिखे लोग समाज के बाकी हिस्से को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। सोशल मीडिया के आगमन के सैकड़ों साल पहले भी इस धारणा का वजूद हुआ करता था।

राष्टï्रवादी नेता इस लिहाज से समाज के लिए 'इन्फ्लूएंसर' की भूमिका में होते थे। वे अपने विचारों को कागज पर लिखते थे और उनके लिखे हुए शब्द लोगों की आपसी चर्चा के जरिये जनमत को प्रभावित करते थे। उनके लेखों एवं किताबों को पढ़ सकने वाले लोगों से कहीं ज्यादा संख्या उन लोगों की थी जो सुनकर उनके विचारों से अवगत होते थे। हालांकि लिखित शब्दों के अनुवाद या लोगों की आपसी चर्चा के जरिये प्रचारित-प्रसारित होने से उसके मूल संदेश में हेरफेर होने की गुंजाइश होती थी लेकिन संदर्भ के तौर पर लेख या किताबें मौजूद हुआ करती थीं।

जब 1922 में चौरी चौरा पुलिस थाने को बेकाबू भीड़ ने जला दिया था तो महात्मा गांधी ने अपने कदम से यह साबित किया कि वह कभी भी हिंसा की वकालत नहीं कर सकते हैं। उन्होंने असहयोग आंदोलन को लेकर जो कुछ भी कहा था, सब रिकॉर्ड में दर्ज था। जनवरी 1934 में आए एक भूकंप ने बिहार में हजारों लोगों की जान ले ली थी तो गांधी जी ने उसे छुआछूत भरे आचरण के लिए दी गई ईश्वर की सजा बताया था। एक प्राकृतिक आपदा का इस तरह अतार्किक चित्रण किए जाने से रवींद्रनाथ ठाकुर बहुत नाराज हुए थे। हालांकि ठाकुर भी छुआछूत के दंश से पूरी तरह इत्तफाक रखते थे। इस मुद्दे पर दोनों नेताओं के बीच हुई बहस भी लिखित बयानों के रूप में दर्ज है। 

अगर आज की बात करें तो यह सोशल मीडिया की मौजूदा स्थिति के लिए संदर्भ देता है। ट्विटर का इस्तेमाल भारत में करीब 1.7 करोड़ लोग ही करते हैं। इतनी कम संख्या वाले प्लेटफॉर्म पर असहमति के स्वर को दबाने के लिए सरकार इतनी मेहनत क्यों कर रही है? इसकी वजह समाज पर डाले जाने वाला असर है। ट्विटर पर पोस्ट किया गया 280 शब्दों वाले किसी संदेश या व्यंग्यात्मक कार्टून को कॉपी कर दूसरे मीडिया के जरिये बड़े फलक तक पहुंचाया जा सकता है। 

लोकतंत्र का दिखावा भी करने वाले किसी देश में राजद्रोह का कानून नहीं होना चाहिए। लेकिन भारत की सरकारें 1870 में मौजूद रहे कारणों के ही चलते इसे लगातार लागू करती रही हैं और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम जैसे नए कानून भी बनाए हैं।

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