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दिल्ली में काबुल की चिंता से परेशान अफगानी

ऋत्विक शर्मा और अभिलाष महाजन /  August 26, 2021

सुलेमान सिद्दीकी 15 अगस्त को अपने दादा-दादी के साथ काबुल से नई दिल्ली आने के लिए विमान में सवार हुए थे। जब तक वह दिल्ली पहुंचे तब तक तालिबान ने अफगानिस्तान की राजधानी की घेराबंदी कर ली थी जहां 21 साल के सुलेमान का जीवन कुछ घंटे पहले तक 'सामान्य' था। यह काबुल से दिल्ली के लिए उड़ान भरने वाली आखिरी वाणिज्यिक उड़ान थी। दिल के मरीज, सुलेमान के दादा का इलाज दिल्ली के एक निजी अस्पताल में चल रहा है और उन्होंने 25 दिन बाद ही वापसी का टिकट बुक कराया था। सुलेमान कहते हैं, 'जब से हम यहां आए हैं, वीजा और उड़ानें रद्द कर दी गई हैं। हवाई अड्डे बंद हैं। हमारे राष्ट्रपति देश छोड़ चुके हैं और तालिबान ने काबुल पर नियंत्रण कर लिया है। मैं यहां फंस गया हूं।' 

भारत में मौजूद अफगानियों में युद्धग्रस्त देश से यहां इलाज कराने आए लोगों के साथ-साथ यहां रह रहे प्रवासी और शरणार्थी भी शामिल हैं जिन्हें अपने दोस्तों और अपने परिवारों की चिंता सता रही है, खासतौर पर उन लोगों की जिनका ताल्लुक पिछली सरकारों से था और जिनका अमेरिका के साथ काम की वजह से संबंध रहा है। अभी भारत में मौजूद अफगानी केवल फोन कॉल और वीडियो चैट के जरिये अपने नजदीकी लोगों से संपर्क कर पा रहे हैं। 

सुलेमान को अपने सात सदस्यीय परिवार की सुरक्षा की चिंता है, खासतौर पर अपने पिता के लिए जो अमेरिकी दूतावास के लिए काम करते थे। उनका भारतीय वीजा उन्हें तीन महीने तक यहां रहने की अनुमति देता है लेकिन वह जल्द ही घर वापस लौटना चाहते हैं। वह जो कपड़े की दुकान चलाते हैं वह आजकल बंद है और उनकी स्नातक की परीक्षा एक महीने से भी कम वक्त में होने वाली है। वह कहते हैं, 'मेरे माता-पिता घर पर हैं। वे बाहर नहीं जाते क्योंकि अगर तालिबान ने मेरे पिता को देख लिया तो वे उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं।' 

दिल्ली में मौजूद अन्य अफगानी लोग भी इसी डर को जाहिर करते हैं और वे तालिबान के शासन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं जो 1996-2001 के दौरान पहले कट्टर शासन की तुलना में नरमी और उदारता वाले शासन का वादा कर रहे हैं। 

समीउल्लाह (जो सिर्फ  अपना पहला नाम बताते हैं) तीन साल से ज्यादा समय से दिल्ली में रह रहे हैं। काबुल में उनके भाई-बहन हैं जिनमें से एक भाई एक सप्ताह पहले तक सीमा शुल्क अधिकारी के रूप में काम करते थे। उनका कहना है, 'लोग अब अपनी नौकरी छोड़ चुके हैं और घर पर रह रहे हैं। तालिबान लोगों के घरों में आ रहे हैं और लोगों से सवाल करने के साथ ही उनके निजी वाहनों को भी छीन रहे हैं। शिक्षित लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है ऐसे में उनके लिए अफगानिस्तान छोडऩा ही सबसे बेहतर है।' उन्होंने अपने तीन भाई-बहनों के लिए वीजा का आवेदन करने का वादा किया है ताकि वे भारत या किसी अन्य देश में प्रवास कर सकें।

करीब 33 साल के समीउल्लाह खुद भी शरणार्थी शिविर ढूंढ रहे हैं और उन्हें अभी संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (यूएनएचआरसी) से अभी एक शरणार्थी कार्ड मिलना है। उनके परिवार का संबंध पूर्वी अफगानिस्तान के लोगार से है। यह एक ऐसा प्रांत है जो तालिबान के नियंत्रण में उस वक्त भी था जब उन्होंने अपने माता-पिता के साथ देश छोड़ दिया था। उनकी शिकायत है कि जो लोग कुछ हफ्ते पहले आए हैं उन्हें शरणार्थी का दर्जा मिल गया जबकि उनकी तरह शरण चाहने वाले कई लोग जो काफी पहले आए थे उन्हें यह दर्जा नहीं मिल पाया है।

समीउल्लाह दिल्ली के एक इलाके लाजपत नगर में एक ट्रैवल एजेंसी में काम करते हैं। यह इलाका दशकों से प्रवासी अफगानियों का पनाहगाह रहा है। दक्षिण पूर्वी दिल्ली के इस इलाके को 'छोटा काबुल' भी कहा जाता है जो तब अस्तित्व में आया जब 1980 के दशक में सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान अफगान प्रवासी यहां आए थे। यहां अफगानी व्यंजन परोसने वाले रेस्तरां, ब्रेड की दुकानों के साथ-साथ इलाज कराने के लिए आने वाले लोगों का दिखना आम नजारा है। 

मौजूदा उथल-पुथल के कारण भी नए सिरे से पलायन हुआ है। पाकिस्तान के पेशावर में रह चुके समीउल्लाह ने यह देखा है कि किशोर अफगानी लड़कों को तालिबान यहां प्रशिक्षण देता था। उनका कहना हैं, 'यहां के बहुत सारे फ्लैट और गेस्ट हाउस एक सप्ताह पहले तक खाली थे। पहले अगर किसी मेहमान से एक कमरे के लिए प्रतिदिन 500-600 रुपये बतौर किराया वसूला जाता था तो अब यह बढ़कर 1,200-1,500 रुपये हो गया है।'

कामकाजी महिलाएं और शिया अल्पसंख्यकों को तालिबान के सत्ता में न होने पर भी पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा। 27 साल की यालदा मदादी सात साल पहले भारत इसी वजह से आईं थीं क्योंकि उन्हें यह अहसास हो गया था कि अमेरिका के कब्जे में रहते हुए अफगानिस्तान रहने योग्य जगह नहीं होगी। काबुल में बीबीए के बाद वह जर्मनी की एक डेवलपमेंट एजेंसी में काम कर रही थीं। वह कहती हैं, 'वहां बम धमाके आम थे और मेरी मां को लगा कि हम किसी भी दिन मर सकते हैं, लेकिन लोग इसके बावजूद भी स्वतंत्र रूप से काम कर सकते थे।' अब वह लाजपत नगर में समीउल्लाह के साथ काम करती हैं। 

दो बहनों में से एक लाजपत नगर में मेवे बेचती हैं और वह एक ऐसे परिवार से आती है जो चार दशकों से बामियान में मौजूद अपने पैतृक स्थान से दूर ही हैं। बड़ी बहन का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुआ था जहां उनके पिता एक मदरसा में पढ़ाते थे। उनकी शादी ईरान में हो गई और वह 14 साल पहले भारत में लौटने से पहले थोड़े वक्त के लिए अफगानिस्तान में थीं।

बड़ी बहन कहती हैं, 'हम शिया हैं और तालिबान हमें काफिरों (गैर-मुस्लिम) के रूप में देखते हैं। बीस साल पहले उन्होंने बामियान में एक घर को जला दिया था जिसमें हमारे 20 रिश्तेदारों की मौत हो गई थी। छह महीने बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया।' उन्हें लगता है कि तालिबान ने महिलाओं को जो हाल में आश्वासन दिया है, वह झूठा है।

वह कहती हैं, 'हमने देखा है कि कैसे उन्होंने दो दशक पहले शासन किया था। उन्होंने कई लोगों को हमसे छीन लिया और उन्हें जिहादी बना दिया।' उन्होंने बताया कि अफगानिस्तान में कई लोग बचने के लिए आपातकालीन वीजा की मांग कर रहे हैं। इनमें उनके पति भी हैं जो उन्हें, उनके माता-पिता और अन्य रिश्तेदारों के लिए भी मेवों की आपूर्ति करते हैं। इस बीच, ये सभी अफगानिस्तान में मौजूद अपने करीबी लोगों की चिंता कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ  भारत में मौजूद अफगान छात्र अपने लिए सुरक्षित भविष्य के लिए मदद की गुहार लगा रहे हैं।

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