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जातीय राजनीति

संपादकीय /  August 25, 2021

राजनीतिक परिदृश्य में जातीय जनगणना की मांग जोरदार तरीके से उठ रही है। भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेता भी इसकी मांग कर रहे हैं और संकेत यही है कि इसे टाला जाना शायद संभव न हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सप्ताह के आरंभ में 10 राजनीतिक दलों के नेताओं से मुलाकात की, हालांकि इस मुद्दे पर सरकार का रुख अब तक ज्ञात नहीं है।

जातीय जनगणना के प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि पिछली जातीय जनगणना सन 1931 में हुई थी जब देश औपनिवेशिक शासन के अधीन था। स्वतंत्रता के बाद देश की नीतियों में समानता और सामाजिक न्याय का आधार यही है। इसने सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में चले आ रहे भेदभाव को समाप्त करने की जमीन तैयार की। इस नजरिये से देखा जाए तो मौजूदा दौर में भारतीय समाज की जातीय स्थिति यदि स्पष्ट हो तो निर्णय प्रक्रिया को बेहतर और कम विवादास्पद बनाया जा सकता है। कम से कम सामाजिक नीतियां तैयार करने में यह सहायक होगा।

जातीय जनगणना के मामले में पहली बाधा व्यावहारिक है। दशक में एक बार होने वाली जनगणना में पहले ही काफी देर हो चुकी है। उसका प्रारूप और सॉफ्टवेयर दोनों तैयार हैं इसलिए इसमें नया तत्त्व शामिल करने से देरी बढ़ेगी। देश इसके लिए तैयार नहीं है। दूसरी दिक्कत यह है कि जातीय समीकरण को लेकर सटीक जानकारी कमोबेश अन्य सरकारी आंकड़े जुटाने की कवायद से जुटाई जा सकती है। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ)।

यह भी स्वीकार करना होगा कि जनगणना के उलट एनएसएसओ के आंकड़े सर्वे आधारित हैं। जनगणना देश में मौजूद हर व्यक्ति की गिनती करती है। एनएसएसओ के जातीय आंकड़े मंडल आयोग की सन 1980 में आई रिपोर्ट से बहुत मिलते हैं। देश में मौजूदा आरक्षण नीति की बुनियाद वही रिपोर्ट है।

जातीय जनगणना से दूरी बनाकर रहने की सबसे बड़ी वजह भारत की जातीय राजनीति की कमियों में निहित है। चाहे जो भी नई जनगणना का आधार हो राजनीतिक लाभ की इच्छा नहीं होनी चाहिए क्योंकि इससे केवल जातिवाद को ही बढ़ावा मिलेगा। यहां दो मसले हैं: सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों की जटिलता और उनका एक दूसरे पर आरोपित होना।

यह दलील दी जाती रही है कि अन्य पिछड़ा वर्ग के आंकड़े जुटाना मुश्किल नहीं होना चाहिए क्योंकि जनगणना में पहले ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आंकड़े शामिल होते हैं। लेकिन वह केवल एक गणना है। अन्य पिछड़ा वर्ग का मामला इस तथ्य से जटिल हो जाता है कि यहां वर्ग का मामला भी सामने आता है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उलट जो  पिछड़े वर्ग 'क्रीमी लेयर' में आते हैं, वे आरक्षण नीति के दायरे से बाहर रहते हैं। क्रीमी लेयर में एक खास स्तर से अधिक आय अर्जित करने वाले पिछड़ा वर्ग के लोग आते हैं।

पिछड़ा वर्ग में जाति और वर्ग के अतिव्यापन ने अलग तरह का तनाव पैदा किया है जबकि इस बीच पात्रता वाली राजनीति तेजी से बढ़ रही है। आर्थिक सुधारों के बाद सरकार रोजगार बाजार में बहुत कम प्रभावी रह गई है और मराठा, पटेल और जाट भी सामाजिक-आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग कर रहे हैं। असली खेल आरक्षण नीति और अनगिनत उपजातियों पर उसके प्रभाव में छिपा है। ऐसी करीब 2,000 उपजातियां अन्य पिछड़ा वर्ग में हैं।

यह बात राजनेताओं को विशिष्ट उपजातियों के सहारे अपनी राजनीति संवारने का अवसर देती है। मोदी सरकार ने इन जातियों का वर्गीकरण करने तथा उनके बीच आरक्षण के समुचित बंटवारे के लिए एक आयोग बनाया है। इस आयोग के निष्कर्ष सामाजिक रूप से विस्फोटक हो सकते हैं (2017 से इसकी अवधि कई बार बढ़ाई गई है) ऐसे में फिलहाल जातीय जनगणना से बचा जाना चाहिए। 21वीं सदी की अहम शक्ति बनने की मंशा रखने वाला देश में जाति को समाज और राजनीति के लिए अतीत का विषय होना चाहिए।

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