बिजनेस स्टैंडर्ड - अचल संपत्ति दिवालिया निस्तारण की कमियां
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अचल संपत्ति दिवालिया निस्तारण की कमियां

देवाशिष बसु /  August 24, 2021

अचल संपत्ति दिवालिया कानूनों में व्यापक सुधार की आवश्यकता है तभी इसकी गड़बडिय़ों को दूर किया जा सकेगा। विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं देवाशिष बसु

 
सीऐंडसी टावर्स लिमिटेड(सीसीटीएल) ने अप्रैल 2009 में ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (जीएमएडीए) के साथ समझौता किया। समझौते के तहत एक अंतरराज्यीय बस टर्मिनल, तीन बहुमंजिला इमारतें (आवासीय और कार्यालय), एक मल्टीप्लेक्स, एक पांच सितारा होटल, एक बैंक्वेट हॉल, हाइपरमार्केट और एक टावर की छत पर हेलीपैड बनाया जाना था। सीसीटीएल ने तत्काल ही 110.78 करोड़ रुपये की राशि निर्माण के पहले अग्रिम राशि के रूप में दे दी और 63.30 करोड़ रुपये की राशि समूह की कंपनी सीऐंडसी कंस्ट्रक्शन लिमिटेड (सीसीसीएल, एक सूचीबद्ध कंपनी जो दिवालिया है) को अग्रिम के रूप में दी गई। हमेशा की तरह कई सरकारी बैंकों- भारतीय स्टेट बैंक, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, पंजाब नैशनल बैंक और पंजाब ऐंड सिंध बैंक- ने नवंबर 2010 में परियोजना को वित्तीय मदद की मंजूरी दी। सीऐंडसी टावर्स ने 400 खरीदारों से भी 490 करोड़ रुपये की राशि जुटाई। 
 
निर्माण कार्य में असामान्य देरी हुई और जीएमएडीए ने 11.90 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी का सहारा लिया। भारतीय स्टेट बैंक और पंजाब नैशनल बैंक ने एडलवाइस ऐसेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनी यानी ईएआरसी को पुनर्गठन समझौते के तहत शामिल किया। अक्टूबर 2019 में ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) की धारा 7 के तहत आवेदन किया गया। दिलचस्प है कि यह आवेदन दो अलग व्यक्तियों ने किया और 10 अक्टूबर, 2019 को एक कॉर्पाेरेट इन्सॉल्वेंसी रिजॉल्युशन प्रोसेस (सीआईआरपी) शुरू किया गया। 
 
धोखाधड़ी: एक बड़ी समस्या
 
सभी ऋणदाताओं का कुल 580.12 करोड़ रुपये का दावा स्वीकार किया गया जबकि कहा गया कि 399.89 करोड़ रुपये की परिसंपत्ति बहीखाते में दर्ज थी। बहरहाल, निस्तारण योजना के तहत कर्जदाताओं को वास्तविक आवंटन इस प्रकार किया गया: बैंकों को 13.3 प्रतिशत (जिसमें मात्र एक करोड़ रुपये का सीधा भुगतान शामिल था शेष राशि पांच वर्ष में किस्तों में चुकानी थी), सावधि जमा धारकों को 12.8 फीसदी, आवंटियों को 10.6 फीसदी, जीएमएडीए को 10 फीसदी, सांविधिक बकाये के लिए 8 फीसदी। यह पूरी राशि 72 करोड़ रुपये हुई यानी स्वीकृत दावों का 12.5 फीसदी। ऐसे में 399.89 करोड़ रुपये की बहीखाते में दर्ज पूंजी कहां है जिसका मूल्यांकन अब तक कम से कम दोगुना हो जाना चाहिए? बैंकर क्या कर रहे थे? जीएमएडीए के इंजीनियर क्या कर रहे थे? ऐसे सभी दिवालिया मामलों में (खासकर उनमें जहां अचल संपत्ति में सरकारी बैंक शामिल हैं) उत्तर एकदम स्पष्ट है, लेकिन वह ऐसा है जिसे हम देखना नहीं चाहते: सभी शामिल लोगों द्वारा खुलकर धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार। हम यह मानना चाहते हैं कि यह व्यापक लूट नहीं बल्कि कारोबारी नाकामी है।
 
यकीनन आईबीसी में ऐसे प्रावधान हैं जिनकी मदद से उन लेनदेन को पहचाना जा सकता है जिन्हें प्राथमिकता दी गई, जहां मूल्यांकन कम है, धोखाधड़ी हुई या अतिरंजित वसूली शामिल थी। ऐसे लेनदेन की वसूली कॉर्पोरेट कर्जदार से होनी चाहिए। क्या इस मामले में ऐसा किया गया? दरअसल संबंधित पक्षों ने इससे निपटने का रास्ता भी निकाल लिया। सीऐंडसी समूह की दो कंपनियों को  चुकाया गया केवल 1.85 करोड़ रुपये का प्राथमिकता वाला लेनदेन दर्ज किया गया। केवल 91 लाख रुपये का कम मूल्यांकन चिह्नित किया गया। कोई राशि अतिरंजित नहीं मिली और धोखाधड़ी वाला लेनदेन केवल 2.51 करोड़ रुपये का निकला। यह भी पता चला कि इस प्रक्रिया में 91,000 वर्ग फुट जगह के नाम पर 289,445 वर्ग फुट जमीन की धोखाधड़ी से अतिरिक्त बुकिंग भी गई। तीन बंदरों की तरह हमें भी शायद धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार जैसा कुछ दिखाई, सुनाई नहीं दे रहा है, न हम उसकी बात करते हैं।  खासकर वे मामले जिनमें सरकारी बैंक शामिल हैं। 
 
बैंकर: बैंकरों ने इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण यानी ईपीसी के बाद परियोजनाओं को फाइनैंस किया लेकिन उन्होंने अनुबंध में सुधार नहीं किया जिससे पैसा समूह की कंपनियों में गया। वे परियोजनाओं की निगरानी करने और समय पर उचित कदम उठाने में नाकाम रहे। इतना ही नहीं उन्होंने पुनर्गठन समझौते के तहत ऋण को ईएआरसी को स्थानांतरित किया। स्पष्ट है कि बैंक इस धोखाधड़ी के प्रमुख जिम्मेदारों में से हैं लेकिन वे बच निकले। इसके बावजूद व्यापक धारणा (रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी ऐसा ही कहा) बैंकरों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के खिलाफ है।
 
जहां तक बात ऐसे मामलों को चिह्नित करने की है जहां प्राथमिकता दी गई, मूल्यांकन कम हुआ, धोखाधड़ी हुई या अतिरंजित वसूली शामिल थी, वहां भी व्यवस्था नखदंतविहीन साबित हुई। वह ऐसे मामलों में भी नाकाम रही जहां ईपीसी को सीसीसीएल/व्यक्तियों के लाभ के लिए सौंपा गया। जरूरत पूरी परियोजना के फोरेंसिक ऑडिट की है। लेकिन इसे अनिवार्य नहीं किया जा सकता है। ऐसी जांच के लिए कुछ न कुछ वाणिज्यिक प्रोत्साहन आवश्यक है।
 
प्रवर्तक: उन्होंने ईपीसी अनुबंध इस तरह तैयार किए ताकि वैध तरीके से काफी धनरािश निकाली जा सके। हालांकि चेयरमैन और निदेशक को गिरफ्तार किया गया लेकिन सीऐंडसी मोहाली जंक्शन क्लाइंट्स एसोसिएशन के महासचिव हरभजन सिंह जॉली का आरोप है कि पुलिस ने कंपनी के अधिकारियों को धोखाधड़ी के मामले में पाकसाफ बता दिया। 
 
जीएमएडीए: स्वतंत्र इंजीनियर परियोजना की निगरानी करने में नाकाम रहे। मुझे पता नहीं कि उन्हें इसकी कुछ कीमत चुकानी पड़ी या नहीं।
 
इस गड़बड़ी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि सबसे प्रमुख पीडि़त यानी कि आवंटियों को शुरू से अंत तक कुछ कहने का हक नहीं है। उनके पास परियोजना की निगरानी के साधन नहीं हैं और वे सरकारी बैंकों और जीएमएडीए की मौजूदगी के कारण झांसे में आ गए। कानून प्रवर्तन एजेंसियों से भी उन्हें कोई मदद नहीं मिली और आखिर में उन्हें निकालकर आईबीसी प्रक्रिया में बाहरियों को शामिल कर लिया गया। बैंकर और निस्तारण पेशेवर राजेंद्र गणात्रा के मुताबिक संपत्ति खरीदने वाले परियोजना की लागत, संपूर्ण इक्विटी सर्विसिंग की फंडिंग करते हैं लेकिन फिर भी आईबीसी प्रक्रिया में उनकी भूमिका नहीं होती। बल्कि जब तक मकान खरीदने वालों के साथ धोखाधड़ी के आम्रपाली और जेपी इन्फ्राटेक जैसे कुख्यात मामले मीडिया की सुर्खियों में नहीं आते तब तक मकान खरीदने वालों के अधिकारों की अनदेखी होती है। सर्वोच्च न्यायालय उन्हें केवल असुरक्षित वित्तीय कर्जदाता का दर्जा देता है। यह अपर्याप्त है। वे उस संपत्ति के असली मालिक हैं और उन्होंने ही उसे वित्त पोषित किया है। उनका अधिकार सुरक्षित कर्जदारों के समान या उनसे अधिक होना चाहिए क्योंकि उनके पास परियोजना की निगरानी के संस्थागत संसाधन भी नहीं हैं। अचल संपत्ति दिवालिया कानूनों में पूर्ण बदलाव की आवश्यकता है ताकि इन गलतियों को सुधारा जा सके। सवाल यह है कि उनके लिए यह मांग कौन करेगा? 
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