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एक नया खाका

संपादकीय /  August 24, 2021

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन की घोषणा की जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र की वे आधारभूत परिसंपत्तियां सूचीबद्ध हैं जिन्हें निजी क्षेत्र को पट्टे पर दिया जाएगा। घोषणा के मुताबिक योजना में कई अहम प्रतिबंध शामिल हैं। पहली बात, परिसंपत्तियों का स्वामित्व सरकार के पास बना रहेगा और पहले से तय पट्टाअवधि के समाप्त होने के बाद उन्हें वापस सरकार को सौंपना होगा।

दूसरी बात, मुद्रीकरण पाइपलाइन में केवल उन्हीं परिसंपत्तियों को शामिल किया जाएगा जो पहले से संचालित हैं। दावा है कि अगले चार वर्ष में 6 लाख करोड़ रुपये मूल्य की बुनियादी परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण किया जाएगा। हालांकि यह प्रश्न बरकरार है कि यह राशि परिसंपत्तियों का वास्तविक मूल्य दर्शाती है अथवा नहीं। इसका पता तो तभी चलेगा जब एक बार इनमें से अधिकांश का बाजार मूल्य सामने आ जाएगा। बहरहाल, केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों के लिए प्रोत्साहन ढांचा बनाकर अच्छा किया है। इसके तहत राज्य सरकारों को परिसंपत्ति मुद्रीकरण प्रक्रिया से हासिल राशि का 33 फीसदी अतिरिक्त हिस्सा केंद्र सरकार के खजाने से दिया जाएगा।

सरकारी अधिकारियों का कहना रहा है कि यह मुद्रीकरण केवल राजस्व जुटाने से संबंधित नहीं है बल्कि इसका संबंध सरकारी बुनियादी ढांचे के प्रभावी प्रबंधन से भी है। यदि यह सही है तो इस बारे में विचार करने का यह एकदम सही तरीका है। यह भावना कि ये संपत्तियां बेची नहीं जा रही हैं बल्कि उन्हें पट्टïे पर दिया जा रहा है, सरकारों को प्रोत्साहित करेंगी कि वे उन्हें राजस्व समझें, न कि पूंजीगत आवक जिसे सरकारी क्षेत्र द्वारा अन्य पूंजी निर्माण में इस्तेमाल किया जा सकता है। बहरहाल, ऐसा करना गलती होगी खासकर यदि जुटाई गई राशि हर वर्ष समान किस्तों में आने के बजाय इक_ा प्राप्त हो। परिसंपत्ति मुद्रीकरण की मूल योजना यह थी कि इसके जरिये मौजूदा सरकारी परिसंपत्तियों के मूल्य को इस्तेमाल किया जा सके, सरकार को यह आजादी मिले कि वह ऐसे समय पर अपना पूंजीगत व्यय बढ़ा सके जब निजी बुनियादी निवेश कम है। यह लक्ष्य बना रहना चाहिए।

कम से कम एक सरकारी अधिकारी ने वित्त वर्ष 2021-2022 के लिए सरकारी परिसंपत्तियों के मुद्रीकरण से 88,000 करोड़ रुपये का फंड जुटाने का लक्ष्य रखा है। यह महत्त्वपूर्ण आंकड़ा है लेकिन इससे अलग तरह के प्रश्न पैदा होते हैं। उदाहरण के लिए अतीत में व्यक्तिगत परिसंपत्तियों के मूल्यांकन से जुड़े मसलों और जमीन की कीमत से उनके संबंध को देखते हुए यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसी कौन सी व्यवस्था होगी जो पारदर्शी भी हो, लाभकारी भी हो और निजी क्षेत्र के लिए आकर्षक भी हो। चूंकि सीधी बिक्री एजेंडे में नहीं है, इसलिए कुछ लोगों ने चिंता जताई है कि यह पिछले दरवाजे से निजी-सार्वजनिक भागीदारी की वापसी है जबकि पिछले दशक की घटनाओं के बाद ऐसी साझेदारियां विश्वसनीय नहीं रह गई हैं। इसके अलावा एक खेदजनक तथ्य यह भी है कि विनिवेश के मोर्चे पर सरकार का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है। इस मामले में वह लगातार लक्ष्य चूकती रही है। इस बार मामला अलग कैसे होगा? 

निश्चित रूप से इस योजना में संभावना है और पुरानी आशंकाओं का काफी हद तक समाधान किया गया है। इतना ही नहीं निजी क्षेत्र सरकारी क्षेत्र की आधारभूत परिसंपत्तियों में काफी रुचि रखता है। यह इस बात से स्पष्ट हो चुका है कि पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन से संबद्ध इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट को अच्छी सफलता मिली है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण भी अगले माह 5,100 करोड़ रुपये मूल्य का इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट शुरू करने वाला है। इस पेशकश को सही ढंग से तैयार और क्रियान्वित करना सबसे आवश्यक है।
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