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भूगोल पर इतिहास है भारी समुद्री शक्ति की हो तैयारी

शेखर गुप्ता /  August 22, 2021

अफगानिस्तान का घटनाक्रम हमारी रणनीतिक संस्कृति के एक अहम विरोधाभास को रेखांकित करता है। भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास को लेकर इतनी भारी बहस चल रही है कि भूगोल उपेक्षित है। जबकि भूराजनीति और भूरणनीति में पहले भू ही आता है।

अहम सवाल यह है कि क्या इतिहास, भूगोल को आकार देता है या इसका उलट सच है? यह उस पुरानी कहावत जैसा लगता है कि पहले मुर्गी आई या अंडा? सच तो यह है कि हमारे पश्चिम में रणनीतिक चुनौती वाले क्षेत्र में भूगोल ने ही इतिहास को आकार दिया है। हम यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ऐसा क्यों कह रहे हैं। इसके बाद बात करेंगें कि यह सब क्यों बदल सकता है और क्यों उपमहाद्वीप के भविष्य में भूगोल का महत्त्व कम हो सकता है।

इस दलील का आधार यह है कि भूगोल अफगानिस्तान का रणनीतिक शाप रहा है जबकि पाकिस्तान के लिए यह वरदान और भारत के लिए भटकाव रहा है। यह इस प्रकार है: 

-अफगानिस्तान हमेशा से अत्यधिक गरीब रहा है, वह अत्यंत रूढि़वादी, जनजातीय, बिखरी आबादी वाला और कमजोर प्रशासन वाला ऐसा देश रहा है अपने समय की महाशक्तियों के बीच स्थित है। यह वैश्विक शक्तियों की जंग का मैदान है। इसका नुकसान तो बहुत है लेकिन फायदा नहीं। 19वीं सदी में साम्राज्यवादी ब्रिटेन और जार शासित रूस, 20वीं सदी में अमेरिका और 21वीं सदी में अमेरिका तथा उसके नए वैश्विक शत्रु अल कायदा के बीच यह मुल्क त्रस्त रहा। शुरुआती दो अवसरों पर इसका गुनाह यह था कि यह सोवियत संघ के सबसे नरम इस्लामिक मध्य एशियाई क्षेत्र के पास था। इसके बाद यह अमेरिकी पिट्ठू मुजाहिदीन और सोवियत सेना के बीच लड़ाई का मैदान बना। इस जंग के बाद इस्लामिक उपद्रवी और आतंकी विजेता बने। उनमें से कुछ ने तालिबान बनाया और अपने बहुराष्ट्रीय 'बंधुओं' के साथ मिलकर दुनिया जीतने की ठानी। अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति ने उसे 'बलि का बकरा' बना दिया। 

-पाकिस्तान 1947 में अस्तित्व में आया और उसके औपनिवेशिक भारत की सीमाएं विरासत में मिलीं। भौगोलिक स्थिति ने उसे पहले शीतयुद्ध में अग्रणी देश बनाया क्योंकि अफगानिस्तान से उसकी लंबी सीमा लगती थी और धार्मिक और जनजातीय संबंध भी थे। अफगानिस्तान की सीमा तत्कालीन सोवियत संघ से मिलती थी और वह लड़ाई का मैदान था। 

सन 1950 के दशक से ही अमेरिका इसे औपचारिक सैन्य गठजोड़ से जोड़ चुका था। वह पेशावर से अपने यू-2 जासूसी विमान भी सोवियत संघ के ऊपर उड़ाता था। 1960 में सोवियत ने ऐसे एक विमान को गिराकर विमानचालक गैरी पावर्स को बंदी भी बनाया था। अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिम के लिए पाकिस्तान की एकमात्र उपयोगिता थी उसकी भौगोलिक स्थिति। 

1971 में यह दोगुना महत्त्वपूर्ण हो गया क्योंकि वह भौतिक और राजनीतिक रूप से चीन के करीब था। यह निक्सन-किसिंजर के लिए चीन से संपर्क का जरिया बन गया। 1979 में सोवियत संघ की अफगानिस्तान में घुसपैठ के बाद पाकिस्तान को रणनीतिक लाभ और बढ़ गए। अमेरिका ने फिर तोहफों की बरसात की। वह गंदा खेल फिर शुरू हुआ जिसमें आईएसआई के शिष्यों ने अपने गुरु को भी मात दे दी।

शीतयुद्ध में जीत हासिल हुई और तीन दशक पहले अफगानिस्तान में हार के बाद सोवियत संघ बिखर गया। पाकिस्तान का भौगोलिक वरदान समाप्त हो गया और करीब एक दशक तक यह अमेरिकी दृष्टि में उसकी अहमियत घट गई। यही वह दौर था जब अमेरिका भारत के साथ पींगें बढ़ा रहा था और इस क्षेत्र को लेकर अपनी नीति में वह भारत को शामिल करने लगा। परंतु अमेरिका में ट्विन टावर पर आतंकी हमले के साथ ही पाकिस्तान की किस्मत फिर जागी। आतंकियों का मुखिया और उनका अड्डा वहां पाया गया जिसे आज अफ-पाक कहा जाता है। अमेरिकी तोहफे फिर लौट आए। 

सन 1947 के बाद भौगोलिक स्थिति भारत को कहां रखती है और हम इसे अपने रणनीतिक विचार का सबसे बड़ा भटकाव क्यों कहते हैं? भारत की जमीनी सीमा करीब 15,000 किलोमीटर लंबी है। आजादी के समय से ही इसमें से आधी सीमा पाकिस्तान से लगने लगी जो पहले दिन से हमारा सैन्य शत्रु है। शेष जमीनी सीमा का आधा हिस्सा चीन से लगा हुआ है जो एक बड़ा सैन्य खतरा है। बदलाव केवल इतना आया है पूर्वी मोर्चे पर बांग्लादेश के रूप में एक मित्र राष्ट्र है। जमीनी सीमा पर कई छोटी बड़ी जंग हुईं और इसलिए हमारी सामरिक सोच जमीनी सीमा पर केंद्रित हो गईं। हम निरंतर पाकिस्तान, आतंकवाद और चीन के बारे में सोचते हुए प्रतिक्रियावादी और रक्षात्मक हो गए। हम इसे भटकाव इसलिए कहते हैं क्योंकि इसने हमारा ध्यान देश की 7,500 किमी लंबी तट रेखा से हटा दिया। हमारी सेना की रणनीति हमेशा जमीनी सीमाओं पर केंद्रित रहती है और हमारा ध्यान विविधतापूर्ण तट रेखा से दूर हट गया जबकि उस क्षेत्र में भी प्रचुर अवसर हैं। 

हमने यह कहना क्यों शुरू कर दिया कि अफगानिस्तान में हालिया बदलाव से उपरोक्त तीनों हालात बदल सकते हैं?

रूस अब एक शक्ति है और अफगानिस्तान में उसका दांव केवल यह सुनिश्चित करना है कि तालिबान मध्य एशिया के देशों में घुसपैठ न करें। रूस या चीन से लडऩे के लिए अब किसी को अफगानिस्तान जाने की जरूरत नहीं है। चीन की चिंताएं भी रूस जैसी हैं: शिनच्यांग और मुस्लिम उइगर समुदाय को तालिबान से बचाना। वह नहीं चाहता कि अफगानिस्तान में सत्ता का खेल और चले। 
इससे आतंक के खिलाफ जंग में अग्रणी सहयोगी की पाकिस्तान की भूमिका समाप्त होती है। जो बाइडन ने हालिया अक्षमता के कारण चाहे जितनी बदनामी मोल ली हो लेकिन वह न तो पाकिस्तान को धन्यवाद देने वाले हैं और न ही तालिबान को सौ एफ-16 विमान देने जा रहे हैं ताकि वह पाकिस्तान को परास्त करे।
दूसरी ओर यदि अफगानिस्तान संभलता है तो पाकिस्तान बस अपने भरोसे रहेगा। तब चीन भी अपने विकल्प तलाशेगा क्योंकि अफगानिस्तान उसके सीपीईसी निवेश के लिए अहम है। वह पाकिस्तान से अपेक्षा करेगा कि वह अपने आतंकी समूहों को लिए अफगानिस्तान का उपयोग कर उसे क्षति न पहुंचाए। पुलवामा की तरह वह यह न कहे कि उसे तो पता ही नहीं था और जैश ने इसकी योजना हेलमंड में बनाई। उसने एड्रियन लेवी और कैथी स्कॉट-क्लार्क की ताजा पुस्तक स्पाई स्टोरीज: इनसाइड द सीक्रेट वल्र्ड ऑफ द रॉ ऐंड द आईएसआई में यही कहा। अपनी गलतियों से सीखने के बारे में पाकिस्तान का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है। लेकिन उसे यह समझना चाहिए कि अंतिम बार (एक सप्ताह पहले) जब उसने एक बार ऐसा किया था तब तालिबान ने उसका इस्तेमाल अपने हित में किया। पाकिस्तान और तालिबान शासित अफगानिस्तान के बीच नया 'टेररिस्तान' उभरने को लेकर भारत में गहरी चिंता और दहशत है। फिलहाल पाकिस्तान ऐसा करने की दृष्टि से पाकिस्तान की आर्थिक, कूटनीतिक, भू-रणनीतिक और सैन्य क्षमता बहुत कमजोर है। यदि वह ऐसा करता है तो भारत के लिए ही अच्छा होगा क्योंकि वह एक बार फिर खुद को खत्म ही करेगा। शीत युद्ध के पहले चरण में भौगोलिक स्थिति कीमत उसे 1971 में आधा मुल्क गंवाकर चुकानी पड़ी। दूसरे दौर (1979-91) ने उसके लोकतंत्र, संस्थानों आदि को नष्टकर इस्लामीकरण किया।
सन 1990 में उसकी प्रतिव्यक्ति आय (पीपीपी आधारित) भारत से 60 फीसदी अधिक थी। अब भारत की जीडीपी उससे 32 फीसदी अधिक है। जबकि बीते दो वर्षों में भारत ने इस अंतर को कम करने के लिए कड़ी मेहनत की। प्रति व्यक्ति आय के मामले में इस समय बांग्लादेश आजादी के बाद बने तीनों मुल्कों में सबसे बेहतर स्थिति में है। बिना अमेरिकी कृपा के पाकिस्तान के पास अफगानिस्तान के साथ मिलकर भारत को धमकाने की क्षमता नहीं है। उसे अपने ही पश्चिमी हिस्से को बचाने के लिए जूझना होगा। इसलिए हम कह रहे हैं कि अफगानिस्तान के इतिहास के नए मोड़ ने इस क्षेत्र में भूगोल की अहमियत बदल दी है। जरूरत है कि भारतीय पाकिस्तान के प्रति अपना जुनून कम कर दें और फिलहाल के लिए अफगानिस्तान को भुला दें तथा जमीनी चुनौतियों के बजाय समुद्री शक्ति और अवसरों पर ध्यान दें। यह बीते 75 वर्ष में भारत के लिए सबसे बढिय़ा अवसर है कि वह अपनी रणनीतिक दृष्टि उत्तर से दक्षिण की ओर मोड़े।
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