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पूर्वी भारत की राजनीति का उभरता सितारा हैं सुष्मिता देव

आदिति फडणीस /  August 21, 2021

गठबंधन की राजनीति करना आसान नहीं है। आखिर आप अपने दल के हितों की रक्षा कैसे करेंगे जबकि आपका गठबंधन साझेदार अनिवार्य रूप से सबसे अधिक चोट आपके ही दल को पहुंचाएगा? भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस दोनों को अलग-अलग स्तर पर इस चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। वोटों का बंटवारा रोकने में गठबंधन मदद करता है लेकिन वह आपके दल की वृद्धि और विकास को भी बहुत बुरी तरह सीमित करता है।

असम कांग्रेस की नेता सुष्मिता देव ने हाल ही में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने का जो निर्णय लिया है वह इसी दुविधा को दिखाता है। महीनों पहले से यह साफ जाहिर था कि ऐसा होने वाला है। इस वर्ष के आरंभ में असम विधानसभा चुनाव में सुष्मिता और असम कांग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा के बीच बराक घाटी क्षेत्र में टिकट वितरण को लेकर मतभेद सामने आए थे। कांग्रेस ने ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के साथ गठबंधन किया था। सुष्मिता के मुताबिक बराक घाटी की 15 सीट में से एपीसीसी अध्यक्ष चाहते थे कि आठ सीट कांग्रेस को दी जाएं जबकि शेष पर एआईयूडीएफ के प्रत्याशी चुनाव लड़ें। मार्च में सुष्मिता ने कहा था, 'यदि बराक घाटी में छह-सात सीट दे दी जाएंगी तो जमीनी कार्यकर्ता मुश्किल समय में कांग्रेस में क्यों रहेगा? मैंने यह सवाल बराक घाटी के पार्टी कार्यकर्ताओं की ओर से उठाया।'

बाद में कांग्रेस क्षेत्र की 11 सीट पर लड़ी और चार पर उसे जीत हासिल हुई। सिलचर लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस को सात में से दो विधानसभा सीट पर जीत हासिल हुई। भाजपा को चार और एआईयूडीएफ को एक सीट मिली। बराक घाटी के शेष हिस्से में एआईयूडीएफ का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा। कुल मिलाकर इसका एक ही अर्थ था- कांग्रेस इस गठबंधन में सीमित हो गई थी। इसलिए सुष्मिता को न केवल कांग्रेस को जिताना था बल्कि अपने ही क्षेत्र मे एआईयूडीएफ की सफलता भी सुनिश्चित करनी थी।
जाहिर है इस आग को भड़कना ही था। सुष्मिता ने अपना पहला चुनाव 2011 में असम विधानसभा के लिए लड़ा था। उनका परिवार वर्षों तक जनसेवा में रहा है। उनके दादा स्वतंत्रता सेनानी और असम सरकार में मंत्री रह चुके हैं। उनकी मां असम विधानसभा में विधायक रही हैं और उनके पिता संतोष मोहन देव सात बार लोकसभा सांसद, कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस के बड़े नेता रहे हैं। उन्हें राजनीति पारिवारिक विरासत में मिली लेकिन इससे पहले उन्होंने विधि व्यवसाय को चुना और ब्रिटेन से कानून की पढ़ाई की। ऐसा इसलिए क्योंकि उनके पिता ने उनसे कहा कि राजनीति कोई पेशा नहीं है और उन्हें अपनी आजीविका के लिए कुछ करना चाहिए, उसके बाद ही वह राजनीति में आएं।
सन 2014 में उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा और भाजपा की लहर के बीच वह सिलचर लोकसभा सीट भाजपा के बड़े नेता कवींद्र पुरकायस्थ से छीनने में कामयाब रहीं। पुरकायस्थ ने 2009 के चुनाव में उनके पिता को हराया था। वह लोकसभा की तेजतर्रार नेता थीं। वह कभी जूझने, पार्टी बैठकों में हिस्सा लेने के लिए देश भर में घूमने और पार्टी के दायित्व को संभालने में पीछे नहीं रहीं। वह सन 2017 से पार्टी छोडऩे के दिन तक अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष भी थीं। 
एक अधिवक्ता के रूप में अपने प्रशिक्षण के कारण ही सुष्मिता विभिन्न मुद्दों पर दूसरों की तुलना में ज्यादा सार्थक टिप्पणियां कर पाती थीं। सन 2016 में गर्भवती महिलाओं को 26 सप्ताह का सवैतनिक अवकाश तथा अन्य सुविधाएं देकर उनके रोजगार को नियमित बनाए रखने के इरादे से लाए गए मातृत्व लाभ (संशोधन) विधेयक पर सुष्मिता ने बहुत ठोस तरीके से कहा कि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की आड़ में यह विधेयक उनका रोजगार छीनने वाला है क्योंकि नियोक्ता 26 सप्ताह के सवैतनिक अवकाश को भविष्य में पडऩे वाला बोझ मानकर उन्हें काम पर ही नहीं रखेंगे। वह चाहती थीं कि सरकार इन लाभों में योगदान दे और पूरा भार नियोक्ताओं पर न डाल दिया जाए। अधिनियम दो बच्चों तक सीमित रहने पर सुष्मिता ने सवाल किया, 'मैं अपने परिवार की चौथी संतान हूं। मुझसे बड़ी तीन बहिनें हैं। यानी अगर मेरी मां मेरे जन्म के समय काम कर रही होती तो मुझे लगता कि मेरी सरकार मुझसे भेदभाव कर रही है। यदि दो बच्चों के जन्म के समय मां को लाभ मिला है तो तीसरी या चौथी संतान के होने पर वह लाभ क्यों छीन लिया जाए?'
सुष्मिता और उनका परिवार बंगाली हिंदू है। उस लिहाज से देखा जाए तो वे बहुसंख्यकों के बीच अल्पसंख्यक हैं और असम के मूल निवासियों के रूप में वर्गीकृत नहीं हैं। सुष्मिता  का मानना है कि राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी देश में नागरिकों के दो वर्ग तैयार कर सकता है: बंगाली और असमी। वह खुद को दोनों मानती हैं। आश्चर्य नहीं कि उन्होंने कांग्रेस छोड़कर एआईयूडीएफ के हाथों का खिलौना बनने से इनकार किया और तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गईं। तृणमूल कांग्रेस देश के पूर्वी इलाकों  में एक अहम राजनीतिक शक्ति बनकर उभर रही है और कड़ी लड़ाई लडऩे को प्रतिबद्ध है।
कांग्रेस में सुष्मिता को गांधी परिवार का दुलार मिला। वह भी उनके प्रति हमेशा सच्ची रहीं और पार्टी द्वारा उन्हें दिए गए असीमित राजनीतिक अवसरों को लेकर भी अत्यंत गरिमापूर्ण ढंग से आभार प्रकट किया। लेकिन तृणमूल कांग्रेस में मामला अलग होगा। खासतौर पर ममता बनर्जी के बाद के समय में। बहरहाल, वह चाहे किसी भी दल में रहें, वह पूर्व का उभरता सितारा तो हैं ही।
Keyword: shushmita dev, north east, congress, bjp,
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