बिजनेस स्टैंडर्ड - निवेश की आवक और बीआईटी की उपयोगिता
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निवेश की आवक और बीआईटी की उपयोगिता

अजय शाह /  August 21, 2021

जब कभी हमारी सरकारी एजेंसियां मुकदमा हारती हैं और द्विपक्षीय निवेश संधियों (बीआईटी) के अंतर्गत भारी-भरकम जुर्माना लगाया जाता है तो देश में हममें से कई लोग खासे चिढ़ जाते हैं। परंतु भारत के नजरिये से देखा जाए तो ऐसे समझौते करना बेहतर है। भारत विकास के आरंभिक चरण में है, ऐसे में विदेशी निवेशकों के सामने जब्ती का जोखिम रहता है। ऐसे में बीआईटी ऐसी परिस्थितियों में उन्हें संरक्षण प्रदान करती हैं। हमें बीआईटी के चलते चुकाए जाने वाले जुर्माने को बीमा भुगतान समझना चाहिए जो बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश को भारत आने के लिए प्रेरित करता है। भारत सरकार के लिए उचित होगा कि वह बीआईटी के मामलों में हाथ लगी पराजय को अपने नीतिगत ढांचे में सुधार के लिए फीडबैक के रूप में ले।

इस पूरे प्रकरण में अहम शब्द है जब्ती। जब सरकार निजी संपत्ति को जब्त करती है तो स्वामित्वहरण या जब्ती होती है। भारत जैसे शुरुआती स्तर के लोकतांत्रिक देशों में सरकार के व्यवहार को नियंत्रित करने वाले कारक सीमित होते हैं। उदाहरण के लिए संपत्ति हमारे संविधान में शुरुआत से ही बुनियादी अधिकार नहीं है। विदेशी निवेशकों के नजरिये से देखें तो भारत में कारोबारी योजना बनाने में स्वामित्वहरण का जोखिम रहता है। वैकल्पिक रूप से कहें तो भारत के सरकारी संस्थान नीतियों में इस प्रकार बदलाव करते हैं जिससे निजी व्यक्तियों को भारी नुकसान होता है।

विकसित देशों में, निजी संपत्ति का संरक्षण और विधि का शासन ऐसी स्थितियां बनाते हैं जहां निजी व्यक्तिसुरक्षित रहते हैं। परंतु भारत के सामने एक उदार लोकतंत्र में परिपक्व बाजार अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित होने का लंबा सफर है। इस समस्या का कोई तीव्र हल नहीं है, हां परिपक्व सरकारी संस्थान निर्मित करने की प्रक्रिया लंबी अवश्य है।

विदेशी निवेशकों के समक्ष समस्याएं घरेलू निवेशकों की तुलना में कहीं अधिक बड़ी हैं। स्थानीय लोगों की बात राजनेता आसानी से सुनते हैं और उन्हें इस बात का बेहतर अंदाजा होता है कि भविष्य में नीतियां क्या रुख लेंगी। विदेशी निवेशकों को भारत के बारे में अधिक जानकारी नहीं होती। राजनीति में भी उनकी बात कम सुनी जाती है और उन्हें एक हद तक विदेशियों को लेकर स्थानीय लोगों के मन में व्याप्त भय का भी सामना करना होता है।

कंपनियों द्वारा कर पूर्व लाभ पर चुकाए जाने वाले आय कर पर विचार करें। विदेशी कंपनियों द्वारा चुकाया जाने वाला कर स्थानीय कंपनियों की तुलना में अधिक होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि स्थानीय कंपनियों में आत्मविश्वास अधिक होता है और वे कानून की व्याख्या में भी अधिक जोखिम उठाती हैं। विदेशी कंपनियों में अनिश्चितता अधिक होती है और वे कानून को रूढि़वादी ढंग से समझती हैं।

स्वामित्वहरण का जोखिम और नीतिगत जोखिम का आकलन करना कठिन है और यह अलग-अलग हालात में असर डालता है। ऐसे में स्वामित्वहरण को लेकर किसी संभावित निष्कर्ष तक पहुंचना आसान नहीं है। कह सकते हैं कि यह जोखिम बचाव लायक नहीं है। यह ऐसा जोखिम नहीं है जिसके बदले वैश्विक बीमा बाजार विदेशी निवेशकों को संरक्षण दे सके।

 

सार्वजनिक नीति के क्षेत्र में यदि हम इसे लेकर कोई पहल नहीं करते तो भारत में होने वाले निवेश के वांछित प्रतिफल की दर उस हद तक बढ़ जाती है जितना जोखिम होता है। ऐसे में कई निवेश नहीं हो पाते।

बीआईटी एक ऐसी प्रणाली है जिसके माध्यम से जोखिम को निरस्त किया जाता है। बीआईटी भारत सरकार की ओर से प्रभावी ढंग से एक बीमा नीति तैयार करती हैं जो सभी विदेशी निवेशकों के लिए होती हैं। यह बचाव स्वामित्वहरण और नीतिगत जोखिम के बरअक्स होता है। चाहे जो भी हो, लेकिन स्वामित्वहरण हुआ या नहीं इसे लेकर विवाद हो सकता है। इसकी सुनवाई निष्पक्ष मंच पर होनी चाहिए जहां दोनों पक्ष अपनी दलील रख सकें। उदाहरण के लिए लंदन में मध्यस्थता उच्च गुणवत्ता के निर्णयों के लिए बेहतर तरीका है।

बीआईटी की मौजूदगी भारत के सरकारी प्रतिष्ठानों के खराब व्यवहार के खिलाफ बचाव मुहैया कराती है। जब बीआईटी संबंधी वाद और क्षति सामने नहीं आती तो भी वे काम कर रहे होते हैं। एक विदेशी निवेशक के लिए मजबूत बीआईटी दिमागी शांति लाती है। उसके होने से एक खास तरह का जोखिम अपने आप समाप्त हो जाता है। इससे देश में निवेश को बढ़ावा मिलता है जो हमारे हित में है। भारत में 500 अरब डॉलर के वार्षिक निवेश में कुछ प्रकरण हमेशा ऐसे होते हैं जहां सरकारी संस्थान का व्यवहार खराब होता है और ऐसे मामलों में कुछ अरब डॉलर की राशि जरूर चुकानी होती है। भारत के नजरिये से यह बुरा नहीं है। हमें इस मामूली वार्षिक भुगतान को बीमा भुगतान समझना चाहिए जो हम हर वर्ष भारी पैमाने पर विदेशी निवेश के लिए चुकाते हैं। 

जब किसी सरकारी विभाग के किसी एक कर्मचारी को बीआईटी के जरिये चुनौती दी जाती है तो उसे लंदन में मध्यस्थता के मामले से निपटना पड़ता है। हारने पर उसे संभावित परिणाम भुगतने होते हैं और क्षतिपूर्ति के लिए उसे सार्वजनिक वित्तीय व्यवस्था में संसाधन जुटाने पड़ते हैं। यह कर्मचारी के लिए परेशानी खड़ी करने वाला है। हालांकि हमें गत वर्ष जिन कुछ मामलों में हार मिली उन्हें हमको इस तरह देखना चाहिए कि यह भारत में पूंजी की आवक की बाधा कम करने की कीमत है। देश के लोगोंके नजरिये और मामला लडऩे वाले अधिकारी के नजरिये में अंतर है।

यदि बीआईटी मजबूत हो तो नीतिगत सुधारों का सिलसिला शुरू हो सकता है जिससे स्वामित्वहरण का जोखिम कम होगा, विधि का शासन मजबूत होगा और नीतिगत जोखिम कम होगा। राजनीतिक नेतृत्व को हर पराजित मामले को एक खामी सामने आने के तौर पर देखना चाहिए जो नीतिगत सुधारों की प्रेरणा देता है। हर पराजित मामले के साथ नीतिगत ढांचे में सुधार होना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति न बने। वर्ष बीतने के दौरान नीतिगत ढांचे में सुधार के साथ हर वर्ष भुगतान का प्रवाह कम होगा जो इस बात का संकेत होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था उन्नत हो रही है। इस मौके पर बीआईटी का महत्त्व कम हो जाएगा। वे ऐसी अतिरंजित स्थिति के खिलाफ बीमा अनुबंध का काम करेंगी जो शायद कभी उत्पन्न ही न हों।

इस दलील से देखे तो देश चार प्रकार के होते हैं: एक उन्नत अर्थव्यवस्था जिन्हें बीआईटी की जरूरत नहीं, दूसरा उभरती अर्थव्यवस्था वाले देश जहां बीआईटी फलती-फूलती हैं, तीसरा विकासशील देश जो बीआईटी का इस्तेमाल राज्य की सत्ता को सीमित करने और विदेशी निवेशकों की रक्षा के लिए करते हैं लेकिन फीडबैक व्यवस्था की कमी रहती है, और चौथा विकासशील देश जहां बीआईटी नहीं हैं। 

(लेखक पुणे इंटरनैशनल सेंटर में शोधकर्ता हैं)
Keyword: bit, private asset, foreign investor,,
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