बिजनेस स्टैंडर्ड - चिप के खेल में उलझा कारोबार
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चिप के खेल में उलझा कारोबार

प्रसेनजित दत्ता /  August 20, 2021

वैश्विक सेमी-कंडक्टर उद्योग अमेरिका एवं चीन के बीच छिड़ी बेहद तीखी तकनीकी जंग का मैदान बना हुआ है। ताइवान के सेमी-कंडक्टर विनिर्माता इसके बीच में फंसे हुए हैं। असल में, कई प्रेक्षकों का मानना है कि संप्रभुता को लेकर ताइवान पर दिखाई जा रही फौरी आक्रामकता आंशिक तौर पर उन्नत चिप फैब्रिकेशन केंद्रों को अपने नियंत्रण में लेने की जरूरत से निर्धारित हो रही है। इस जंग की धमक यूरोप, जापान एवं दक्षिण कोरिया में भी महसूस की जा रही है। दुर्भाग्य से, भारत सरकार ने काफी हद तक इस पूरे मसले को नजरअंदाज किया हुआ है जबकि यह मुद्दा विनिर्माण एवं डिजिटल नवाचार का गढ़ बनने की मंशा रखने वाले हरेकदेश को प्रभावित करता है। 

चिप हरेक उत्पाद एवं उपकरण की जान बन चुके हैं। ऑटोमोबाइल से लेकर विमान और कारों से लेकर मोबाइल फोन तक चिप का प्रसार है। और आने वाले वर्षों में यह सिलसिला तेज ही होने की उम्मीद है। भारत में मीडिया की तवज्जो काफी हद तक चिप की किल्लत पर रही है जिसकी वजह से ऑटो एवं अन्य विनिर्माण क्षेत्रों में कामकाज प्रभावित हुआ है। लेकिन विनिर्माण उद्योगों में चिप की किल्लत असल में चिंता का असल कारण नहीं है। असली मकसद सबसे उन्नत एवं शक्तिशाली चिप तक अग्रिम पहुंच हासिल कर लेना और दूसरे पक्षों को इससे वंचित कर देना है। ऐसा होने पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्रिप्टोकरेंसी, एनएफटी खनन, 5जी एवं अन्य तकनीकी क्षेत्रों का विजेता तय हो जाएगा।

चिप उद्योग में मोटे तौर पर तीन तरह की कंपनियां हैं। पहली श्रेणी में वे कंपनियां हैं जो खुद ही चिप को डिजाइन एवं फैब्रिकेट करती हैं। दूसरी श्रेणी वाली कंपनियां केवल चिप को डिजाइन करने का काम करती हैं जबकि तीसरी श्रेणी उन कंपनियों की है जो सिर्फ चिप को फैब्रिकेट करती हैं। इंटेल जैसी कंपनियां पहली श्रेणी में आती हैं जबकि क्वालकॉम और एनविडिया काफी हद तक चिप डिजाइन ही करती हैं। ताइवान की फर्म टीएसएमसी उन चिप फैब्रिकेटर में शामिल है जो चिप खुद डिजाइन नहीं करती हैं लेकिन ऐपल से लेकर हुआवे तक हर किसी के लिए उनका विनिर्माण करती हैं। 

पहले अमेरिका का चिप डिजाइन एवं फैब्रिकेशन दोनों पर ही दबदबा हुआ करता था लेकिन समय बीतने के साथ बाहर की फैब्रिकेशन फर्मों पर उसकी निर्भरता तेजी से बढ़ती गई। अब वह अपनी सीमाओं के भीतर नवीनतम चिप उत्पादन केंद्र स्थापित करने के लिए अरबों डालर का प्रोत्साहन देने लगा है। यूरोप एवं जापान भी चिप फैब्रिकेशन के मामले में पीछे छूट गए हैं लेकिन अब वे बड़ी फर्मों को लुभाने के लिए आपाधापी में लगे हैं ताकि इस जंग से होने वाले नुकसान से खुद को बचा सकें। दक्षिण कोरिया की सैमसंग एवं एसके हाइनिक्स जैसी कंपनियों के पास शानदार चिप फैब्रिकेशन केंद्र हैं लेकिन उनके बड़े ग्राहक अमेरिका एवं चीन दोनों जगहों पर होने से वे ऊहापोह में घिर गई हैं। चीन की समस्या यह है कि वह चिप डिजाइन के मामले में अमेरिका और नवीनतम फैब्रिकेशन के मामले में ताइवान, दक्षिण कोरिया एवं अमेरिका तीनों से पीछे है। चिप डिजाइन एवं फैब्रिकेशन दोनों ही क्षेत्रों में चीन की पहुंच बाधित करने को लेकर अमेरिका के प्रतिबद्ध हो जाने से अब चीन आत्म-निर्भर बनने के लिए अरबों खर्च कर रहा है। लेकिन घरेलू स्तर पर चिप उत्पादन क्षमता विकसित करने में कई साल लग सकते हैं और ताइवान के खिलाफ उसके तेवर को इसी रूप में देखा जाना चाहिए।

वर्ष 2018 से ही अमेरिका ने नवीनतम चिप एवं चिप तकनीकों तक चीन की पहुंच रोकने के लिए व्यवस्थित प्रयास शुरू कर दिए। पहले उसने अमेरिकी कंपनियों या चिप विनिर्माण में अमेरिकी तकनीक का इस्तेमाल करने वाली किसी भी कंपनी को चीन की दिग्गज दूरसंचार उपकरण निर्माता कंपनी हुआवे के साथ किसी भी तरह की साझेदारी एवं कारोबार करने से रोका। उसके बाद से ये पाबंदियां बढ़ती ही गई हैं। इसके अलावा अमेरिका ने चीन की सेमी-कंडक्टर विनिर्माता कंपनी एसएमआईसी को तकनीक देने से मना कर दिया और चिप विनिर्माण संयंत्र लगाने के लिए जरूरी उपकरण देने से नीदरलैंड्स की कंपनी एएसएमएल को भी रोक दिया। दरअसल दुनिया में एएसएमएल ही इकलौती कंपनी है जो इस तरह की मशीन बनाती है। 

ताइवान एवं दक्षिण कोरिया की फैब्रिकेशन कंपनियों के लिए बड़ी चिंता यह है कि अमेरिकी प्रतिबंधों ने चीनी ग्राहकों को सेवा देने की उनकी क्षमता नाटकीय रूप से कम कर दी है। परेशान करने वाली बात यह है कि उनके ग्राहकों में चीनी कंपनियों की संख्या अच्छी-खासी है। 

इस बीच अमेरिका घरेलू स्तर पर चिप विनिर्माण क्षमता तेज करने के लिए भारी प्रोत्साहन दे रहा है। इंटेल एरिजोना में एक फैब्रिकेशन संयंत्र बना रहा है जो सबसे उन्नत चिप बनाने में सक्षम होगा। टीएसएमसी भी वहां पर एक नवीनतम उत्पादन संयंत्र लगा रहा है। एरिजोना चिप विनिर्माण का एक बड़ा केंद्र बनकर उभर रहा है। 

टीएसएमसी जापान में भी एक फैब्रिकेशन संयंत्र लगाने के बारे में विचार कर रहा है ताकि ताइवान के खिलाफ चीनी आक्रामकता बढऩे की स्थिति में भी उसके कारखाने से चिप बनकर बाहर आते रहें। अस्सी के दशक में चिप डिजाइन एवं फैब्रिकेशन में अगुआ रहा जापान अब फिर से इस पर ध्यान केंद्रित कर रहा है और खासी रकम भी लगा रहा है।

इस वैश्विक खेल का नतीजा अगले कुछ वर्षों में चिप की बढ़ी हुई किल्लत के रूप में सामने आ सकता है। इससे चिप की कीमतें भी बढ़ सकती हैं क्योंकि अमेरिका, यूरोप या जापान में चिप विनिर्माण ताइवान या चीन में तैयार चिप से कहीं ज्यादा महंगा है। 

भारत तमाम कोशिशों के बावजूद अपने यहां  अत्याधुनिक फैब्रिकेशन संयंत्र लगाने के लिए किसी भी कंपनी को बुला पाने में अभी तक नाकाम रहा है। मुख्य समस्या यह रही है कि फैब्रिकेशन संयंत्र के लिए अरबों के निवेश, बिजली की स्थिर आपूर्ति एवं पानी की जरूरत होती है। अंतरराष्टï्रीय स्तर की फैब्रिकेशन कंपनियों ने अपने संयंत्र के लिए एक विकल्प के तौर पर भारत का आकलन करने के बाद उसे कई बार नकारा है। इसका एक विकल्प तो यह है कि अमेरिका एवं दक्षिण कोरिया में मौजूदा फैब्रिकेशन कंपनियों में ही निवेश किया जाए। दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि ताइवान के बाहर की फैब्रिकेशन कंपनियों के साथ दीर्घावधि अनुबंध किए जाएं। इससे खेल थोड़ा जटिल हो जाता है। लेकिन भारत अगर भविष्य में विनिर्माण एवं तकनीकी नवाचार का एक बड़ा वैश्विक केंद्र बनने की आकांक्षा रखता है तो उसके लिए ऐसा करना जरूरी भी है। 

(लेखक बिज़नेस टुडे और बिज़नेसवल्र्ड के पूर्व संपादक एवं संपादकीय सलाहकार फर्म प्रोसेकव्यू के संस्थापक-संपादक हैं)
Keyword: semiconductor, chip, us, china, india,
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