बिजनेस स्टैंडर्ड - कृषि बीमा की खामियां
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कृषि बीमा की खामियां

संपादकीय /  August 18, 2021

सरकार की प्रमुख फसल बीमा योजना- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) की शुरुआत पांच वर्ष पहले इसलिए की गई थी ताकि किसानों को फसल उत्पादन से जुड़े जोखिमों से बचाया जा सके। इस योजना में गत वर्ष व्यापक बदलाव किए जाने के बावजूद इसकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। योजना ज्यादातर अंशधारकों का विश्वास जीतने में नाकाम रही है। इनमें किसान, बीमा कंपनियां और राज्य सरकारें सभी शामिल हैं। तथ्य यह है कि अनेक राज्य इससे बाहर निकल चुके हैं और कुछ अन्य राज्यों के बारे में सूचना है कि वे भी ऐसा विचार कर रहे हैं।

कृषि प्रधान राज्य पंजाब इस योजना में शामिल ही नहीं हुआ जबकि बिहार और पश्चिम बंगाल ने प्राकृतिक आपदाओं तथा अन्य वजहों से किसानों को होने वाले नुकसान की भरपाई का अपना तरीका निकाल लिया। कुछ बीमा कंपनियों ने भी कृषि बीमा करना बंद कर दिया है क्योंकि यह उन्हें मुनाफे का सौदा नहीं लगा। भले ही उन्हें घाटा नहीं हुआ लेकिन भारी सब्सिडी के बावजूद उन्हें इससे कोई फायदा भी नहीं हुआ।

निस्संदेह पीएमएफबीवाई की कई कमियों को गत वर्ष दूर किया गया। इसमें कुछ बेहतर बातें शामिल की गईं। मिसाल के तौर पर बैंक ऋण लेने वाले किसानों के लिए पहले जहां यह अनिवार्य थी, वहीं अब इसे स्वैच्छिक कर दिया गया है। पहले किसानों को जो भी थोड़ी बहुत बीमा राशि मिलती थी, बैंक अपने बकाया को उसमें समायोजित कर देते थे। इस तरह किसानों के बजाय बैंकों के जोखिम का बचाव होता था। इसके साथ ही केंद्र सरकार ने प्रीमियम सब्सिडी में अपनी हिस्सेदारी को गैर सिंचित क्षेत्र में 30 फीसदी और सिंचित क्षेत्र में 25 फीसदी पर सीमित कर दिया था और यह बात राज्यों को नागवार गुजरी। हालांकि मौजूदा स्वरूप में राज्य और केंद्र सरकारें प्रीमियम सब्सिडी को 50:50 के आधार पर साझा करते हैं लेकिन अधिकांश राज्यों को लगता है कि उनका हिस्सा बहुत अधिक है। वे अक्सर समय पर अपना हिस्सा चुकाने में देर करते हैं। परिणामस्वरूप बीमा एजेंसियों द्वारा किसानों के दावे निपटाने में भी देरी होती है।

फसल बीमा में किसानों की रुचि न होने की प्राथमिक वजह यह है कि उन्हें क्षतिपूर्ति बहुत देर से और बहुत कम मिलती है। हालांकि पीएमएफबीवाई में संशोधन के बाद यह व्यवस्था की गई है कि प्रीमियम सब्सिडी में अपने हिस्से का भुगतान देर से करने वाले राज्यों पर जुर्माना लगाया जाए लेकिन इस प्रावधान का इस्तेमाल बमुश्किल ही होता है। 

देरी में योगदान करने वाला एक और कारण है फसल के नुकसान के आंकड़े जुटाने में लगने वाला समय। हालांकि संशोधित पीएमएफबीवाई में व्यवस्था है कि बीमा कंपनियां संग्रहित प्रीमियम का कम से कम 0.5 फीसदी हिस्सा डेटा संग्रहण के लिए आधुनिक सूचना और संचार उपायों का प्रचार प्रसार करने तथा किसानों के बीच बीमा के लाभ को लेकर जागरूकता बढ़ाने में व्यय करेंगी। परंतु अधिकांश कंपनियां इन मानकों का पालन नहीं करतीं।

कागज पर देखें तो पीएमएफबीवाई का संशोधित स्वरूप, कृषि बीमा के अब तक सामने आए मॉडलों में सबसे बेहतर नजर आता है। सन 1972 में कृषि बीमा की शुरुआत के बाद से तमाम तरीके अपनाए गए लेकिन कामयाबी नहीं मिली। इसमें बुआई के पहले से लेकर फसल के खेत में रहने तक के तमाम संभावित जोखिम शामिल हैं। इसमें रबी फसल के लिए कुल बीमा राशि का 1.5 फीसदी, खरीद के लिए 2 फीसदी और नकदी फसल के लिए 5 फीसदी तक का सांकेतिक प्रीमियम ही रखा गया है। जरूरत यह है कि सबसे पहले तो बची हुई खामियों को दूर किया जाए जो अंशधारकों को इसे अपनाने से रोक रही हैं और इसके बाद इसे बढ़ावा देने के लिए एक गहन अभियान चलाया जाए। यह किसानों की आय की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में भी एक कदम होगा।

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