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संसदीय कार्य मंत्री के रूप में अपने हुनर को निखारने की दरकार

आदिति फडणीस /  August 18, 2021

हाल में संसद के मॉनसून सत्र को कई अवरोध के बाद निर्धारित तिथि से पहले ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया लेकिन संसदीय मामलों के मंत्री होने के नाते कोई भी प्रह्लाद जोशी को दोष नहीं दे रहा है। इसकी वजह यह तथ्य भी है संसदीय कार्य मंत्री के काम की धमक पहले जैसी नहीं रही बल्कि अब थोड़ी फीकी पड़ गई है। संसदीय मामलों के मंत्री का पद आकर्षित करने वाला नहीं है क्योंकि मंत्री को अपने उन राजनीतिक प्रतिस्पद्र्धियों से भी बेहतर व्यवहार कायम करना पड़ता है जिनसे उनका इत्तफाक नहीं होता और सदन में उपस्थिति के लिए अपनी ही पार्टी के सहयोगियों से गुजारिश करनी पड़ती है और उन्हें मनाना पड़ता है। इसके अलावा उनसे यह अपेक्षा रहती है कि उन्हें सदन संचालित करने के सभी नियम याद रहने चाहिए ।

इस पद पर आसीन होने वालों से यह भी उम्मीद की जाती है कि वे स्थिर स्वभाव वाले हों और क्योंकि अगर उनमें रोष होगा तो वे किसी भी बहस में शामिल होकर समस्या खड़ी कर सकते हैं और समाधान का हिस्सा नहीं बन सकते हैं। संसदीय कार्य मंत्री के रूप में सुषमा स्वराज को खूब तारीफ मिली जिनके बारे में प्रतिद्वंद्वी दल माकपा के पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वह देश के अब तक के सर्वश्रेष्ठ संसदीय मामलों के मंत्रियों में से एक हैं। वह हमेशा नरम दिखती थीं और सभी के लिए मददगार भी थीं खासतौर पर उस वक्त जब विपक्ष का बरताव काफी बुरा होता था।

प्रह्लाद जोशी संसद के मॉनसून सत्र के दौरान कामकाज बाधित करने के लिए विपक्ष पर निशाना साधने से खुद को रोक नहीं पाए। हालांकि सत्र के दौरान कई विधेयक पारित हुए लेकिन इन पर चर्चा न्यूनतम हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुद ही विधेयक पारित होने के दौरान राज्यसभा में मौजूद भाजपा सांसदों का ब्योरा मांगना पड़ा। इसका भविष्य में राज्यसभा में भाजपा सांसदों के आचरण पर अच्छा प्रभाव पडऩा चाहिए लेकिन इससे जोशी के अपने ही समूह के लोगों को एक साथ लाने के अधिकार को तवज्जो मिलती  नहीं दिखती है। जोशी के राजनीतिक अतीत पर नजर डालें तो उनके काम में अहंकार की रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं दिखती है। वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश अध्यक्ष (जुलाई 2012 से जनवरी 2016 तक) बने लेकिन इस प्रभावशाली पद पर बने रहने के बावजूद उन्हें बी एल संतोष से निर्देश लेने में कोई दिक्कत नहीं हुई जो फिलहाल भाजपा में राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं और कर्नाटक में सत्ता के शक्तिशाली ध्रुव के समान हैं।

भाजपा की कर्नाटक इकाई में तीन प्रमुख जाने-माने ब्राह्मण नेता थे जिनमें अनंत कुमार, अनंत कुमार हेगड़े और जोशी का नाम शामिल है। इन तीनों नेताओं में से अनंत कुमार का सत्ता में उभार सबसे तेजी से हुआ। वह अटल बिहारी वाजपेयी और मोदी दोनों सरकारों में केंद्रीय मंत्री बने। यहां तक कि अनंत हेगड़े भी केंद्र में मंत्री बन गए। वहीं दूसरी तरफ जोशी को कर्नाटक की राजनीति से बाहर निकलने और केंद्र तक पहुंचने में काफी समय लगा। भाजपा सूत्रों का कहना है कि शुरुआत में वह काफी हद तक अनंत कुमार पर निर्भर हो गए थे लेकिन राजनीति में उनके उभार के रास्ते में बाधाएं भी अनंत कुमार ही लेकर आए जो नहीं चाहते थे कि कोई  जातिगत प्रतिद्वंद्वी उभरे।

राजनीति में उनकी शुरुआत साल 1994 में हुई जब भाजपा नेता उमा भारती के नेतृत्व में कुछ लोगों ने हुबली के ईदगाह मैदान में निषेधाज्ञा (मैदान के स्वामित्व का मामला विचाराधीन था) के आदेश का उल्लंघन करते हुए 15 अगस्त को तिरंगा फहराने की कोशिश की। इस घटनाक्रम की वजह से हिंसा हुई और उसके बाद पुलिस की गोलीबारी में 10 लोगों की मौत हो गई। इसका नेतृत्व करने वालों में प्रह्लाद जोशी भी शामिल थे। ईदगाह मैदान आंदोलन की वजह से भाजपा को राज्य में राजनीतिक जमीन हासिल करने में मदद की और पार्टी 1996 से ही धारवाड़ निर्वाचन क्षेत्र में जीतती रही है जिसका प्रतिनिधित्व जोशी करते हैं।

उन्होंने लोकसभा चुनाव में साल 2004 में दांव लगाया था और कांग्रेस के बी एस पाटिल को हराकर जीत हासिल की थी। उन्होंने उस निर्वाचन क्षेत्र से लगातार तीन चुनाव जीते हैं और 2009 का चुनाव कर्नाटक की सभी 28 सीटों के मुकाबले दूसरे सबसे ज्यादा अंतर से जीत ली। इस क्षेत्र से उनके प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस से विनय कुलकर्णी थे जो यकीनन बेहतर और लोकप्रिय नेता माने जाते थे लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में जोशी ने उन्हें 200,000 से अधिक वोटों के अंतर से हराया था।

जोशी का नाम बी एस येदियुरप्पा के संभावित उत्तराधिकारी के रूप में भी आया जब भाजपा के इस कद्दावर नेता को मुख्यमंत्री का पद छोडऩा पड़ा। हालांकि उन्होंने इन खबरों पर ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं दी। इससे पहले उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था, 'येदियुरप्पा की उम्र ज्यादा है लेकिन वह काफी कुशलता से काम कर रहे हैं। उनकी उम्र को देखते हुए नेतृत्व परिवर्तन के बारे में कोई चर्चा नहीं हुई है। जहां तक मुख्यमंत्री का सवाल है तो कोई पद खाली नहीं है और नेतृत्व परिवर्तन का कोई सवाल नहीं है।' 

अगर वह मुख्यमंत्री बन गए होते तो 1988 के बाद से वह कर्नाटक के पहले ब्राह्मण मुख्यमंत्री होते। वह कोयला एवं खान मंत्री भी रहे हैं और अब उन्हें संसदीय कार्यमंत्री की जिम्मेदारी दी गई है जो राजनीतिक रूप से सबसे महत्त्वपूर्ण है। लेकिन अपनी सफलता के लिए उन्हें अपने हुनर को थोड़ा और निखारना पड़ सकता है। वह 59 साल के हैं तो उनके पास अभी अच्छा-खासा वक्त है।

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