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देश में श्रमिकों का पलायन निराशा का संकेत

महेश व्यास /  August 12, 2021

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) का कंज्यूमर पिरामिड्स हाउसहोल्ड सर्वे (सीपीएचएस) लंबे समय से श्रमिकों के कारखानों से खेतों की ओर लौटने की बात कह रहा है। यह रुझान सरकार के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) में भी नजर आता है। ताजा पीएलएफएस रिपोर्ट दर्शाती है कि कृषि क्षेत्र के रोजगार में तेज इजाफा हुआ है और सन 2018-19 में जहां 42.5 फीसदी लोग इस क्षेत्र में रोजगारशुदा थे, वहीं 2019-20 में उनकी तादाद बढ़कर 45.6 फीसदी हो गई है। श्रमिकों का कृषि क्षेत्र की ओर पलायन सीपीएचएस के अनुमान से अधिक है। श्रमिकों का अन्य गतिविधियां छोड़कर कृषि कार्यों में लगना स्वैच्छिक नहीं हो सकता। यह श्रम बाजार में व्याप्त भारी संकट का संकेत है क्योंकि गैर कृषि क्षेत्र रोजगार नहीं दे पा रहे हैं और इसलिए श्रमिक खेती के काम में लगने पर मजबूर हैं। मजबूरी में किया जा रहा यह पलायन पीएलएफएस द्वारा मुहैया कराए गए मेहनताने के आंकड़ों में साफ नजर आता है। वेतन वाले रोजगार औसतन महीने का 16,780 रुपये वेतन मुहैया कराते हैं जबकि स्वरोजगार से महीने के 10,454 रुपये की आय हो रही है। यानी रोजाना क्रमश: 558 रुपये और 349 रुपये वेतन। इनकी तुलना में कृषि जैसे रोजगार से होने वाली आय औसतन करीब 291 रुपये रोजाना है जो अत्यधिक कम है। ऐसे में अगर कोई भी दूसरा विकल्प होता तो श्रमिक स्वेच्छा से कृषि जैसे इतने कम मेहनताने वाले काम नहीं करते।

इस प्रकार संकट के समय में देश का कृषि क्षेत्र अत्यंत कमजोर सुरक्षा ढांचा मुहैया कर पा रहा था। वर्ष 2019-20 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर घटकर 4 फीसदी रह गइ्र्र। यह वैश्विक वित्तीय संकट के बाद के एक दशक में सबसे धीमी वृद्धि दर थी। पीएलएफएस के ये अनुमान जुलाई 2019 से जून 2020 के बीच 12 महीने की अवधि के लिए हैं। यानी इसमें अप्रैल-जून 2020 की वह अवधि शामिल है जब देश में कोविड-19 की पहली लहर आई थी। महामारी के पहले ही वृद्धि में तेज गिरावट आ चुकी थी और उसके बाद महामारी के कारण लगाए गए लॉकडाउन ने गैर कृषि कामों में लगे श्रमिकों को और अधिक परेशानी में डाल दिया। इस स्थिति में उनके पास कृषि क्षेत्र में काम करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचा। कहा जा सकता है कि कृषि क्षेत्र की ओर से मुहैया कराए गए इस सुरक्षा ढांचे ने व्यापक पैमाने पर उस राजनीतिक दबाव को कम करने का काम किया है जो कृषि क्षेत्र में इतने अधिक रोजगार नहीं होने पर उपजता क्योंकि देशव्यापी लॉकडाउन ने बहुत बड़े पैमाने पर लोगों को बेरोजगार किया।

2019-20 में रोजगार में सबसे बड़ी वृद्धि कृषि क्षेत्र में ही देखने को मिली और इस क्षेत्र के भीतर भी काम करने वालों में सबसे अधिक तादाद महिलाओं की ही बढ़ी। कुल रोजगारशुदा महिलाओं में से 60 फीसदी कृषि क्षेत्र में काम कर रही थीं। इससे पता चलता है कि देश में महिलाओं को ज्यादातर खराब गुणवत्ता वाले काम मिलते हैं। पीएलएफएस का अनुमान है कि श्रम करने लायक आबादी का 45.6 फीसदी कृषि क्षेत्र में रोजगारशुदा है जो सीपीएचएस के 2019-20 के 38 फीसदी के अनुमान से कहीं अधिक है। यह आंशिक तौर पर इसलिए है क्योंकि पीएलएफएस की रोजगार की परिभाषा बहुत शिथिल है। उद्योगों के मुताबिक श्रम शक्ति के वितरण के पीएलएफएस के अनुमान में उस व्यक्ति को भी रोजगारशुदा माना जाता है जिसने साल में बमुश्किल एक महीने काम किया हो। सीपीएचएस की रोजगार की परिभाषा अत्यधिक कड़ी है। सीपीएचएस ने भी कृषि क्षेत्र के रोजगार में वृद्धि दर्ज की है और वह 2017-18 के 35.3 फीसदी से बढ़कर 2018-19 में 36.1 फीसदी और 2019-20 में 38 फीसदी हो गया। पीएलएफएस ने कृषि श्रमिकों में 3.1 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की, वहीं सीपीएचएस ने मात्र 1.9 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की। 

रोजगार में कृषि की हिस्सेदारी बढऩे से उन क्षेत्रों को लेकर सवाल उठते हैं जहां रोजगार कम हो रहे हैं। पीएलएफएस के मुताबिक विनिर्माण, निर्माण और परिवहन के साथ-साथ भंडारण तथा संचार क्षेत्रों में रोजगार कम हुए। कुल रोजगार में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 12.1 फीसदी से घटकर 11.2 फीसदी रह गई। पीएलएफएस ने जिन अन्य क्षेत्रों के लिए आंकड़े प्रस्तुत किए उनमें विनिर्माण क्षेत्र ने 0.9 फीसदी की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की। अगला बड़ा नुकसान निर्माण क्षेत्र को हुआ है जो 0.5 फीसदी है। परिवहन, भंडारण और संचार क्षेत्र में 0.3 फीसदी गिरावट दर्ज की गई। ये तीनों क्षेत्र कृषि क्षेत्र के रोजगार में इजाफे के करीब आधे इजाफे की वजह बने। जबकि अन्य बढ़ोतरी इसके अतिरिक्त क्षेत्रों में हुई। अनुमान है कि अपेक्षाकृत असंगठित विनिर्माण क्षेत्र और असंगठित विनिर्माण क्षेत्र के रोजगार का बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र में चला गया। विनिर्माण उद्योग का करीब 60 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र में है। इस क्षेत्र के श्रमिक भी कृषि क्षेत्र में गए हैं।

हमारे पास इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि विनिर्माण क्षेत्र और निर्माण क्षेत्र ने अपना काम दोबारा शुरू करने के लिए प्रवासी श्रमिकों की वापसी की प्रतीक्षा की। परंतु 2020-21 (जुलाई-जून) का प्रदर्शन अलग तरह से सामने आया। इस अवधि में कोविड-19 की दूसरी लहर सामने आई। दूसरी लहर में भारत ने अलग ढंग से प्रतिक्रिया दी। सीएमआईई का सीपीएचएस हमें बताता है कि 2020-21 में औद्योगिक श्रमिकों के कृषि क्षेत्र की ओर पलायन का सिलसिला जारी रहा। कुल रोजगार में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 2019-20 के 38 फीसदी से बढ़कर 39.4 फीसदी हो गई। विनिर्माण की हिस्सेदारी 9.4 फीसदी से गिरकर 7.3 फीसदी रह गई। परंतु निर्माण में सुधार हुआ और कुल रोजगार में इसकी हिस्सेदारी जो 2018-19 में घटकर 15.4 फीसदी और 2019-20 में 13.5 फीसदी रह गई थी वह 2020-21 में बढ़कर 15.9 फीसदी हो गई। 

सरकार ने उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन और छोटे तथा मझोले उपक्रमों को नकदी समर्थन के जरिये विनिर्माण को गति देने का जो उपक्रम किया है वह बहुत प्रभावी होता नहीं दिख रहा है।

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