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सिंधु नदी जल समझौते को बचाना जरूरी

जैमिनी भगवती /  August 12, 2021

गत 5 जुलाई को भारतीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के हवाले से कहा गया कि 'भारत सन 1960 के सिंधु जल समझौते के तहत अपनी जमीन की सिंचाई के लिए अतिरिक्त जल को पाकिस्तान में जाने से रोकने के अपने अधिकार का प्रयोग करने पर काम कर रहा है।' भारत सरकार के स्रोतों ने पहले भी ऐसा कहा है जबकि पाकिस्तान के अधिकारियों ने कहा है कि भारत संधि के मुताबिक नदी जल बंटवारे पर निष्पक्ष ढंग से काम नहीं कर रहा है।

विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक 'भारत सरकार और पाकिस्तान सरकार के बीच सिंधु नदी तंत्र के जल के सर्वाधिक संपूर्ण और संतोषप्रद उपयोग संबंधी संधि' शीर्षक वाले इस समझौते पर 19 सितंबर, 1960 को हस्ताक्षर हुए थे। संधि पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। 27,733 शब्दों के इस बड़े समझौते को ही सिंधु जल समझौते के नाम से जाना जाता है। इससे जुड़े विवादों का निस्तारण और स्पष्टीकरण का काम अंतरराष्ट्रीय पुनर्गठन एवं विकास बैंक (आईबीआरडी) करता है।

सन 1947 से पहले पूर्वी और पश्चिमी पंजाब के बीच सिंचाई की आड़ी-तिरछी व्यवस्था थी। विभाजन के बाद यह जरूरी हो गया कि सतलज, रावी, ब्यास, चिनाब और झेलम जैसी पांच नदियों वाले पंजाब का पानी भारत और पाकिस्तान के बीच किस तरह बांटा जाए। पंजाब में कृषि भूमि की सिंचाई के लिए जलापूर्ति को लेकर रिश्तेदारों के बीच खूनी संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। इसके अलावा विभाजन में गई जानों, पूर्वी पंजाब (भारत) और पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) के किसानों के बीच आरोप-प्रत्यारोप के बाद दोनों सरकारों ने नदी जल बंटवारे को लेकर व्यापक समझौते पर काम करने का निश्चय किया।

संधि का सामान्य पाठ बताता है कि पूर्वी नदियों, सतलज, रावी और ब्यास का पानी भारत इस्तेमाल करेगा और पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों सिंधु, चिनाब और झेलम का पानी मिलेगा। यदि संधि को विस्तार से पढ़ा जाए तो पता चलता है कि इसमें कितने जटिल मसलों को समाहित किया गया है। मसलन जलविज्ञान संबंधी पर्यवेक्षण केंद्र, विशेषज्ञों और किस पक्ष को कितने क्यूसेक जल मिलेगा इसका हिसाब रखने वाले संलग्रकों के बीच संबंधों की प्रणाली। कुछ रिपोर्ट के अनुसार चिनाब और झेलम में 8,000 मेगावॉट जलविद्युत उत्पन्न करने की क्षमता है लेकिन अब तक केवल 2,000 मेगावॉट क्षमता ही हासिल हुई है। उदाहरण के लिए चिनाब नदी पर 900 मेगावॉट क्षमता वाली बगलीहार (बीएचपीपी) परियोजना को जम्मू कश्मीर विकास निगम ने पूरा किया था। इसका निर्माण 1999 में शुरू हुआ और बीएचपीपी 2008 में शुरू हुई।

भारत में तुलबुल नेविगेशनल लॉक या पाकिस्तान में वुलर लेक बैराज परियोजना के नाम से जानी जाने वाली परियोजना सोपोर के निकट झेलम नदी पर बनी है। यह श्रीनगर से 45 किलोमीटर पश्चिमोत्तर में स्थित है। कृषि भूमि के लिए ऐसी परियोजनाओं के इस्तेमाल की पहली चर्चा 1912 में हुई थी जब पंजाब सरकार ने कश्मीर दरबार से संपर्क किया था। वह पहल आगे नहीं बढ़ सकी। राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (एनएचपीसी) द्वारा संचालित उड़ी-1 (480 मेगावॉट) और उड़ी-2 (240 मेगावॉट) परियोजनाएं बारामूला जिले में झेलम नदी पर बनी हैं और क्रमश: मार्च 1997 और जुलाई 2014 में आरंभ हुईं। तुलबुल परियोजना सिंचाई के अलावा इन दोनों परियोजनाओं के लिए जल प्रवाह नियमित करने की दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण है।

चिनाब पर बनी सलाल परियोजना भी ऐसी ही एक परियोजना है जिसकी परिकल्पना 1920 में की गई थी। इसका निर्माण 1970 में शुरु हुआ और 690 मेगावॉट क्षमता वाली इस परियोजना के दो चरण 1987 और 1995 में पूरे हुए। इसका परिचालन भी एनएचपीसी करती है और फिलहाल यह 50 फीसदी क्षमता से चल रही है। चिनाब पश्चिमी नदियों में से एक है और उसका जल पाकिस्तान को आवंटित किया गया था और इस पर बनी पनबिजली परियोजनाएं भारत में हैं लेकिन संधि के मुताबिक पाकिस्तान से मशविरा करना पड़ा। भारतीय टिप्पणीकारों के अनुसार पाकिस्तान की चिंता को देखते हुए बांध की ऊंचाई कम की गई। इससे परियोजना की क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई। सिंचाई के लिए जल साझेदारी की चिंताओं को लेकर भारत और पाकिस्तान के विशेषज्ञों को यह आकलन करना चाहिए कि उनके क्षेत्रों में पूर्वी और पश्चिमी नदियों का कितना पानी बर्फ या वर्षा आधारित है। ऐसे अनुमान से दोनों देशों की एक दूसरे पर निर्भरता का पता लगेगा।

भारत और पाकिस्तान के बीच अत्यधिक तनाव के समय, मसलन नवंबर 2008 में मुंबई में पाकिस्तानी आतंकियों के हमले जैसे वक्त में, दोनों देशों के बीच अनुचित और गैरबराबरी वाले जल बंटवारे का मसला उठता है, ऐसा माहौल बनाया जाता है कि भारत इस संधि को रद्द कर दे। आंकड़े बताते हैं कि यह संधि जांची परखी है और दोनों पक्षों के पेशेवरों ने मतभेदों को भुलाकर साझा संतुष्टि हासिल की है। संधि के बेदाग रिकॉर्ड को देखते हुए भारत को ऊपरी तट वाला देश होने के नाते अत्यंत सावधानी से यह स्पष्ट करना चाहिए कि भारत आखिर तीन पूर्वी नदियों रावी, ब्यास और सतलज से अपने कितने जायज हिस्से का इस्तेमाल नहीं कर रहा है।

यदि भारत अपने हिस्से के मुताबिक इन तीनों नदियों के पानी का इस्तेमाल नहीं कर रहा है तो भारतीय विशेषज्ञों को पाकिस्तानी समकक्षों के सामने यह बात स्पष्ट करनी चाहिए कि वे आखिर इस नतीजे पर कैसे पहुंचे। इतना ही नहीं भारतीय पक्ष को यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि कितनी जलविद्युत बिना इस्तेमाल के शेष है। इसके उलट समय-समय पर पाकिस्तान की घेरेबंदी करने की कोशिश अनुत्पादक साबित हो सकती है। यह दुख का विषय होना चाहिए कि भारत-पाकिस्तान ने जलविद्युत उत्पादन बढ़ाने, फलों और फूलों जैसी नकदी फसलों का उत्पादन बढ़ाने को लेकर आपस में मशविरा नहीं किया और पूर्वी तथा पश्चिमी नदियों की पूरी संभावनाओं का दोहन करने के लिए नदी आधारित परिवहन को बढ़ावा देने संबंधी कोई खास पहल नहीं की है। 

(लेखक भारत के राजदूत एवं कॉर्पोरेट फाइनैंस, विश्व बैंक के प्रमुख रह चुके हैं। वर्तमान में वह सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस के फेलो हैं।)

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