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बेवकूफियों के संक्रामक मेल से महामारी नियंत्रण हुआ नाकाम

देवांशु दत्ता /  August 11, 2021

महामारी का एक रोचक पहलू मूर्खता का प्रसार एवं खुला समर्थन रहा है। एक व्यक्ति के तौर पर हम सबमें कुछ खामियां और आत्मघाती आवेग होते हैं। हालांकि एक सामाजिक पशु के रूप में हमसे यह अपेक्षा होती है कि भीड़ का विवेक इस्तेमाल कर इन आवेगों को काबू में रखें और कमजोरियों के व्यक्तिगत क्षेत्रों की भरपाई करें। आखिरकार, सामूहिक विवेक को ही सेपियंस प्रजाति के मानव विकास की सबसे असरदार प्रजाति बनने की वजह माना जाता है। 

यह पहलू पिछले 20 महीनों में घटी घटनाओं को सहज ज्ञान का विरोधी बनाता है। इस दौरान हमने सामूहिक विवेक के बजाय सामूहिक मूर्खता को घटित होते हुए देखा है। हमने अधिकांश देशों के राजनीतिक नेतृत्व, मीडिया और व्यक्तिगत स्तर पर लोगों की मूर्खताएं देखी हैं। 

महामारी का फैलना इतिहास की कोई अनोखी घटना नहीं है। समूचे इतिहास और उससे पहले भी महामारियां आती रही हैं और वे एक तरह से खुद को दोहराने वाले पैटर्न पर फैलती हैं। एक नई संक्रामक बीमारी आती है जिसमें मौत की दर खासी अधिक है। संक्रमण के मामले बढ़ते ही स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था चरमरा जाती है। हालात ऐसे हो जाते हैं कि मृतकों का आंकड़ा बढऩे पर शवों के अंतिम संस्कार से जुड़ी सुविधाएं भी कम पड़ जाती हैं। 

लोग संक्रमण फैलने के तरीकों की पहचान की कोशिश में शिद्दत से लगे होने से अलग-थलग पड़ जाते हैं। जब भी अलग-थलग रहने के तरीके अपनाने बंद कर दिए जाते हैं और लोग फिर से अपने अस्तित्व के सामान्य तरीके पर लौटते हैं तो फिर संक्रमण की एक नई लहर दस्तक देने लगती है। 

यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक कि सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता का स्तर नहीं हासिल कर लिया जाता है। सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता स्वाभाविक रूप से भी हासिल की जा सकती है जब आबादी का एक बड़ा अनुपात संक्रमित हो चुका हो और उससे उबर चुका हो या फिर मौत हो चुकी हो। इसका एक तरीका टीकाकरण भी है जो कि बहुत कम पीड़ादायक है।

अगर बीमारी क्षेत्र-विशेष तक सीमित हो जाती है तो 1918-20 में आई महामारी स्वाइन फ्लू की तरह उसकी मृत्यु दर भी काफी गिर जाती है। स्वाइन फ्लू बीमारी अब भी मौजूद है लेकिन अब वह कोई गंभीर हत्यारी नहीं रह गई है। हो सकता है कि वह बीमारी पूरी तरह खत्म भी हो जाए या फिर चेचक, पोलियो एवं प्लेग की तरह वह खत्म होने के कगार पर पहुंच जाए। स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली को इनसे निपटने के तरीके सीखने होते हैं और कारगर दवाएं खोजकर संक्रमितों को स्वस्थ कर दिया जाता है। 

21वीं सदी की अंतर्संबद्ध दुनिया को किसी महामारी का सामना करने के लिए कहीं बेहतर ढंग से तैयार होना चाहिए। बीते 30 साल में जीनोम संरचना को डिकोड करने, उन्हें समझने और उनके साथ छेड़छाड़ की वैज्ञानिक क्षमता हासिल होने के बाद उल्लेखनीय प्रगति हुई है। इसने वैज्ञानिकों को किसी भी वायरस की जीनोम संरचना पता करने और उसके हिसाब से कारगर टीके के तीव्र गति से विकास को संभव कर दिखाया है। आज से महज पांच साल पहले तक ऐसा कर पाना मुमकिन नहीं था। इस तकनीकी प्रगति ने ही वायरस के नए स्वरूपों की शिनाख्त को आसान बनाया। 

हमने इंटरनेट, मोबाइल फोन, सोशल मीडिया एवं मुख्यधारा के मीडिया के जरिये खबरों एवं सलाहों को भी फौरन प्रचारित करने की अभूतपूर्व क्षमता हासिल कर ली है। कामकाजी आबादी का एक बड़ा अनुपात संक्रमण से बचने के लिए अलग-थलग रहते हुए दूर रहकर काम जारी रख सकता है। इन सबकी मदद से क्वारंटाइन और लॉकडाउन की बंदिशों को लागू कर पाना कहीं आसान हो चुका है और उस स्थिति में भी आर्थिक गतिविधि एक हद तक चालू रह सकती है।

हमारे पास उपलब्ध संसाधन आज के दौर के महामारी रोग विशेषज्ञों को चिंता के सबब बनने वाले क्षेत्रों की तेजी से शिनाख्त, नई लहर पैदा होने के अनुमान और वैकल्पिक नीतिगत कदमों की समीक्षा के बाद अनुमानपरक मॉडल तैयार करने की छूट देते हैं। ऐसा होने पर नीति-निर्माता नई लहर आने पर उसे दबाने से सक्षम हो पाते।

 

आधुनिकता का दावा करने वाले हरेक देश में एक सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था भी होनी चाहिए जो संक्रमितों का इलाज कर सके, टीकाकरण कर सके और खतरे वाले क्षेत्रों की निगरानी के लिए आंकड़े जुटा सके। इन स्थितियों में सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता को न्यूनतम दर्दनाक ढंग से हासिल कर पाना कहीं ज्यादा आसान होना चाहिए था।

 

लेकिन वैज्ञानिक प्रगति से हासिल बढ़त को दरकिनार करने के लिए बेशुमार बेवकूफियां देखी गईं और लाखों लोग महामारी की भेंट चढ़ गए। कोई कह सकता है कि नीति-निर्माता इस संदर्भ में काफी हद तक मूर्ख ही बने रहे। चुनाव जीतने और मतदाताओं को खुश करने पर जोर देना किसी भी महामारी से निपटने का कहीं से भी आदर्श तरीका नहीं है। 

लोगों ने निजी स्तर पर दिखाई बेवकूफी से भी इस त्रासदी को इस कदर बढऩे दिया। हमने लोगों को निजी स्वतंत्रता जैसे अजीब कारणों का हवाला देते हुए मास्क पहनने से इनकार करते हुए देखा है। हमने अजीब कारण बताते हुए लोगों को टीका लगवाने से इनकार करते हुए भी देखा है जबकि ये काफी हद तक मुफ्त लगाए जा रहे हैं।  

एजेंडा लेकर चलने वाले नेताओं और खास तरह की मंशा रखने वाले लोगों ने टीकाकरण के बारे में गलत जानकारियां फैलाने और फर्जी आंकड़े देने का काम किया। मुख्यधारा का मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी इस बकवास को खारिज करने के बजाय जोर-शोर से उसके प्रसार में लग गए। जो कारण महामारी पर काबू पाने में मददगार होने चाहिए थे, आखिर में उन्होंने ही हालात को बदतर बनाने का काम किया। यह दर्शाता है कि बड़ी बेवकूफी महान तकनीक को भी मात दे देती है और आप भीड़ के संभावित विवेक को लेकर सोच में पड़ जाते हैं।
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