बिजनेस स्टैंडर्ड - सूक्ष्म-प्रबंधन से परहेज ही बेहतर
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, September 28, 2021 12:45 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

सूक्ष्म-प्रबंधन से परहेज ही बेहतर

नितिन देसाई /  August 11, 2021

सूक्ष्म-प्रबंधन का आशय उस स्थिति से है जब निचले स्तर पर लिए जाने  वाले निर्णयों को भी उच्च स्तर पर नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है। इस रवैये के साथ मुख्य समस्या यह है कि ब्योरे पर ज्यादा जोर देने से व्यापक नीतिगत प्रारूप पर ध्यान केंद्रित नहीं रह पाता है। मसलन, कुछ पेड़ों पर ध्यान केंद्रित करने पर एक वन नीति नहीं बनती है क्योंकि एक वन नीति में पौधों के समग्र विकास पर जोर दिया जाना चाहिए ताकि जैव-विविधता का परिवेश बन सके। फिलहाल हम औद्योगिक नीति और राज्यों द्वारा अंजाम दिए जाने वाले विकास कार्यों के संदर्भ में केंद्र सरकार की तरफ से इसी तरह का सूक्ष्म-प्रबंधन वाला रवैया देख रहे हैं। 

औद्योगिक नीति के मामले में सरकार का कॉर्पोरेट रणनीति में हस्तक्षेप के जुनून की जड़ें इस विश्वास में निहित हैं कि पूर्व एशिया की वृद्धि के पीछे वहां के सरकारी अधिकारियों द्वारा कंपनियों के निवेश, तकनीक एवं व्यापार संबंधी निर्णयों में किए गए सीधे हस्तक्षेप का अहम योगदान रहा है। जापान के अंतरराष्टीय व्यापार एवं उद्योग मंत्रालय को इसके मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है। ऐसा संबंध तभी बना रह पाता है जब कंपनियों के मालिकों, नेताओं एवं अधिकारियों के बीच सामाजिक संपर्क हों और वहां की राजनीतिक व्यवस्था में विपक्ष भी कमजोर स्थिति में हो। 

सरकार की तरफ से घोषित उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना औद्योगिक वृद्धि को उसी दिशा में ले जाने की एक कोशिश है। इसमें सरकारी अधिकारियों को प्रोत्साहन  के लायक पाए जाने वाले उद्योगों एवं कंपनियों के संदर्भ में विवेकाधीन निर्णय लेने की छूट दी गई है। इन प्रोत्साहनों के बारे में मानक तय करने एवं उसकी मात्रा तय करने का भी विवेकाधिकार अधिकारियों के पास है। सरकार ने 13 क्षेत्रों के लिए पीएलआई योजना की घोषणा की है और इन क्षेत्रों की पहचान उनकी वृद्धि, रोजगार एवं निर्यात क्षमता के आधार पर की गई है। यह भारत में विनिर्मित उत्पादों की बिक्री बढऩे पर एक उत्पादन सब्सिडी देने की भी पेशकश करता है। वित्त मंत्री ने पिछले बजट में इस कॉर्पोरेट सब्सिडी के मद में अगले पांच वर्षों के लिए 1.9 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान करने की घोषणा की थी। 

यह योजना बुनियादी तौर पर निर्यात किए जाने वाले उत्पादों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने वाला एक संरक्षणवादी कदम है और इसलिए सीमा शुल्क में वृद्धि से ज्यादा अलग नहीं है। संरक्षण के लिए 13 क्षेत्रों का चयन इस आधार पर सही ठहराया जा सकता है कि क्षेत्र-विशेष की कमियां घरेलू विनिर्माताओं की तकनीकी या प्रबंधकीय अक्षमता की देन न होकर उनके नियंत्रण से बाहर के कारणों का नतीजा हैं। उस स्थिति में इन कारकों को दूर करना लागत के नुकसान की भरपाई के लिए सब्सिडी देने के बजाय कहीं ज्यादा उचित कदम नहीं होता? क्या इस नुकसानदेह स्थिति को पैदा करने वाले कारक इन 13 क्षेत्रों के लिए अनूठे हैं या फिर वे अन्य क्षेत्रों पर भी लागू होते हैं? क्या वे ज्यादा बढ़ी हुई विनिमय दर की तरह चरित्र में वृहत-अर्थशास्त्रीय हैं? 

पीएलआई योजना से नीतिगत तौर पर सूक्ष्म-प्रबंधन का रवैया झलकता है जो वाणिज्यिक गतिविधियों का बहुत कम अनुभव रखने वाले सरकारी अधिकारियों को यह परिभाषित करने का विवेकाधिकार देते हैं कि जीत के क्या मायने हैं और विजेता कौन है? यह एक कारोबार-अनुकूल दृष्टिकोण है, न कि बाजार-अनुकूल। और इससे कुछ समय बाद पक्षपात एवं भ्रष्टाचार के भी आरोप लगने लगेंगे। सब्सिडी पर आधारित कारोबार-अनुकूल नजरिये से मोबाइल फोन के घरेलू उत्पादन में फौरी तौर पर कुछ बढ़ोतरी देखी जा सकती है और पीएलआई के समर्थक इसी बात को प्रचारित भी कर रहे हैं। लेकिन बाजार-अनुकूल रवैये से कहीं व्यापक फायदे होंगे जो कि सब्सिडी पर आधारित नहीं हैं। 

औद्योगिक विकास के प्रति बाजार-अनुकूल रवैया क्षेत्रों या कंपनियों के बीच विजेता एवं पराजित की पहचान करने की कोशिश नहीं करेगा। यह नियमों एवं करों का एक टिकाऊ ढांचा तैयार करेगा, वृहत-आर्थिक स्थिरता आएगी और विनिमय दर का सही मूल्यांकन भी हो सकेगा। और विजेता एवं पराजितों के आकलन का काम बाजार पर छोड़ देगा। असल में, ऐसा बाजार-अनुकूल नजरिया अफसरशाहों एवं नेताओं के सूक्ष्म-प्रबंधन से कहीं ज्यादा हासिल कर सकता है क्योंकि यह सिर्फ दिल्ली दरबार की तवज्जो हासिल करने वाले क्षेत्रों को ही नहीं बल्कि सभी क्षेत्रों को प्रोत्साहन देगा।

इसका यह मतलब नहीं है कि औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने में सरकार की वृहत-आर्थिक एवं विनिमय दर प्रबंधन से इतर कोई भूमिका ही नहीं है। यह औद्योगिक वृद्धि एवं निर्यात बढऩे में बाधा बनने वाले कहीं अधिक विशिष्ट कारकों- समुचित ढांचागत व्यवस्था की कमी, उद्योग जगत में अपर्याप्त शोध एवं विकास, कुशल श्रमिकों की कमी और एमएसएमई के लिए पूंजी बाजार में मौजूद खामियों को दूर करने में सक्रिय भूमिका निभा सकता है। अगर सरकार ने 13 चुनिंदा क्षेत्रों को सब्सिडी देने के बजाय इन खामियों को दूर करने पर 1.9 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का फैसला किया रहता तो हम वृद्धि एवं प्रतिस्पद्र्धा के जरिये इससे ज्यादा भी हासिल कर लेते। 

औद्योगिक नीति गैरजरूरी सूक्ष्म-प्रबंधन का अकेला विषय नहीं है। केंद्र सरकार की तरफ से विकास कार्यों के लिए राज्यों को दिए जाने वाले सशर्त अनुदानों के जरिये भी इसी तरह का सूक्ष्म-प्रबंधन किया जा रहा है। इसके लिए बजट में किया गया प्रावधान वर्ष 2021-22 में बढ़कर 3.8 लाख करोड़ रुपये हो गया है जबकि 2020-21 में यह 3.4 लाख करोड़ रुपये था। 

संघवाद के लिए जरूरी है कि केंद्र सरकार को राज्यों द्वारा लागू किए जाने वाले कार्यों के सूक्ष्म-प्रबंधन से खुद को दूर रखना होगा। भारत के कुछ राज्य तो बहुत बड़े आकार के हैं। मसलन, उत्तर प्रदेश आकार में पाकिस्तान जितना बड़ा है और हरियाणा भी वेनेजुएला के करीब आधे आकार का है। न केवल राज्यों के बीच गहरी विविधता है बल्कि एक ही राज्य के भीतर भी विभिन्नता देखने को मिलती है। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार का एक मानकीकृत रवैया अपनाना कृषि, स्वास्थ्य एवं शिक्षा के क्षेत्रों में सार्वजनिक दखल का तरीका नहीं है क्योंकि इन मामलों में नीतियां स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक बनाई जानी चाहिए। मसलन, पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए क्या केरल एवं राजस्थान का अनुदान एकसमान होना चाहिए? मुझे योजना आयोग की एक चर्चा याद आती है जिसमें केरल के कुछ अधिकारियों ने पेयजल आपूर्ति के लिए निर्धारित राशि का इस्तेमाल जल-निकासी एवं जल की गुणवत्ता सुधारने में करने की मांग रखी थी। दरअसल उनका कहना था कि केरल में पेयजल आपूर्ति की समस्या नहीं है। 

केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं के लिए आवंटित राशि का एक बड़ा हिस्सा बिना-शर्त अनुदान के तौर पर दिया जाना चाहिए और इसमें अल्प-विकसित राज्यों को प्राथमिकता दी जाए। इस बारे में केंद्र सरकार को ऐसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए जो राज्यों को जोड़ते हों और किसी भी एक राज्य की क्षमता से परे हों। प्रवासी श्रमिक, बिजली पारेषण, वस्तुओं के अंतर-राज्य आवाजाही का ढांचा सुधारने जैसे काम हो सकते हैं। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लेकर हुआ समझौता एक संघीय व्यवस्था में केंद्र सरकार की भूमिका की एक नजीर थी। अब उसे सूक्ष्म-प्रबंधन के बजाय अंतर-राज्यीय महत्त्व के दूसरे क्षेत्रों में भी ऐसे ही समझौते कराने पर ध्यान देना चाहिए।

केंद्र सरकार को उन गतिविधियों का सूक्ष्म-प्रबंधन करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए जो कंपनी प्रबंधन एवं राज्य सरकारों का काम है। उसने यह मान लेना चाहिए कि अब निचले स्तर की इन निर्णय-निर्माण इकाइयों के पास फैसले लागू करने की क्षमता मौजूद है और वे सही कदम उठाएंगी। अब उसे अपना ध्यान एक बाजार-अनुकूल एवं संघीय अर्थव्यवस्था में टिकाऊ एवं सतत निर्णय के लायक ढांचा खड़ा करने पर अधिक देना चाहिए। इसके अलावा अंतर-राज्यीय महत्त्व के मामलों में विकेंद्रित सहयोग बढ़ाने पर भी उसका ध्यान होना चाहिए।
Keyword: micro management, company, eclgs, industrial policy,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या रोजगार के मोर्चे पर आगे बेहतर होंगे हालात?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.