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आशावाद उचित?

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  August 06, 2021

भारतीय अर्थव्यवस्था के वृद्धि पूर्वानुमानों में आशावाद नजर आ रहा है। इस वर्ष होने वाले सुधार की बात करें तो विश्व बैंक ने 8.3 फीसदी और सरकार ने 10.5 फीसदी की दर से सुधार की बात कही है जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने इसके करीब 9.5 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। निवेश बैंकों के विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने भी अपने पूर्वानुमानों में इसके मध्यम दायरे में रहने की बात कही है। यदि महामारी के कारण गत वर्ष जीडीपी में आई 7.3 फीसदी की गिरावट को ध्यान में रखा जाए तो इन आंकड़ों के मुताबिक करीब एक फीसदी की वार्षिक वृद्धि हासिल हो सकती है। यह आंकड़ा इन दो वर्षों के वैश्विक जीडीपी प्रदर्शन से मेल नहीं खाता। यह उभरते बाजार की अर्थव्यवस्थाओं के प्रदर्शन से भी कमतर है। विश्व बैंक का कहना है कि यह वर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बीते 80 वर्षों में सुधार का सबसे बेहतर वर्ष साबित होने वाला है। जबकि भारत ने बीते 40 वर्षों में कुछ ही अवसरों पर इससे बेहतर प्रदर्शन किया है।

ऐसे परिदृश्य को देखते हुए सुधार के बाद क्या होगा? मुख्य आर्थिक सलाहकार ने 2022-23 में 6.5 फीसदी से 7 फीसदी वृद्धि का अनुमान जताया है जबकि उसके बाद इसके 8 फीसदी रहने की बात कही है। वहीं विश्व बैंक के मुताबिक यह आंकड़ा 7.5 फीसदी से घटकर 6.5 फीसदी रह जाएगा। आईएमफ अधिक आशावादी है। उसने अगले वर्ष 8.5 फीसदी वृद्धि की आशा जताई है। ये आंकड़े प्रतीकात्मक हैं और इनमें अहम बदलाव हो सकता है। आईएमएफ का अतीत अत्यधिक आशावादी होने का रहा है। अप्रैल में भारत की वृद्धि का उसका अनुमान 12.5 फीसदी था जो जुलाई में घटकर 9.5 फीसदी रह गया। यह बात भी ध्यान रखनी होगी महामारी के पहले के तीन वर्षों मेंआधिकारिक वृद्धि दर औसतन 5.8 फीसदी रही थी।

सवाल है कि यदि अतीत के प्रदर्शन से नहीं तो यह आशावाद कहां से उपजा है? मुख्य आर्थिक सलाहकार का अगले वर्ष 8 फीसदी का वृद्धि अनुमान सरकार के सुधार संबंधी उपायों के सकारात्मक नतीजों पर निर्भर है। वह कुछ उपायों की सूची भी देते हैं। एक अन्य कारक विश्व अर्थव्यवस्था की अस्वाभाविक गति भी हो सकती है। आईएमएफ का अनुमान है कि इस वर्ष 6 फीसदी के बाद 2022 में विश्व अर्थव्यवस्था 4.9 फीसदी की दर से बढ़ेगी। ये अनुमान रुझान से बेहतर हैं। वैश्विक वाणिज्यिक व्यापार दो अंकों की वृद्धि दर्ज कर सकता है और भारत का निर्यात तेजी का लाभ लेता दिख रहा है। वर्ष 2008 के वित्तीय संकट के पहले ऐसे ही हालात में भारत ने वृद्धि के सबसे बेहतरीन वर्ष देखे थे।  सकारात्मक पक्ष देखें तो संगठित क्षेत्र से उत्पादकता में सुधार देखने को मिलेगा। वह असंगठित क्षेत्र को पीछे छोड़ देगा क्योंकि महामारी ने कॉर्पोरेट मुनाफे और कर राजस्व प्रवाह में भी भूमिका निभाई है। आर्थिक गतिविधियों के डिजिटलीकरण ने भी उत्पादकता बढ़ाने की आशा जगाई है।

इसके बावजूद कुछ बातें हैं। पहली बात, सरकार का प्रदर्शन अत्यधिक आशावादी होने का रहा है। याद कीजिए दो अंकों में वृद्धि की पुरानी बात। दूसरा, सुधार संबंधी उपायों के कमजोर प्रदर्शन का इतिहास रहा है। ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता, मेक इन इंडिया पहल, बिजली क्षेत्र के सुधार उदय समेत अब तक हुए बैंकिंग सुधारों पर भी विचार कीजिए। परिवहन (खासकर रेल) बुनियादी ढांचे में व्यापक निवेश से भी सीमित लाभ हुए हैं। पिछली तेज वृद्धि के दौर और वर्तमान के बीच के विरोधाभास पर नजर डालिएह्य। वर्ष 2008 के पहले के वर्षो में निवेश में तेजी आई थी जबकि बाद में जीडीपी में निवेश की हिस्सेदारी घटी। एक अन्य कारक यह है कि रोजगार अनुपात में तेज गिरावट से उत्पादन प्रभावित हुआ।

इन आंकड़ों में सुधार हो सकता है। ठीक वैसे ही जैसे अतिरिक्त कॉर्पोरेट कर स्तर में सुधार हुआ लेकिन संगठित क्षेत्र का मुनाफा आधारित सुधार तब तक पर्याप्त नहीं होगा जब तक कि छोटे और मझोले उपक्रम वापस पटरी पर नहीं आते। याद रहे कि संरक्षणात्मक कानून के अभाव में जोमैटो और उबर जैसे एग्रीगेटर कारोबार वेंडरों पर दबाव बनाएंगे और विजेता-पराजित का विभाजन और गहरा होगा। ऐसे रुझान खपत में सुधार का समर्थन नहीं करेंगे। उसके बिना नया निवेश नहीं आएगा। केवल सरकारी व्यय का सहारा रह जाएगा जिसे सार्वजनिक ऋण में इजाफे का भी ध्यान रखना होगा।

मध्यम अवधि में वृद्धि दर में तेज इजाफा तभी हो सकता है जब अर्थव्यवस्था के सभी इंजन पूरी क्षमता से काम कर रहे हों। इसमें निजी और सार्वजनिक निवेश, घरेलू मांग और निर्यात शामिल हैं। सरकार ने अपने निवेश के भरोसे वृद्धि पर दांव लगाया है जबकि निर्यात का प्रदर्शन अच्छा है। ये चार में से दो इंजन हैं।

Keyword: आशावाद, विश्व बैंक, आईएमएफ, निवेश बैंक, पूर्वानुमान, जीडीपी, डिजिटलीकरण,
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