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भारत में कारोबारी सुगमता बनाम कारोबार की लागत

अजय छिब्बर /  August 06, 2021

विश्व बैंक के कारोबारी सुगमता सूचकांक में भारत ने 2014 में मोदी सरकार के आगमन के बाद से 2019 तक 79 स्थानों का सुधार किया और वह 142वें स्थान से 63वें स्थान पर आ गया। परंतु इस रैंकिंग में भारी सुधार के बावजूद देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर 2016 से 2019 के बीच चार फीसदी से अधिक गिर गई। जीडीपी में निजी निवेश की हिस्सेदारी तीन फीसदी से अधिक घटी और यह 2004-2013 के 25 फीसदी से कम होकर 2016-2019 के बीच 22 फीसदी पर आ गई।

कारोबारी सुगमता सूचकांक के साथ समस्या यह है कि इसमें आसानी से छेड़छाड़ करके बेहतर परिणाम हासिल किया जा सकता है और इस दौरान प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर भी बहुत अधिक असर नहीं होता। सन 2004 से 2013 के बीच हालांकि भारत कारोबारी सुगमता सूचकांक में नीचे था लेकिन उसने इस अवधि में उल्लेखनीय घरेलू और विदेशी निवेश हासिल किया।

स्वतंत्र समीक्षा दर्शाती है कि कारोबारी सुगमता सूचकांक में कई कमियां हैं। यह जिन चीजों को मापता है और जिस पद्धति से मापता है दोनों में समस्या है। ऐसा सूचकांक शुरुआत से ही खतरनाक है जो इस सिद्धांत पर बना है कि कम नियमन हमेशा सही होता है। सन 2008-09 के वैश्विक वित्तीय संकट का अनुभव हमें यह दिखा भी चुका है। कारोबारी सुगमता सूचकांक में श्रम या पर्यावरण नियमन शामिल नहीं होते। यह आज की बढ़ती असमानता और जलवायु परिवर्तन की चुनौती से घिरी दुनिया में बहुत चौंकाने वाली बात है। यह गलत बातों को प्रोत्साहन देता है।

चूंकि कई नियमन राज्य स्तर पर बनते और लागू किए जाते हैं इसलिए भारत में राज्यों को भी कारोबारी सुगमता सूचकांक पर आंका जाने लगा। आश्चर्य नहीं कि कई राज्यों ने इसका तोड़ निकाल लिया। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश जो शिक्षा, कुशल श्रमिक, बिजली, सड़क और संचार के मोर्चे पर अत्यंत पिछड़ा हुआ है, उसने 2019 में देश के भीतर कारोबारी सुगमता सूचकांक में दूसरा स्थान हासिल कर लिया।

कारोबारी सुगमता सूचकांक में सुधार के बावजूद कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो देश का कारोबारी जगत प्रतिस्पर्धी नहीं है। प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में कारोबार की लागत बहुत ज्यादा होने के कारण भारत में औद्योगिक क्षमता समय पूर्व कमजोर पड़ गई।

कागज पर देखें तो भारत में श्रम की लागत कम नजर आती है लेकिन श्रम उत्पादकता से तुलना करने पर ऐसा नहीं लगता। देश की श्रम शक्ति का केवल 4 फीसदी कुशल है। श्रम कानून भी कंपनियों को आकार छोटा रखने का प्रोत्साहन देते हैं। यदि 10 से कम कर्मचारी हों तो उन्हें श्रम या कर निरीक्षक के दौरे से बचाव मिलता है। विनिर्माण रोजगार का 70 फीसदी ऐसी ही कंपनियों में है जो विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकतीं।

भूमि अधिग्रहण न केवल धीमा है बल्कि 2013 के कानून के बाद यह बहुत महंगा भी हो गया है। संप्रग और राजग दोनों उस कानून के हिमायती थे। मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस मसले को हल करने का वादा किया था लेकिन अब तक कोई कामयाबी नहीं मिली।

पूंजी की लागत बढ़ी हुई है क्योंकि बैंकिंग तंत्र गैर किफायती है। ऋण और जमा दरों के बीच का विस्तार 500 आधार अंकों से अधिक हो गया है जो विश्व में सर्वाधिक स्तरों में से एक है। बांग्लादेश में यह 350-400 आधार अंक, थाईलैंड में 320 आधार अंक, वियतनाम में 250 आधार अंक और मलेशिया में 150 से 200 आधार अंक है। बढ़ता फंसा हुआ कर्ज, लक्षित ऋण आवश्यकता और सांविधिक तरलता अनुपात की आवश्यकता इन कमियों को स्पष्ट करती है। इसलिए देश का ऋण-जीडीपी अनुपात बीते एक दशक से 50 फीसदी पर अटका हुआ है जबकि वियतनाम, चीन, मलेशिया और थाईलैंड में यह 100 फीसदी से अधिक है। वित्तीय समावेशन में भी भारत पीछे है। जन धन खातों का इस्तेमाल भी काफी कम है।

देश में बुनियादी ढांचे की काफी कमी है, हालांकि हाल के वर्षों में इसमें सुधार हुआ है। विश्व बैंक के लॉजिस्टिक्स परफॉरमेंस इंडेक्स में भारत की रैंकिंग सुधरकर 44 हो गई है लेकिन अब भी वह चीन, मलेशिया, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों से काफी पीछे है।

कारोबार में बुनियादी ढांचे की लागत अहम है क्योंकि भारत उपभोक्ताओं को उत्पादकों की बिना पर क्रॉस सब्सिडी देता है। उदाहरण के लिए भारत में बिजली की कीमत आम उपभोक्ताओं के लिए कम और उद्योग जगत के लिए अधिक है। भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी अन्य उभरते देशों से अधिक हैं। चीन की तुलना में भारत में पेट्रोल 20 फीसदी और डीजल 50 फीसदी महंगा है। देश की ईंधन नीति अजीब है। वैश्विक बाजार में कीमत गिरने का कोई लाभ उपभोक्ताओं को नहीं मिल रहा है। ऐसे में अन्य देशों में कीमतें गिरने से हमारे कारोबार गैर प्रतिस्पर्धी होते जा रहे हैं। पेट्रोल कीमतें प्रति लीटर 100 रुपये से अधिक होने के बाद देश की मुद्रास्फीति को लक्षित करने की व्यवस्था पर असर पड़ा है।

भारत को आईटी क्षेत्र का अगुआ होने पर गौरव है लेकिन देश में आईटी की पहुंच बमुश्किल 55 फीसदी है जो पाकिस्तान के बराबर और चीन, वियतनाम, मलेशिया और इंडोनेशिया से बहुत कम है। ये सभी देश 80 फीसदी या उससे अधिक स्तर पर हैं। मोबाइल टेलीफोन सेवा का विस्तार हुआ है लेकिन डेटा डाउनलोड की गति 8 एमबिट प्रति सेकंड है जो पाकिस्तान के बराबर लेकिन पूर्वी एशियाई देशों से कम है। शोध एवं विकास व्यय पर भी हम जीडीपी का 0.6 फीसदी व्यय करते हैं जबकि चीन में यह दो फीसदी है।

गैर प्रतिस्पर्धी बनने के साथ ही भारत ने शुल्क दरों में इजाफा किया और क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी से बाहर हो गया। लेकिन इससे हम वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी नहीं बनने वाले। सच तो यह है कि 30 अरब डॉलर की उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजना तैयार की गई ताकि 12 उद्योगों को नया निवेश मिल सके। परंतु देखना होगा कि क्या यह कारोबार करने की बुनियादी लागतों से निजात पाने लायक है।

उद्यमियों की बुनियादी समस्याओं को दूर करने और कारोबार की वास्तविक लागत कम करने की कोशिश के बजाय कारोबारी सुगमता पर अत्यधिक ध्यान दिया जा रहा है। भारत को अगर महामारी के बाद मजबूती से उभरना है तो उसे इन बाधाओं को दूर करना होगा। देश को कम से कम 6-7 फीसदी वृद्धि की जरूरत है। यदि महामारी के दौरान गंवाए गए दो वर्षों की भरपाई करनी है तो और अधिक वृद्धि हासिल करनी होगी।

(लेखक जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनैशनल इकनॉमिक पॉलिसी के अतिथि स्कॉलर हैं)

Keyword: कारोबारी सुगमता, कारोबार की लागत, रैंकिंग, जीडीपी वृद्धि दर,
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