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सहकारिता मंत्रालय साबित होगा आशा का अग्रदूत?

मिहिर शाह /  August 04, 2021

भारत सरकार ने गत 6 जुलाई को सहकारिता मंत्रालय नाम के एक नए मंत्रालय के गठन की घोषणा की। इसके एक ऐतिहासिक निर्णय होने की संभावना है। आज भारत में सक्रिय करीब 8 लाख सहकारी समितियों से 30 करोड़ से अधिक लोग जुड़े हुए हैं। बीते वर्षों में सहकारी समितियों ने कई अवतार लिए हैं लेकिन इस लेख में हमारा ध्यान ऋण सहकारी समितियों पर केंद्रित है जिनकी ग्रामीण गरीबों के लिए अहमियत को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं आंका जा सकता है। नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों तक कृषि क्षेत्र को दिए जाने वाले कुल संस्थागत कर्ज में 60 फीसदी से अधिक हिस्सा सहकारी समितियों का हुआ करता था। कई समितियां कृषि इनपुट भी मुहैया कराती हैं और खाद्य एवं अन्य जरूरी वस्तुओं के संदर्भ में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के आउटलेट के तौर पर काम करती हैं। लेकिन दुखद रूप से पिछले कुछ वर्षों में सहकारी समितियों में बहुत तीव्र ह्रास देखने को मिला है और आज संस्थागत ऋण वितरण में उनका अंशदान महज 10 फीसदी रह गया है।

दरअसल नब्बे के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण मुहैया कराने वाली व्यवस्था में साहूकार-कारोबारी-भूस्वामी की खतरनाक तिकड़ी की फिर से वापसी हो गई है। इसकी वजह यह है कि इस अवधि में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को लाभ कमाने से जुड़े मानकों का पालन सख्ती से करने को कहा गया। सार्वजनिक बैंकों के साथ महिलाओं के स्वयं-सहायता समूहों (एसएचजी) की बढ़ती भागीदारी ने पहले इस तिकड़ी को कुछ हद तक खेल से बाहर धकेला था। लेकिन बहुत ऊंचे ब्याज पर कर्ज देने वाले साहूकारों के शिकंजे को निर्णायक रूप से तोडऩे के लिए हमें एक सुधरे एवं पुनर्जीवित सहकारिता क्षेत्र की जरूरत है। असल में ग्रामीण गरीबों के शोषण एवं दमन की सदियों पुरानी व्यवस्था की धुरी साहूकार ही रहे हैं।

अब सवाल उठता है कि नया मंत्रालय हालात को सुधारने में किस तरह से मदद कर सकता है? सच तो यह है कि सहकारिता संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत राज्य सूची का विषय है। ऐसे में सहकारिता मंत्रालय के गठन ने अनेक के मन में यह वाजिब सवाल खड़ा कर दिया है कि केंद्र सरकार कहीं राजनीति से प्रेरित होकर अपने अधिकार-क्षेत्र का अतिक्रमण तो नहीं कर रही है जो सहकारी संघवाद की उसकी ही घोषित नीति का संभवत: उल्लंघन करता है। बहरहाल हमारा मत है कि जल एवं कृषि जैसे राज्य सूची वाले दूसरे विषयों की ही तरह सहकारिता पर भी केंद्र को एक निश्चित भूमिका निभानी है जब तक यह काम राज्यों के हाथ मजबूत करने वाले एवं आनुषंगिकता के सिद्धांत को बल देने वाले एक तय ढांचे के भीतर होता है। आनुषंगिकता का मतलब है कि समस्या की जड़ के आसपास ही उसका समाधान मुहैया कराने की कोशिश, न कि हर समस्या के लिए एक ही तरह का रवैया अपनाना। दरअसल भारत में केंद्रीकृत नियोजन के दौर से ही हर तरह की समस्या के लिए एक ही तरह का रवैया अपनाया जाता रहा है और योजना आयोग के  उन्मूलन के बावजूद यह सिलसिला जारी है।

भारी भ्रष्टाचार एवं राजनीतिक दखल की वजह से सहकारी समितियों की स्थिति में गिरावट आई है जिसकी मार पारदर्शिता, प्रबंधन एवं शासन पर पड़ी है। सहकारी समितियों का सुधार उन्हें सदस्य-केंद्रित, लोकतांत्रिक, स्व-शासित एवं वित्तीय रूप से व्यवस्थित संस्थान बनाने में मददगार होगा। वर्ष 2005 में ग्रामीण सहकारी ऋण संस्थानों के पुनरुद्धार पर गठित कार्यबल की भी यह प्रमुख अनुशंसा थी। मशहूर अर्थशास्त्री ए वैद्यनाथन की अगुआई वाले कार्यबल की अनुशंसाएं नए सहकारिता मंत्रालय के कामकाज का केंद्रबिंदु होनी चाहिए। वास्तव में, इन सुझावों को लागू करने की राह में आ रही चुनौतियों पर एक सजग नजर डालने से मंत्रालय के कामकाज को निर्धारित किया जाना चाहिए।

सहकारिता क्षेत्र की सुधारात्मक व्यवस्था का एक अहम पहलू केंद्र की तरफ से राज्यों को दी जाने वाली वित्तीय मदद के लिए प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पीएसीएस) को पेशेवर अंदाज एवं लोकतांत्रिक तरीके से चलाने के लिए राज्यों द्वारा किए गए सुधारों को शर्त बना देना चाहिए। ध्यान रहे कि पीएसीएस ही ग्रामीण सहकारी ऋण संरचना की बुनियाद हैं। जब पीएसीएस में सुधार लागू होते हैं और उनकी स्थिति मजबूत हो जाती है उनके जिला एवं राज्य स्तरीय ऋण समितियां भी कहीं मजबूत होकर उभरेंगी। यह बहुत बड़ी कवायद है जिसमें समितियों का ऑडिट एवं बहीखातों को दुरुस्त करना, प्रतिस्पद्र्धी बने रहने के लिए ठोस अकाउंटिंग एवं निगरानी व्यवस्था अपनाना और पारदर्शिता, तकनीकी उन्नयन एवं हजारों प्राथमिक कृषि ऋण समितियों के कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाने पर जोर देना होगा।

जब राज्य इन गतिविधियों के लिए राजी हो जाएं तो केंद्र को इस पर आने वाली लागत का एक बड़ा बोझ खुद ही उठाना चाहिए। इसके लिए केंद्र को वित्त, शासन, प्रबंधन एवं कानूनी सुधार से संबंधित मानकों, सिद्धांतों एवं तरीकों का एक बेहद महत्त्वपूर्ण ढांचा खड़ा करना होगा ताकि राज्य एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर उन पर चर्चा कर सहमति जता सकें। वैद्यनाथन पैनल की रिपोर्ट आए हुए कई साल हो चुके हैं और इस दौरान स्वयं-सहायता समूहों का मजबूती से उभरना एक बड़ा सकारात्मक प्रगति रही है। स्वयं-सहायता समूहों की सफलता के साथ-साथ उनकी नाकामियों से मिलने वाले सबक हमें सहकारी समितियों के बारे में दिशा दिखाने में बेहद मददगार हो सकते हैं।

यहां पर बुनियादी सवाल राज्य की भूमिका और नागरिक समाज के साथ इसके रिश्ते से जुड़ा हुआ है। राज्य की भूमिका को अहम मानने वाले लोगों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि राज्य की भूमिका नागरिक समाज को समर्थन, सहयोग एवं सशक्त करने वाली होनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से, अक्सर राज्य का कदम गरीबों की मदद के नाम पर मकसद को ही नुकसान पहुंचाने वाला साबित होता है। कई किसान आंदोलनों ने भी कर्ज मेला लगाने एवं कर्ज माफी योजनाएं लाने के लिए लामबंदी की है जिसने अंतत: सार्वजनिक बैंकों एवं पीएसीएस जैसी संस्थाओं को कमतर करने का ही काम किया है। इसकी वजह से सहकारी समितियों को बंद करने का माहौल बनता है क्योंकि उनके बहीखाते लाल निशान की तरफ चले जाते हैं।

नए मंत्रालय के सामने यही असल चुनौती है और इसकी वास्तविक मंशा की एक परीक्षा भी है। क्या यह नियंत्रण पर आधारित अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के प्रलोभन में फंस जाएगा? या यह इन बेहद अहम संस्थाओं की दीर्घावधि सेहत की दिशा में काम करेगा? उम्मीद की जानी चाहिए कि आलोचक गलत साबित होंगे और सहकारिता मंत्रालय सही मायनों में सहकारी संघवाद की भावना स्थापित करने के लिहाज से सहकारिता का एक अग्रदूत साबित होगा।

(लेखक शिव नाडर यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक और योजना आयोग के पूर्व सदस्य हैं)

Keyword: सहकारिता मंत्रालय, अग्रदूत, सहकारी संघवाद, जरूरी वस्तु, एसएचजी,
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