बिजनेस स्टैंडर्ड - उत्पादों के निर्यात में बढ़त का दौर
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उत्पादों के निर्यात में बढ़त का दौर

अजय शाह /  August 04, 2021

ऐसी मान्यता है कि उत्पादों के निर्यात में चीन भारत से काफी आगे है। यह बात निरपेक्ष तौर पर भले ही सही है लेकिन सापेक्षिक रूप में तस्वीर बदलती रही है। हम इस परिघटना को समझने के लिए अमेरिका द्वारा भारत एवं चीन से किए जाने वाले आयात के आंकड़ों का इस्तेमाल करते हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के एक मुश्किल दौर में कंपनियों की रणनीतिक सोच के केंद्र में निर्यात को प्राथमिकता देना होना चाहिए और यह बात सेवाओं के साथ उत्पादों पर भी लागू होती है।

वस्तुओं के निर्यात में चीन को वैश्विक स्तर पर अतुलनीय सफलता मिली है। चीन ने न केवल बहुत बड़े पैमाने पर निर्यात किया है बल्कि उसने मशीनी उपकरणों एवं कंप्यूटरों को जगह देकर मूल्य शृंखला को भी उन्नत किया है। अक्सर निवेशक एवं प्रबंधक भारत से सेवाएं निर्यात करने का सपना देखते हैं लेकिन वस्तु निर्यात से जुड़ी कारोबार योजनाओं को लेकर वे आशंकित होनेे लगते हैं। आंकड़े इस ओर इशारा करते हैं कि इन घिसे-पिटे ढर्रे पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है।

चीन एवं भारत के उत्पाद निर्यात आंकड़ों में मापन की समस्या है जिसके लिए गलत बिल बनाने की परिपाटी जिम्मेदार है। पूंजी पर नियंत्रण एवं कर नीति से गलत बिल बनाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। लिहाजा इन दोनों देशों से अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात के मासिक आंकड़ों पर गौर करना ज्यादा उपयोगी है। ऐसी संभावना है कि यहां पर नजर आने वाले मात्रात्मक मूल्य इन देशों के घरेलू आंकड़ों की तुलना में कहीं अधिक सटीक होंगे। अमेरिका के उत्पाद आयात में भारत की हिस्सेदारी पर गौर करते हैं। जनवरी 1987 के आंकड़े से शुरू करते हैं। पहले दौर में भारत की हिस्सेदारी हर महीने 0.0016 फीसदी की दर से बढ़ रही थी। इस प्रगति में पहला संरचनात्मक अवरोध दिसंबर 2001 में लगा। उसके बाद भारत का हिस्सा कहीं अधिक तेजी से बढऩे लगा और हर महीने 0.0037 फीसदी अंक की वृद्धि दर्ज की गई। फिर दिसंबर 2009 में दूसरा संरचनात्मक अवरोध पैदा हुआ। उसके बाद अमेरिका आयात में भारतीय हिस्सेदारी प्रति माह 0.0059 फीसदी अंक की दर से बढ़ती रही है।

हालांकि अमेरिकी उत्पाद आयात में भारत की हिस्सेदारी 2.6 फीसदी के साथ अब भी बहुत कम है। लेकिन भारत में बड़े पैमाने पर मौजूद निराशा के विपरीत यह हिस्सा क्रमिक रूप से बढ़ता ही रहा है। वस्तु निर्यात की स्थिति में ये सुधार किस तरह आए? वर्ष 2001 और 2009 के संरचनात्मक अवरोध से पहले किस तरह के नीतिगत इनपुट थे जिसके बाद अमेरिकी आयात में भारत की हिस्सेदारी को तीव्र उछाल मिली?

इस कहानी में तीन मुख्य बिंदु थे। पहला बिंदु आयात के रास्ते की अड़चनों को दूर करने का था। भारतीय बाजार को आयात के लिए अधिक खोलना 1991 में शुरू हुए आर्थिक सुधारों का केंद्रीय विषय था। जब सीमा शुल्क एवं गैर-शुल्क बाधाओं को कम किया गया तो भारत आने वाला कच्चा माल सस्ता हो गया। इसने निर्यातकों को पहले की तुलना में अधिक प्रतिस्पद्र्धी बनाया। तब वित्त मंत्रालय में राकेश मोहन यह कहा करते थे कि जब भी हम सीमा शुल्कों में कटौती करते हैं, निर्यात बढ़ जाता है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में सीमा शुल्क में अच्छी-खासी कटौती की।

दूसरा बिंदु पूंजी प्रवाह की राह की बाधाओं को हटाने का था। विदेशी कंपनियों ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) से जुड़े नियमों को उदार बनाने का इस्तेमाल भारत में परिचालन शुरू करने और यहां से विदेशों में निर्यात करने के लिए किया। विदेशी कंपनियों की पहुंच पूंजी की विश्व-स्तरीय कीमत पर वैश्विक कॉर्पोरेट वित्तीय इंतजामों तक रही है जबकि भारतीय कंपनियों के मामले में ऐसा नहीं है। किसी स्टील विनिर्माता कंपनी के लिए इक्विटी निवेश या कर्ज के तौर पर पूंजी की उपलब्धता लौह अयस्क या कोयले जैसे कच्चे माल की उपलब्धता जैसी ही है। पूंजी नियंत्रण कम होने से भारतीय कंपनियों को पूंजी (इक्विटी एवं कर्ज) कम दर पर उपलब्ध होने लगी। इसने उन्हें अधिक प्रतिस्पद्र्धी बनाया और वे निर्यात करने की स्थिति में आ गईं।

तीसरा बिंदु ढांचागत व्यवस्था में किए गए सुधार थे जिसने भारत को वैश्विक मूल्य शृंखला से जुडऩे में मदद की और भारत में सामान बनाने वाले निर्यातकों के लिए सस्ते श्रम की तलाश में भीतरी इलाकों तक पहुंच पाना संभव हो सका।

इसके साथ ही यह देखना भी दिलचस्प है कि अमेरिकी उत्पाद आयात में चीन की हिस्सेदारी के मोर्चे पर क्या रहा था? शुरुआती दौर में जनवरी 1987 में इस आयात में चीन का हिस्सा 1.7 फीसदी था और नाटकीय रूप से बढ़ते हुए सितंबर 2017 में यह 23.3 फीसदी के शिखर तक जा पहुंचा। इस पूरी अवधि में चीन की अमेरिकी आयात बाजार में हिस्सेदारी हर माह औसतन 0.06 फीसदी अंक की बेहतरीन दर से बढ़ी। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में इस हिस्सेदारी में थोड़ी गिरावट आई है और मई 2021 में यह 16.8 फीसदी पर आ चुकी थी। चीन राष्ट्रवाद एवं सर्वाधिकारवाद की तरफ लौटता दिखा है और वैश्विक मौजूदगी वाली कंपनियों के कर्ताधर्ता वैश्विक उत्पादन में चीन की भूमिका कम करने के पक्षधर नजर आने लगे हैं।

हम कह सकते हैं कि गिलास आधा खाली है। लेकिन सच यही है कि अमेरिकी उत्पाद आयात में चीन का हिस्सा अब भी 16.8 फीसदी है जबकि भारत की हिस्सेदारी 2.6 फीसदी ही है जो कि दोनों देशों के बीच 6.4 गुना फासले को दर्शाता है। लेकिन गिलास आधा भरा हुआ भी है। इस पूरी अवधि में अमेरिकी उत्पाद आयात में भारत की हिस्सेदारी बढ़त पर है और प्रति माह वृद्धि की दर भी दोगुनी हुई है।

निवेशकों एवं प्रबंधकों की ऐसी धारणा है कि भारत सेवा उत्पादन के लिहाज से एक बढिय़ा प्लेटफॉर्म है। यहां पर दिखाए गए आंकड़े हमें भारत से उत्पाद निर्यात के बारे में भी अधिक आशावादी होने का संकेत देते हैं। अमेरिकी उत्पाद आयात में भारत की हिस्सेदारी धीरे-धीरे बढ़ रही है।

इसी तरह निवेशकों एवं प्रबंधकों की ऐसी राय भी है कि चीन विनिर्माण का एक पावरहाउस है और भारत के लिए उसकी जगह ले पाना नामुमकिन है। वैसे आंकड़े बताते हैं कि बदलाव की दिशा भारत के पक्ष में है। अक्टूबर 2017 के बाद से चीन का अमेरिका को होने वाला उत्पाद निर्यात 6.5 फीसदी तक कम हुआ है जबकि इस अवधि में भारत को 0.4 फीसदी अंकों का फायदा हुआ है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह एक मुश्किल दौर है जब सरकारी मांग एवं उपभोक्ता मांग में कमजोरी के साथ निजी निवेश की मांग भी घटी है। वैसे विश्व अर्थव्यवस्था में बढिय़ा सुधार देखा जा रहा है और राजकोषीय क्षमता एवं टीकाकरण में आई मजबूती से यह झलकता भी है। भारत में सक्रिय कंपनियों को निर्यात क्षेत्र को वरीयता देने से काफी लाभ हो सकते हैं। वे सीधे निर्यात कर सकती हैं या निर्यातक फर्मों को अपने उत्पाद बेच सकती हैं। अगर हम दिसंबर 2019 को महामारी आने से पहले का महीना मानें और मई 2021 के नवीनतम आंकड़ों से इसकी तुलना करें तो अमेरिका को भारत का उत्पाद निर्यात 41 फीसदी तक बढ़ गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था का कोई दूसरा क्षेत्र नहीं है जो महामारी-पूर्व की स्थिति से आज के समय में ऐसी वृद्धि दर्शाने वाला हो।

(लेखक स्वतंत्र विश्लेषक हैं)

Keyword: उत्पाद, निर्यात, चीन, आयात, उपकरण, कंप्यूटर, मूल्य शृंखला,
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