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संसदीय गरिमा का हो सम्मान

संपादकीय /  August 02, 2021

सूचना-प्रौद्योगिकी पर संसद की स्थायी समिति के अध्यक्ष शशि थरूर ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिख कर इस समिति के समक्ष पेश नहीं होने वाले केंद्र सरकार के अधिकारियों के विरुद्धकार्रवाई करने की मांग की है। यह समिति पिछले सप्ताह बुधवार को कई महत्त्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करने वाली थी। इनमें पेगासस विवाद सबसे महत्त्वपूर्ण था जिसे लेकर सरकार और विपक्ष के बीच संसद में भारी गतिरोध बना हुआ है। थरूर ने पत्र में आरोप लगाया कि इस विषय से संबंधित तीन मंत्रालयों-इलेक्ट्रॉनिक एवं सूचना-प्रौद्योगिकी, संचार और गृह-के अधिकारियों को समिति के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया गया था लेकिन इन तीनों अधिकारियों ने आखिरी क्षण में उपस्थित होने में असमर्थता जताई। तीनों अधिकारियों ने एक-एक कर कुछ समय के अंतराल पर उपस्थित होने में असमर्थता जताई। इससे यह माना जा सकता है कि तीनों अधिकारियों ने एक सोची समझी रणनीति के तहत यह व्यवहार किया। थरूर के पत्र के बाद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से संसदीय समिति के एक सदस्य निशिकांत दुबे ने कहा कि 'थरूर की मनोदशा एवं उनके कार्य करने का तरीका' सभी जानते हैं इसलिए लोकसभा अध्यक्ष को उनके आग्रह पर ध्यान नहीं देना चाहिए। दुबे ने यहां तक कह दिया कि थरूर की खास विचारधारा है और उसी से प्रेरित होकर उन्होंने पत्र लिखा है इसलिए लोकसभा अध्यक्ष को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

समिति के समक्ष अधिकारियों का अनुपस्थित होना अपनी जवाबदेही से मुकरने का गंभीर मामला बनता है। दुबे काकहना है कि विधायिका और कार्यपालिका के बीच एक गोपनीय समझौता है जिसका आशय है कि दोनों अंगों के प्रतिनिधि एक दूसरे की अवमानना नहीं करेंगे। मगर कार्यपालिका के लोगों की संसद के प्रति जवाबदेही बनती है। सरकार के तीनों अंगों, खासकर, कार्यपालिका और विधायिका के बीच संतुलन देश हित के लिए बेहद जरूरी है। अगर कार्यपालिका के प्रतिनिधि संसद के निर्देशों का पालन करने से पीछे हटते रहे और एक रणनीति के तहत ऐसा करते रहे तो यह न केवल संसद के अधिकारों का हनन होगा बल्कि  सांविधानिक बुनियाद पर प्रहार होगा। कम से कम उक्त मामले में ऐसा ही प्रतीत हो रहा है कि संसद की गरिमा बनाए रखने में जान बूझकर कोताही बरती गई है। संसदीय समिति संसदीय कार्य प्रणाली का एक अहम अंग है और यह कार्यपालिका के लोगों की जवाबदेही तय करती है। संसदीय समिति की कार्यवाही पर्दे के पीछे चलती है और इसे राजनीति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। बिना अधिक संकोच के यह कहा जा सकता है कि संबंधित अधिकारियों ने समिति के समक्ष उपस्थित नहीं होकर संविधान की गरिमा बनाए रखने की शपथ के साथ खिलवाड़ की है।

पेगासस विवाद एक ऐसा मसला है जिस पर संसदीय समिति को चर्चा करनी चाहिए। दुनिया के दूसरे लोकतांत्रिक देशों में कार्यपालिका द्वारा निगरानी एवं अन्य खुफिया जांच से जुड़े कदमों की सभी दलों के प्रतिनिधियों द्वारा सार्वजनिक रूप से समीक्षा होती है। यह एक स्थापित प्रणाली है और अच्छी तरह कार्य कर रही है। भारत में ऐसी कोई औपचारिक संरचना नहीं है लेकिन इसका प्रावधान जरूर है कि यदि कोई समिति कार्यपालिका के प्रतिनिधियों से जानकारियां मांगती हैं तो संबंधित अधिकारी को नि:संकोच सहयोग करना चाहिए। सरकार के दोनों अंगों के बीच आपसी समन्वय बनाए रखने के लिए यह सर्वाधिक प्रभावी उपायों में एक है। लोकसभा अध्यक्ष इन अधिकारियों को संसद के निर्देशों का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दे सकता अन्यथा सरकार को उत्तरदायी ठहराने की सांविधानिक व्यवस्था के ढांचे को असाधारण नुकसान पहुंचेगा।

Keyword: संसदीय गरिमा, सम्मान, शशि थरूर, लोकसभा अध्यक्ष, पेगासस विवाद,
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