बिजनेस स्टैंडर्ड - राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की महत्त्वपूर्ण भूमिका
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, September 28, 2021 01:04 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की महत्त्वपूर्ण भूमिका

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  August 02, 2021

पूर्व विदेश मंत्री के नटवर सिंह ने राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीपीए) का जिक्र करते हुए कहा था कि यह खास लोगों का एक विशेष समूह था। हरेक व्यक्ति इसका सदस्य नहीं हो सकता लेकिन इस समिति में किसी भी विषय पर चर्चा हो सकती थी।' पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के शुरुआती वर्षों में सिंह इस समिति के सदस्य हुआ करते थे। सिंह ने कहा कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान रक्षा, गृह, विदेश एवं वित्त मंत्री सीसीपीए का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किए जाते थे। हालांकि वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में स्थिति भिन्न है। प्रधानमंत्री ने हाल में सीसीपीए में बदलाव किया और अब महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति इरानी, पर्यावरण एवं श्रम मंत्री भूपेंद्र यादव और बंदरगाह मंत्री सर्वानंद सोनोवाल सीसीपीए में शामिल किए गए हैं। सीसीपीए में प्रधानमंत्री के अलावा 12 मंत्री हो गए हैं।

मनमोहन सिंह सरकार में सहयोगी दलों का कोई भी सदस्य सीसीपीए का हिस्सा नहीं था। पिछली मोदी सरकार में सीसीपीए में सहयोगी दलों के सदस्य भी थे। शिरोमणि अकाली दल से हरसिमरत बादल और शिवसेना अरविंद सावंत भी इसका हिस्सा थे। मगर अब सहयोगी दलों का कोई भी प्रतिनिधि सीसीपीए का हिस्सा नहीं है।

अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री कार्यालय का हिस्सा रहे एक अधिकारी का कहना है कि अब सीसीपीए की प्रकृति बदल गई है। वाजपेयी ने इसे पूरी तरह खत्म कर दिया था। लेकिन इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान सीसीपीए एक तरह से मंत्रिमंडल का ही हिस्सा समझा जाता था। सीसीपीए में अगर कोई निर्णय ले लिया जाता था तो मंत्रिमंडल में भी इस पर मुहर लगना तय माना जाता था।

इंदिरा के समय में सीसीपीए ने विविध मुद्दों पर चर्चा की एवं निर्णय लिया। इंदिरा गांधी सरकार में मंत्री रहे पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि सीसीपीए ने ही 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' पर अंतिम निर्णय लिया था। सीसीपीए के निर्णय के बाद ही भारतीय वायु सेना के दक्षिणी एयर कमांड का गठन किए जाने का निर्णय लिया गया था।

मनमोहन सिंह सरकार के दौरान राजनीतिक-आर्थिक प्रभाव डालने की क्षमता रखने वाले लगभग हरेक मसले सीसीपीए के हवाले कर दिए गए। वर्ष 2006 में जब नेपाल माओवादियों आंदोलन चल रहा था तो सीसीपीए ने वहां चल रहे संकट, राजतंत्र की भूमिका और भारत के लिए इसके परिणामों पर चर्चा की थी।

असामान्य तौर पर सीसीपीए ने एक बयान जारी कर माओवादियों के मुख्यधारा का हिस्सा बनने का स्वागत किया। मगर बयान में राजतंत्र की भूमिका पर चुप्पी साध ली गई। एक लंबा वक्त बीतने के बाद दुनिया को नेपाल में सात राजनीतिक दलों का गठबंधन तैयार होने में भारत की भूमिका समझ में आई। यह गठबंधन तैयार होने के बाद भूमिगत माओवादी नेता पुष्प कुमार दहल 'प्रचंड' प्रधानमंत्री बने और नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा के साथ उन्होंने सत्ता साझा करने का समझौता किया। यह कदम नेपाल में राजतंत्र खत्म करने की दिशा में एक निर्णायक पहल थी।

धीरे-धीरे सीसीपीए ताकत का केंद्र बनती गई। एक बार बतौर रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अनुपस्थिति में सीसीपीए की अध्यक्षता की। सिंह उस समय विदेश दौरे पर थे। बाद में काफी समय बाद मुखर्जी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने पहले बैठक बुलाई और प्रधानमंत्री से बाद में इसकी स्वीकृति ली। मुखर्जी ने कहा कि सिंह ने इस पर हामी भर दी। वर्ष 2019 में जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का नाम सीसीपीए सदस्यों की सूची में नहीं था तो चर्चा गरम हो गई। यह एक भूल करार दी गई और महज 24 घंटे के भीतर ही कैबिनेट सचिवालय ने सीसीपीए सदस्यों की नई सूची जारी कर दी।

जब पी वी नरसिंह राव देश के प्रधानमंत्री थे तो उस समय सीसीपीए सुर्खियों में रही थी। नवंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस से ठीक पहले प्रधानमंत्री ने सीसीपीए की पांच बैठकें बुलाईं। वह सरकार में मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह के नेतृत्व वाले सक्रिय समूह से दबाव का सामना कर रहे थे। राव ने सिंह को भी सीसीपीए की इन बैठकों में आमंत्रित किए जाने का आदेश दिया, यद्यपि सिंह उस समय इसके सदस्य नहीं थे।

सीसीपीए में इस बात पर निर्णय लिया जाना था कि उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया जाय या नहीं। प्रधानमंत्री के तत्कालीन सलाहकार नरेश चंद्रा को नरसिंह राव की जीवनी पर लिखी एक पुस्तक में यह कहते हुए उद्धृत किया गया है, 'सीसीपीए के सदस्यों ने मस्जिद को नुकसान होने से रोकने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने की मांग की लेकिन उन्होंने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का प्रस्ताव नहीं दिया और न ही उन्होंने राव पर इसके लिए दबाव डाला।'

एक प्रधानमंत्री के रूप में राव की छवि ऐसी बनी कि मस्जिद ढह गया लेकिन प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं किया। हालांकि सीसीपीए में जिन बातों पर चर्चा हुई उनके अनुसार राव के मंत्रिमंडल के सदस्य धारा 356 लगाने के पक्ष में नहीं थे। नवंबर में सीसीपीए की पांच बैठकें हुई थीं जिनमें एक 20 नवंबर के इर्द-गिर्द आयोजित हुई थी। राव उसमें उपस्थित नहीं थे और वह सेनेगल की आधिकारिक यात्रा पर थे। एक बैठक सिंह के कार्यालय में हुई लेकिन किसी भी बैठक में किसी मंत्री ने उत्तर प्रदेश में धारा 356 लगाने के पक्ष में अपनी राय नहीं दी।  

नरेंद्र मोदी सरकार के सात वर्षों के कार्यकाल में सीसीपीए की कितनी बैठकें हुई हैं इनकी कोई भी जानकारी सार्वजनिक पटल पर नहीं है। नटवर सिंह ने कहा, 'महीने में सीसीपीए की कम से कम एक बैठक जरूर हुआ करती थी और कभी-कभी इससे अधिक भी हुआ करती थी। इनमें बाढ़, सूखा, राज्यों में कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुआ करती थी।'

Keyword: मंत्रिमंडलीय समिति, नटवर सिंह, सीसीपीए, विशेष समूह, राजतंत्र,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या रोजगार के मोर्चे पर आगे बेहतर होंगे हालात?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.